मुख्यपृष्ठस्तंभमित्र की वाणी के जाल में न फंसें मोदी!

मित्र की वाणी के जाल में न फंसें मोदी!

-ट्रंप के बयानों का यथार्थ, कथनी और करनी के बीच गहरी खाई

मनमोहन सिंह

जी-७ शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान कि ‘हिंदुस्थान पर हमला हुआ तो अमेरिका साथ खड़ा होगा,’ पहली नजर में ही दोनों देशों के मजबूत होते कूटनीतिक रिश्तों का ढिंढोरा पीटता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यक्तिगत केमिस्ट्री और व्यापार समझौते के करीब होने के दावे रणनीतिक साझेदारी को एक नया मुलम्मा चढ़ाते दिखते हैं। हालांकि, वैश्विक राजनीति के क्रूर यथार्थ और पिछले इतिहास के पन्नों को पलटें, तो ट्रंप की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर साफ नजर आता है। यह विरोधाभास तब और ज्यादा संवेदनशील और गंभीर हो जाता है जब हिंदुस्थान की संप्रभुता, आर्थिक हित और नागरिकों की सुरक्षा का सवाल आता है। सच तो यह है कि ट्रंप ने अपनी हरकतों से बार-बार साबित किया है कि हिंदुस्तान के प्रति उनके मन में सम्मान किस कदर खोखला है।
रणनीतिक धूर्तता और संप्रभुता पर सीधा प्रहार
ट्रंप भले ही सार्वजनिक मंचों पर पीएम मोदी को अपना मित्र बताते हों, लेकिन उनकी नीतियों ने बार-बार हिंदुस्थान के आत्मसम्मान और रणनीतिक स्वायत्तता को बेरहमी से कुचला है।
मानचित्रों में धूर्तता: अमेरिकी सरकार द्वारा जारी किए गए आधिकारिक मानचित्रों में जिस तरह हिंदुस्थान और पाकिस्तान के इलाकों को लेकर धूर्तता दिखाई गई, हिंदुस्थान के अभिन्न हिस्सों को विवादित दर्शाया गया, वह देश की क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा प्रहार था।
ऊर्जा सुरक्षा पर पाबंदियां: हिंदुस्थान को पेट्रोल-डीजल खरीदने पर अमेरिका ने अपनी मर्जी की पाबंदियां थोप दीं। ईरान से तेल आयात बंद करने का कड़ा दबाव बनाकर हिंदुस्थान की ऊर्जा जरूरतों को पंगु बनाने की कोशिश की गई, जो किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता का खुला उल्लंघन है।
आर्थिक शोषण और इमीग्रेशन के मोर्चे पर अमानवीयता
व्यापार समझौते के दावों की आड़ में ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने हिंदुस्थान के हितों पर तीखे वार किए हैं।
टैक्स पर टैक्स का बोझ: हिंदुस्थान को ‘टैक्स किंग’ का तमगा देकर ट्रंप प्रशासन ने हिंदुस्थानी स्टील और एल्युमिनियम पर भारी टैरिफ थोप दिए। हिंदुस्थान पर टैक्स के ऊपर टैक्स लगाने की यह नीति अमेरिकी दादागीरी का साक्षात प्रमाण है।
हिंदुस्थानी छात्रों पर कानूनी हंटर: अमेरिका में पढ़ रहे और नौकरी की तलाश कर रहे हिंदुस्थानी छात्रों और पेशेवरों के ऊपर दुनिया भर के कड़े कानून थोप दिए गए। एच-१बी वीजा के नियमों को गला घोंटने की हद तक सख्त कर दिया गया।
बेड़ियों में जकड़ा डिपोर्टेशन: हिंदुस्थानियों को जिस बेरहमी से अमेरिका से डिपोर्ट किया गया, वह पूरी दुनिया ने देखा। इंसानी गरिमा को तार-तार करते हुए, हिंदुस्थानी नागरिकों को अपराधियों की तरह बेड़ियों में जकड़कर डिपोर्ट किया गया। किसी संप्रभु देश के नागरिकों के साथ ऐसा बर्ताव हिंदुस्तान की संप्रभुता पर सबसे बड़ा प्रहार है।
समुद्री संकट पर हेकड़ी और पाकिस्तान पर मेहरबानी
होर्मुज जलडमरूमध्य में हिंदुस्थानी नाविकों की सुरक्षा को लेकर ट्रंप के मौखिक आश्वासन पूरी तरह पाखंड नजर आते हैं। होर्मुज में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों और उपजे तनाव के कारण जब निर्दोष हिंदुस्थानी नाविकों की मौत हुई, तब अमेरिका ने कोई वास्तविक संवेदना प्रकट नहीं की, बल्कि हमेशा की तरह अपनी कूटनीतिक हेकड़ी ही दिखाई।
इस धोखे की पराकाष्ठा रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर दिखती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद, अमेरिका ने हिंदुस्थान की सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। हिंदुस्थान के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए, अमेरिका ने पाकिस्तान के सैन्य जनरलों को वॉशिंगटन में न केवल पनाह दी, बल्कि उन्हें रेड-कार्पेट सम्मान और वित्तीय इमदाद से नवाजा।
लब्बोलुआब यह है कि कूटनीति मीठे जुमलों से नहीं, बल्कि नीयत से तय होती है और ट्रंप की नीयत हमेशा सवालों के घेरे में रही है।
जी-७ में ट्रंप का यह कहना कि ‘वे हिंदुस्थान की मदद के लिए मौजूद रहेंगे’, महज एक चुनावी और कूटनीतिक पैंतरा है। टैक्स का हंटर, वीजा पाबंदियां, नक्शों की धूर्तता, नाविकों की मौत पर हेकड़ी और पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का यह खुला प्रेम यह साबित करने के लिए काफी है कि ट्रंप के मन में हिंदुस्थान के लिए कोई सम्मान नहीं है। हिंदुस्थान को इन खोखले और मीठे बयानों के भ्रम से बाहर निकलकर, अमेरिकी चालबाजियों को पहचानना होगा और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को ही अपनी असली ढाल बनाना होगा।

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