सूफी खान
ई रान में महंगाई विरोधी प्रदर्शन सरकार विरोधी प्रदर्शन बन गए और इसमें अमेरिका की सीधी धमकी ने हालात को काफी बिगाड़ दिया है। बावजूद इसके ईरान में प्रदर्शनों पर काबू पाने की लगातार कोशिश जारी है। खबर है कि तेहरान सहित कई शहरों में खामेनेई समर्थक भी लाखों की तादाद में सड़कों पर उतर रहे हैं।
जहां एक तरफ प्रदर्शन निजाम बदलने की मांग में तब्दील हो चुके हैं, वहीं मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, सुरक्षा बलों की कार्रवाई में अब तक ११६ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और २,६०० से अधिक गिरफ्तारियां हुई हैं। हालांकि, ये पश्चिमी मीडिया की रिपोर्ट हैं, जिन्हे ईरान नकारता रहा है।
ईरान में इस समय जिस तरह से आंतरिक विद्रोह चल रहा है। उसे अमेरिका सैन्य कार्रवाई के मौके के रूप में देख सकता है, ऐसे में एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर इस विद्रोह के दौरान अमेरिका ने ईरान में कोई मिलिट्री एक्शन लिया तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी।
लेकिन अगर अमेरिका ने ऐसी कोई भी कोशिश की तो दूसरी तरफ से भी बड़ी शक्तियां ईरान के साथ खड़ी हो जाएंगी। रूस और चीन ने इस संकट को ईरान का आंतरिक मामला बताया है। इसी महीने दक्षिण अप्रâीका के तट पर रूस, चीन और ईरान ‘विल फॉर पीस २०२६’ नामक संयुक्त नौसैनिक अभ्यास कर रहे हैं, जो अमेरिका के लिए एक सीधा संदेश है। अगर अमेरिका हमला करता है तो रूस और चीन ईरान के लिए तकनीकी ढाल के रूप में काम करेंगे।
रूस खुले युद्ध में सीधे अपनी सेना नहीं भेजेगा, लेकिन वह ईरान को एस-४०० वायु रक्षा प्रणाली और सुखोई ३५ लड़ाकू विमानों की डिलिवरी तेज कर सकता है। खबरें आती रही हैं कि रूस के विशाल कार्गो प्लेन तेहरान में गुप्त रूप से सैन्य रसद पहुंचा रहे हैं। रूस अपने सैटेलाइट और रडार नेटवर्क के जरिए अमेरिकी और इजराइली विमानों की हलचल की जानकारी ईरान को दे सकता है।
वहीं चीन की नीति हमेशा बिना लड़े जीतने की रही है। वह सैन्य मोर्चे पर ईरान के लिए नहीं लड़ेगा। युद्ध के दौरान भी चीन, ईरान से तेल खरीदना जारी रखेगा, जो ईरान की युद्ध अर्थव्यवस्था को चलाने के ल्िाए एकमात्र वित्तीय स्रोत होगा। चीन सीधे मिसाइल देने के बजाय पुर्जे और कच्चा माल ईरान को मुहैया कराएगा, ताकि ईरान अपनी मिसाइलें खुद बनाता रहे।
एक्सपर्ट कहते हैं कि यूएन की सिक्योरिटी काउंसिल में चीन और रूस मिलकर अमेरिका के किसी भी प्रस्ताव को वीटो करेंगे, जिससे अमेरिका पर अंतरराष्ट्रीय कानूनी दबाव बना रहेगा। इसके अलावा प्रॉक्सी ग्रुप्स या ईरान हिमायती तंजीमें जैसे हूती विद्रोही, हिजबुल्लाह, कताइब हिजबुल्लाह, हशदुश शाबी समेत तमाम क्षेत्रीय समूह ईरान के समर्थन में होंगे। जानकार कहते हैं कि ये लड़ाई कितने दिन चलेगी, ये कहना तो मुश्किल है, लेकिन एकतरफा नहीं होगी ये तय है और इन हालात में मिडिल ईस्ट के अरब देशों में मौजूद अमेरिकी बेस भी बचना मुश्किल हो जाएगा।
