मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोक : कर्जत के जंगल की लड़ाई...कोतवाल दस्ता बनाम फडणवीस दस्ता

रोखठोक : कर्जत के जंगल की लड़ाई…कोतवाल दस्ता बनाम फडणवीस दस्ता

कर्जत के साई जंगल में ‘टोरेंट’ ऊर्जा परियोजना के नाम पर अब तक ढाई हजार से अधिक पेड़ों को बेरहमी से काट दिया गया है। कुल ३३ हजार पेड़ काटे जाएंगे। यह सामूहिक हत्याकांड सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला पर हमला है। जंगल में क्रांति के इतिहास को खत्म करने की यह योजना है। महाराष्ट्र की सरकार हजारों पेड़ काटती है और फिर मुंह उठाकर कहती है कि इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा!

छत्रपति शिवाजी महाराज की सह्याद्रि घाटी में गुजरात की ‘मेहता एंड मेहता’ कंपनी बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई कर रही है और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री. फडणवीस इस जंगल कटाई का समर्थन कर रहे हैं। यह दृश्य विचलित करने वाला है। उन सबको इतिहास में झांकना चाहिए। छत्रपति शिवराय और उनके मावले इसी तरह के जंगलों और पहाड़ी कंदराओं में रहकर मुगलों से गुरिल्ला युद्ध लड़े और शिवराय ने दुनिया का पहला हिंदवी स्वराज्य स्थापित किया। हिंदवी स्वराज्य के घने जंगल ही रणभूमि थे। अब उन्हीं पर कुल्हाड़ी चलाने का काम महाराष्ट्र सरकार ने शुरू किया है। सोमवार दोपहर श्री. आदित्य ठाकरे के साथ कर्जत के साई पहाड़ी इलाके के जंगल में हमने पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट यानी ‘टोरेंट’ जलविद्युत परियोजना के नाम पर किए गए २,६०० पेड़ों का कत्लेआम देखा। जलियांवाला बाग, पानीपत, गुजरात दंगों में जैसे इंसानों की लाशें गिरी थीं, वैसे ही हजारों पेड़ निष्प्राण पड़े दिखाई दिए। मानो उन्होंने तड़प-तड़प कर प्राण त्यागे हों। उन पर ‘टोरेंट’ कंपनी ने बेरहमी से ‘कटर्स’ चलाए। उन हजारों पेड़ों पर रहने वाले हजारों तोते, कबूतर, गौरैया, मोर, मैना एक पल में बेघर हो गए। आकाश उन पक्षियों की चीख-पुकार और फड़फड़ाहट से मानो रोने लगा। उस पहाड़ी पर हुए हमले में पेड़ों पर बने हजारों घोंसले गिर गए। उनमें पक्षियों के अंडे और छोटे-छोटे बच्चे थे। प्राणियों और पक्षियों का यह सामूहिक वध मुंबई के ‘जैन’ समाज को दिखाई नहीं देता? कबूतरखानों के लिए लड़ने वाले जैनों का कर्जत की पहाड़ी पर हजारों बेघर पक्षियों और वन्यजीवों की मौत पर विलाप न करना एक धार्मिक पाखंड है। ‘मांसाहार’ हिंसा है, तो फिर कर्जत की पहाड़ियों पर हो रही प्राणियों की हत्या क्या है? पेड़ों की कटाई क्या है? जैनों ने मेहता की टोरेंट के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई?
टोरेंट किसका है?
