-घाटे की गाड़ी को फिर पटरी पर लाने की तैयारी
-परियोजना की कार्यक्षमता पर उठे सवाल
जेदवी / मुंबई
मुंबई की बहुप्रचारित मोनोरेल परियोजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करीब ८ से १० महीने तक बंद रहने के बाद चेंबूर से संत गाडगे महाराज चौक (जैकब सर्कल) तक मोनोरेल सेवा जून २०२६ के अंत तक दोबारा शुरू किए जाने की तैयारी चल रही है। लेकिन बंद के इस लंबे समय और करोड़ों रुपए के नुकसान ने परियोजना की कार्यक्षमता तथा योजना निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बता दें कि मोनोरेल सेवा २० सितंबर २०२५ से तकनीकी एवं सुरक्षा कारणों के चलते बंद है। अधिकारियों के अनुसार, वडाला क्षेत्र में अंतिम ट्रायल रन और सुरक्षा परीक्षण जारी हैं। सेवानिवृत्त मेट्रो रेलवे सुरक्षा आयुक्त पी. एस. बघेल द्वारा अंतिम निरीक्षण के बाद सुरक्षा प्रमाणपत्र मिलने पर ही सेवाओं की आधिकारिक शुरुआत की घोषणा होगी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई कि पूरे कॉरिडोर को महीनों तक बंद रखना पड़ा? जानकारी के अनुसार, पूरे १९.५४ किलोमीटर मार्ग पर नई सीबीटीसी सिग्नलिंग प्रणाली लगाने, १० नए ‘मेड इन इंडिया’ रेक शामिल करने और २०२५ में लगातार सामने आए ब्रेकडाउन, टायर फटने तथा तकनीकी खराबियों के बाद पूरे सिस्टम को दुरुस्त करने का पैâसला लिया गया था।
प्रशासन के दावों पर मुंबईकरों का सवाल
अब दावा किया जा रहा है कि सेवा बहाल होने पर कोचों में सीसीटीवी वैâमरे, मोबाइल और लैपटॉप चार्जिंग पॉइंट, बेहतर सस्पेंशन सिस्टम और आधुनिक इंटीरियर जैसी सुविधाएं मिलेंगी। साथ ही चेंबूर स्टेशन पर मेट्रो लाइन २बी से इंटरचेंज सुविधा भी उपलब्ध होगी। फिर भी सवाल कायम है कि जब करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी मोनोरेल वर्षों से घाटे और तकनीकी संकटों से जूझ रही है तो इस परियोजना की जवाबदेही आखिर तय कब होगी? मुंबईकरों को अब सिर्फ वादे नहीं, सुरक्षित और भरोसेमंद सेवा चाहिए।
लगातार घाटे में चली मोनोरेल
इस बीच आर्थिक तस्वीर और भी चिंताजनक है। वित्त वर्ष २०२३-२४ में मोनोरेल को लगभग ५२९ करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा हुआ। वहीं २०२४-२५ में टिकटों से केवल ८.८१ करोड़ रुपए की आय हुई, जबकि संचालन और रखरखाव पर ६० करोड़ रुपए खर्च किए गए। पिछले वर्षों में मेंटेनेंस का खर्च १०० करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच चुका है। यानी कमाई से कई गुना अधिक खर्च जनता के पैसे से उठाया जाता रहा।
