हृदयनारायण दीक्षित
निद्रा में मस्तिष्क के भीतर बहुत सारे रासायनिक परिवर्तन होते हैं। जल और वायु की तरह निद्रा भी मनुष्य जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। हमारे पूर्वजों ने निद्रा की आवश्यकता पर गहरा अध्ययन किया था। वैदिक ऋषि मधुप्रिय हैं। एक मधु अनुभूति में प्रवाहित होता है और दूसरा मधु पदार्थ है। आयुर्वेद का प्रतिष्ठित ग्रंथ चरक संहिता है। चरक संहिता के रचनाकाल में दोनों मधु प्रवाहमान हैं। मधुमक्खियों का शहद एक मधु है। अन्य सभी मीठे पदार्थ मधु हैं। चरक संहिता में कहते हैं कि केवल मधुरस का अधिक सेवन करने से स्थूलता, कोमलता और निद्रा की अधिकता बढ़ती है। ‘निद्रा की अधिकता’ की ओर स्वाभाविक ही सबका ध्यान जाता है। रक्त रस में शक्कर या शुगर की अधिकता आधुनिक समाज की समस्या है। मधु शक्कर का पर्याय नहीं है। शक्कर पदार्थ है और मधु स्वाद अनुभूति। रक्त रस में शक्कर का बढ़ना रोग है, लेकिन निद्रा अधिकता की जगह अनिद्रा भी आधुनिक समाज का बड़ा रोग है। चरक संहिता में बताया गया है ‘जब कार्य करते-करते मन थक जाता है, इंद्रियां भी थकने के कारण अपने-अपने विषयों से निवृत्त हो जाती हैं, तब निद्रा।’ पतंजलि योग सूत्रों में भी निद्रा को विषय मुक्त चित्त का परिणाम बताया गया है। लेकिन तनावग्रस्त मन का क्या करें? मन थकता ही नहीं। इंद्रियां विषयों से निवृत्त होती ही नहीं। करें तो क्या करें? विषय विषाद देते हैं। प्रसाद फिसल जाता है।
ऊषा आ रही हैं। रात्रि विदा हो रही हैं। पूरा अस्तित्व जागरण से भर गया है। पक्षी कलरव कर रहे हैं। जो जागे हुए हैं, वे प्रात:काल का सूर्य, तेज अनुभव कर रहे हैं। निद्रा पूरी नहीं है। मेरा मन करता है कि थोड़ा और सो लिया जाए। एक झपकी और। निद्रा रहस्य है। चरक संहिता में बताया गया है कि निद्रा के समय रजस् गुण की शिथिलता होती है, तम गुण का आच्छादन होता है। सत् गुण निष्क्रिय हो जाता है। मैं अपना विश्लेषण करता हूं। स्वविश्लेषण ही अध्यात्म भी है। मैं प्राय: तमगुण के प्रवाह में ही रहता हूं। तम की सक्रियता का नेतृत्व रजस् करता है। रजस् का अर्थ ही सक्रियता है। मन थकता नहीं। इंद्रियांं विषयों से मुक्त नहीं होतीं। नींद की प्रतीक्षा बेचैन करती है। नींद जरूरी है। जैसी गहरी निद्रा वैसा ही उतना ही ऊंचा जागरण। शरीर निद्रा के समय ही पुनर्नवा ऊर्जा पाता है। टूटे कोष नए होते हैं। चरक संहिता में बताया है कि निद्रा से आरोग्य, शरीर का पोषण, बलवृद्धि, ज्ञानेंद्रियों की उचित प्रवृत्ति और आयु नियत रूप में बनी रहती है।’ यहां सबसे बड़ी बात है-ज्ञानेंद्रियों की उचित प्रवृत्ति। अनिद्रा पीड़ित की ज्ञानेंद्रियां अपना काम ठीक से नहीं करतीं। स्मृति पर भी प्रभाव पड़ता है।