रायगड जिले के कर्जत में जलविद्युत परियोजना गुजरात की ‘टोरेंट’ कंपनी बना रही है। इसके लिए सरकार ने कर्जत के ऐतिहासिक साई पहाड़ को उस कंपनी को दान में दे दिया है। भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य से साई पहाड़ १६ किलोमीटर की दूरी पर है। ‘टोरेंट पावर’ गुजरात की एक निजी कंपनी है। इस कंपनी ने भाजपा के चुनावी चंदे में अब तक करोड़ों रुपए दिए हैं, जिसका रिकॉर्ड है। इस कंपनी को उसके बदले में साई पहाड़ और सैकड़ों हेक्टेयर जमीन कौड़ियों के भाव में मिलने वाली है। फिर महाराष्ट्र के पानी से बिजली बनाकर वह मनमाने दाम पर बेचेगी। टोरेंट कंपनी ने इस परियोजना के लिए ३३ हजार पेड़ काटने की अनुमति ली है और उनमें से ढाई हजार पेड़ काट चुकी है। पाली तालुका के लोगों के विरोध को दरकिनार कर, किसी भी तरह की जनसुनवाई किए बिना यह वृक्ष कटाई चल रही है और जिले के कलेक्टर ने विरोध करने वाले स्थानीय नागरिकों को धमकाया है। टोरेंट कंपनी ने सब कुछ खरीद लिया है, इसका यह सबूत है। टोरेंट कंपनी की वृक्ष कटाई सुचारु रूप से पूरी हो, इसके लिए गृहमंत्री फडणवीस ने सशस्त्र पुलिस की फौज ही साई पहाड़ की तलहटी में खड़ी कर दी। उस सशस्त्र फौज की दीवार तोड़कर जब श्री. आदित्य ठाकरे के साथ हम पहाड़ की ओर निकले, तब हमारे साथ पूरा गांव चल रहा था और कटे हुए हजारों पेड़ों को देखकर गांव आंसू बहा रहा था। यहां आदिवासियों की दो बस्तियां हैं। उनमें से एक कातकरी ने आगे आकर कहा, ‘‘ये एक-एक पेड़ दो सौ-ढाई सौ साल के हैं। गांव और आस-पास किसी को सांप, बिच्छू काट ले और जहर शरीर में पैâल जाए तो हम पहाड़ पर आते हैं। जहर उतारने वाली वनस्पति हमें पता है। उसे लेकर नीचे उतरते हैं और सर्पदंश का इलाज करते हैं।’’ उन सभी औषधीय वनस्पतियों पर फडणवीस के कत्लखाने ने ‘कटर्स’ चला दिए। यह पूरा क्षेत्र घने जंगल, आर्द्रभूमि और सह्याद्रि के इकोसिस्टम का हिस्सा है। शहद, गोंद, जलाऊ लकड़ी, नदी की मछलियां, केकड़े यहां भरपूर हैं। मुख्य बात यह है कि सौ प्रतिशत प्राणवायु देने वाला यह जंगल है। यह सब अब आंखों के सामने नष्ट हो रहा है!
बेलगाम जंगल कटाई
महाराष्ट्र में गोरेगांव के ‘आरे’ जंगल से लेकर चंद्रपुर के व्याघ्र कॉरिडोर तक हर जगह बेलगाम जंगल कटाई चल रही है। भाजपा के चहेते उद्योगपतियों के फायदे के लिए महाराष्ट्र को नंगा किया जा रहा है। ऊर्जा-अणुऊर्जा परियोजना के लिए हजारों पेड़ काटना, जंगल नष्ट करना कोई विकल्प नहीं है। कर्जत में वृक्ष कटाई के बाद एक जागरूक महिला ने भावुक होकर कहा, ‘‘हम लोडशेडिंग सह लेंगे, लेकिन पेड़ों को बचाना चाहिए। नहीं तो अगली पीढ़ी प्राणवायु के बिना घुट-घुट कर मर जाएगी।’’ कर्जत के बाद अब रत्नागिरी में ‘टोरेंट पावर’ कंपनी आ रही है। ४,२०० मेगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए ‘टोरेंट पावर’ और ‘जेएसडब्ल्यू एनर्जी’ के साथ ७९ हजार करोड़ का समझौता ज्ञापन हुआ है। मुख्यमंत्री फडणवीस की मौजूदगी में यह करार हुआ। इस परियोजना से हजारों रोजगार पैदा होंगे, यह हमेशा वाला ही झुनझुना दिखाया जा रहा है। ‘जेएसडब्ल्यू एनर्जी’ ने रत्नागिरी जिले के दापोली तालुका के भीव बंदरगाह में २,८०० मेगावाट क्षमता का परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने का पैâसला किया है। ये परियोजनाएं खेती, पानी, मछली पकड़ने, समुद्री जैव विविधता और हापुस आम को नष्ट कर देंगी। उन परियोजनाओं के लिए हजारों हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण करना पड़ेगा। इसलिए आम, काजू, नारियल, सुपारी के बाग, मैंग्रोव्ज नष्ट करने पड़ेंगे। हजारों पेड़ों की कटाई होगी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कहते हैं, यह सारा प्रकृति ‘विनाश’ होने के बावजूद पर्यावरण पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ेगा।
