एम. एम. एस.
सेवा में,
माननीय शिक्षा मंत्री जी,
भारत सरकार
महोदय,
मैं एनईईटी-यूजी २०२६ का एक छात्र हूं। मेरा रोल नंबर नहीं, दर्द लिख रहा हूं। आप संसद में नीतियां बनाते हैं। मैं कोटा के १० बाई १० के कमरे में ३ साल से सिर्फ एक पन्ना पलट रहा हूं अपनी किस्मत का।
मेरे सवाल आंकड़ों से शुरू होते हैं, चीख पर खत्म होते हैं। इस पत्र को कृपया ध्यान से पढ़िएगा! ४ लाख रुपए सालाना, यही है मेरे डॉक्टर बनने की कीमत। कोचिंग २.५ लाख, पीजी ८०,०००, किताबें २५,०००। मेरे पिता ने खेत बेचा, मां ने गहने। बताइए, जब ६०,००० की फीस १.२ लाख बन जाती है, तो ये शिक्षा है या नीलामी?
‘लय टूटना’ जानते हैं आप? २ साल से सुबह ५ बजे उठकर जो रिदम बनाई थी, परीक्षा रद्द की एक खबर ने उसे कांच की तरह चकनाचूर कर दिया। अब हॉस्टल खाली है, कोचिंग बंद है, और मैं अपने गांव में सिर्फ दीवारें घूर रहा हूं। ये मानसिक हत्या नहीं तो क्या है?
पेपर किसने लीक किया? न मैंने, न मेरे जैसे २४ लाख बच्चों ने। फिर दोबारा फॉर्म, दोबारा २०० रुपये देकर टेस्ट देने जाना, दोबारा डेढ़ महीने का किराया-खाना, ये बिना बजट का खर्च हम क्यों भरें?
मंत्री जी, माधुरी को स्कॉलरशिप मिली थी, फिर भी पीजी पर ४७,००० डूब गए। तेजस बिहार से एनसीआर आया, अब टूट चुका है। हम अपराधी नहीं, फिर कटघरे में क्यों खड़े हैं?
आप कहते हैं ‘डॉक्टरों की कमी है’। पर आप ही बताइए, जो सिस्टम हमें एंट्री से पहले ही कर्जदार, डिप्रेस्ड और बेजान कर दे, वो वैâसे अच्छे डॉक्टर पैदा करेगा?
अब सीधी बात ये कि आखिर मेरी गलती क्या है? क्या गरीब घर में पैदा होना गलती है? क्या मेहनत करना गलती है? क्या आपके सिस्टम पर भरोसा करना गलती है?
बताइए मुझे किसकी गलती की सजा मिल रही है? पेपर माफिया की, कोचिंग माफिया की, या उस तंत्र की जो हर लीक के बाद सिर्फ छात्र को ही निचोड़ता है? रात के २ बजे जब मैं फिजिक्स का न्यूमेरिकल नहीं, अपने बाप का कर्ज गिन रहा होता हूं, तब सोचता हूं क्या आपका जमीर आपसे कभी सवाल नहीं करता? क्या २४ लाख परिवारों की टूटी उम्मीदों का बोझ आपको सोने देता है?
मुझे दया नहीं चाहिए। मुझे जवाब चाहिए। और जवाब नहीं तो कम से कम इतना भरोसा कि अगली बार परीक्षा हॉल में मेरे हाथ कांपेंगे नहीं।
एक जिंदा लाश,
फिलहाल ‘नीट एस्पिरेंट’ कहलाने वाला छात्र