निद्रा जरूरी है, लेकिन कोई भी व्यक्ति स्वयं निद्रा में नहीं जा सकता। ज्यादा से ज्यादा हम लेट सकते हैं। निद्रा लाने में हम कर्ता नहीं हैं। निद्रा स्वयं आती है, हमारे बुलाने पर नहीं। हमारे प्रयास से वह और भी दूर भागती है। बिन बुलाए आना नींद की लत है। सरकारी बैठकों में नेता, अफसर सोते देखे जाते हैं। वे बिना प्रयास ही सो जाते हैं। चरक या पतंजलि की मानें तो उनका मन विषयों से पृथक होता है और वे सो जाते हैं। निद्रा का अंतत: क्षेत्र मधुमय है। यह एक अज्ञात दिक्हीन, कालहीन चित्तदशा है। दिक्हीन इसलिए कि निद्रा का क्षेत्र भौगोलिक नहीं है। निद्रा में समय का अनुभव नहीं होता, निद्रा में काल नहीं होता, लेकिन रस होता है। निद्रा से जागरण में वापसी की मुहूर्त बड़ी मधुरसा है। मन करता है थोड़ा और सो लूं, एक झपकी और। पूर्वजों ने आलस्य को बुरा कहा है। लेकिन निद्रा से जागरण में आने वाले संधिकाल का आलस्य मुझे बहुमूल्य लगता है। आलस्य स्वत: कर्म प्रवृत्ति से भागने का नाम है। निद्रा का मधुमत्त आलस्य दूसरा ही है।
निद्रा ताजा करती है, ऊर्जा देती है, स्मृति और तेज ओज देती है तो भी इस अन्तः मधुक्षेत्र से हमारा परिचय नहीं। सामान्य बोलचाल में अच्छी नींद को मीठी नींद कहा जाता है। दुर्गा सप्तशती के रचनाकार ने निद्रा को देवी बताया और अनेकश: नमस्कार किया है। अनिद्रा के रोगियों को दवाइयां दी जाती हैं। वे शरीर में रासायनिक परिवर्तन लाती हैं। उनसे लाई गई कृत्रिम निद्रा मधुमत्त नहीं होती। जीवन मधुरस की इच्छा से भरापूरा है। यह सहज उपलब्ध है। सप्रयास नहीं। अनायास ही। निद्रा सप्रयास नहीं आती। प्रकृति का अंतस् मधुरसा है। सुख स्वस्ति और संतुष्टि मधुरस हैं। आनंद मधुरसा है। आनंद मधुरसविहीन नहीं हो सकता। वृक्ष, वनस्पति मधुरसा हैं। नदियां और सारे जल भी। वाणी का मधु या मधुमय वाणी सबकी अभीप्सा है। मंत्रों का छंदस मधु माधव है। स्वभाव अध्यात्म है और अध्यात्म की लब्धि मधु है। वृहदारण्यक उपनिषद् में धर्म को भी मधु बताया गया है। प्रीति रीति का मधु संसार व्यापी है। बादलों में भरा मधुकोष ऋग्वेद के ऋषियों ने ही देखा था। नृत्य का आस्वाद मधुमय है।
सर्वभूतहित के सभी कर्म मधुकर्म और मधुरसा हैं। सर्वभूतहित संलग्न लोग मधुकर हैं। यह सृष्टि स्रष्टा का मधुकार्य है और द्रष्टा की मधु अनुभूति। कवि हृदय का सौंदर्यबोध वस्तुत: मधुबोध है। काव्यरस मधुरसा है और कविता मुधमत्त मधुर चिरकुमारी युवती। ऋचाएं मधुमती हैं। यहां सब तरफ मधु का आच्छादन है। मधु ने ही दशों दिशाओं से मधु को आवृत्त कर लिया है, लेकिन विषादग्रस्त चित्त का क्या करें, मधुरसा प्रवाह में गतिशील होने के बावजूद हम जीवन के मधु से वंचित हैं। मैं मधुरसा नाद में हूं। नाद भीतर से बाहर की ओर प्रवाहमान है। नाद सुनता हूं, लेकिन भीतर रस प्रवाह नहीं है। रस है, लेकिन मन पराजित है। देव शक्तियां कृपा करें और सही मार्ग पर चलने का साहस दें।
