मुख्यपृष्ठस्तंभ...मुंबई मेरी जान : ‘फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...'

…मुंबई मेरी जान : ‘फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया…’

मनमोहन सिंह

यह सच है कि जब कोई कश खींचकर धुएं का छल्ला हवा में उछालता है, तो उसे लगता है कि उसने जिंदगी के सारे गम ‘मैं फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया…’ वाले स्टाइल में हवा कर दिए। पर हकीकत ये है दोस्त कि आप फिक्र नहीं, अपनी जिंदगी और मेहनत की गाढी कमाई धुएं में उड़ा रहे हैं।
२००५ में जो सिगरेट का पैकेट ५९ रुपए का था, आज २०२६ में वह ४८० रुपए का हो चुका है। महंगाई की यह रफ्तार देखकर तो अच्छे-अच्छे ‘रॉकेट’ भी शरमा जाएं! २१ सालों में ७१३ फीसदी का उछाल। मतलब, जितनी तेजी से आपके फेफड़े काले नहीं हुए, उससे कहीं ज्यादा तेजी से आपकी जेब साफ हुई है। अगर महंगाई इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो भविष्य में लोग गोल्ड बार की जगह सिगरेट का डब्बा तिजोरी में रखकर उस पर ताला लगाएंगे। मान लीजिए, आप ‘किंग्स’ वाले ठाट रखते हैं और दिन की १० सिगरेट सुलगाते हैं। महीने का हिसाब बैठता है लगभग ७,००० से ८,००० रुपए। सालभर में आप ९०,००० रुपए स्वाहा कर देते हैं।
जरा सोचिए, एक औसत भारतीय अपनी कमाई का ३५ज्ञ् हिस्सा सिर्फ इसलिए खर्च कर रहा है ताकि वह अपने अंदर ‘धुएं वाली मशीन’ चला सके। इतने पैसे में तो आप हर साल एक शानदार वेकेशन मना सकते थे, लेकिन आपने चुना पड़ोसी के घर के आगे धुआं छोड़ना।
बीमारी का प्रीमियम: किश्तों में मौत की खरीदारी सिगरेट पीना दरअसल एक ऐसा ‘इन्वेस्टमेंट’ है, जिसका रिटर्न सिर्फ अस्पताल के बिलों में मिलता है। वैंâसर, दमा और सांस की तकलीफ तो खैर कॉम्प्लिमेंट्री गिफ्ट्स हैं।
महीने का ५०० रुपए डॉक्टर की फीस जोड़ लें तो ४० साल में आप २.४० लाख रुपए सिर्फ ‘खांसने’ की दवाइयों पर उड़ा चुके होंगे।
गंभीर बीमारी होने पर जो लाखों का फटका लगेगा, उसमें तो एक नया फ्लैट आ जाता! विडंबना देखिए, इंसान दिन-रात मेहनत करके पैसे कमाता है ताकि एक घर बना सके और फिर वही पैसे सिगरेट की दुकान पर दे आता है ताकि वह ‘धुआं’ बन जाए। भारत में १३ करोड़ लोग इस लत के शिकार हैं। यानी करोड़ों लोग मिलकर देश की हवा और अपनी आर्थिक दीवार, दोनों को खोखला कर रहे हैं। जिस पैसे से आप एक चमचमाती कार या बैंक में मोटा बैलेंस खड़ा कर सकते थे, उससे आपने बस अपने दांत पीले किए और फेफड़ों को तारकोल का गोदाम बना दिया।
लब्बोलुआब यह कि सिगरेट के धुएं में फिक्र नहीं उड़ती, बल्कि आपके बच्चों की पढ़ाई, आपकी रिटायरमेंट की प्लानिंग और आपकी सेहत का सुकून उड़ता है। अगली बार जब माचिस जलाएं, तो याद रखिएगा कि आप सिगरेट नहीं, अपने सपनों की ‘वसीयत’ जला रहे हैं।

अन्य समाचार