श्री. आदित्य ठाकरे के साई पहाड़ पर जाते ही फडणवीस ने टोरेंट परियोजना के बचाव के लिए फौज उतार दी। जंगल कटाई का समर्थन यह फौज कर रही है। आश्चर्य की बात यह है कि आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे लड़ने वाले एड. उज्ज्वल निकम हजारों पेड़ों की हत्या का समर्थन करने के लिए खड़े हो गए। हजारों पेड़ों की कटाई का बचाव करना कसाब का बचाव करने जैसा है। फडणवीस द्वारा दिया गया मसौदा श्री. निकम ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर प्रकाशित किया। वह हास्यास्पद है। वसई की विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने भी वही मसौदा जस का तस प्रकाशित कर जंगल कटाई का समर्थन किया। स्नेहा दुबे के पिता विवेक पंडित आदिवासियों के हकों की लड़ाई लड़ने वाले श्रमजीवी संगठन के प्रमुख हैं। आदिवासियों के जंगलों पर किसी का भी अतिक्रमण नहीं होना चाहिए, यह उनकी भूमिका है। जबकि उनकी बेटी भाजपा की विधायक के तौर पर आदिवासियों के खिलाफ जंगल कटाई का समर्थन करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। एड. निकम, स्नेहा दुबे वगैरह द्वारा जंगल कटाई का किया गया समर्थन किस स्तर का है, वह नीचे के बॉक्स में प्रकाशित किया है। ३३ हजार पेड़ काटकर भी यह ‘टोरेंट पावर’ परियोजना पर्यावरण के अनुकूल है, ऐसा कहने वालों के दिमाग कर्जत की पहाड़ी पर प्रदर्शनी में रख देने चाहिए।
कर्जत के साई पहाड़ का क्रांति का इतिहास है। उसकी पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता संग्राम है। वीर भाई कोतवाल और उनके सहयोगी गोमाजी पाटील, हिराजी पाटील, भगत मास्टर १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भूमिगत हो गए। उन्होंने कर्जत तालुका में सशस्त्र सेना – ‘कोतवाल दस्ता’ की स्थापना की। उन्होंने इसी जंगल में रहकर अंग्रेजों के खिलाफ समानांतर सरकार चलाई। बिजली के तार काटे। रेलवे बंद करवा दी। अंग्रेजों पर हमले कर इसी जंगल में शरण ली। अंग्रेजों ने वीर कोतवाल और उनके साथियों को खत्म करने के लिए पुलिस अधिकारी हॉल के नेतृत्व में दस्ता बनाया। २ जनवरी १९४३ को इसी जंगल परिसर में अंग्रेजों के साथ हुई मुठभेड़ में भाई कोतवाल, हिराजी पाटील को गोलियां लगने से शहादत प्राप्त हुई। साई पहाड़ उन क्रांतिकारियों की लड़ाई का गवाह है। इस जंगल में स्वतंत्रता सेनानियों को शरण मिली। यह पहाड़, यह भूमि स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के बलिदान से जुड़ी हुई है।
अब ३३ हजार पेड़ काटकर क्रांतिकारियों के जंगल को नष्ट करना ‘पाप’ है, ऐसा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को नहीं लगता क्या? या भारतीय क्रांति के शत्रु के तौर पर उन्हें बदनाम होना है?
कर्जत के जंगल में ‘कोतवाल दस्ता’ बनाम ‘फडणवीस दस्ता’ ऐसा नया संघर्ष खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र के स्वाभिमान की यह लड़ाई एक साई पहाड़ तक सीमित नहीं है। आज एक साई पहाड़ गया, कल रायगड, सिंहगड, शिवनेरी, प्रतापगड पर भी ऐसी ही घुसपैठ होगी। कोतवाल दस्ते के पीछे महाराष्ट्र को खड़ा होना चाहिए, ऐसी मार्मिक पुकार वीर कोतवाल और उनके क्रांतिकारी साथियों की आत्माएं लगा रही हैं। श्री. राज ठाकरे अपने सहयोगियों के साथ साई पहाड़ पर गए। उन्होंने जंगल कटाई के खिलाफ सभा ली। कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल भी गए। राज्य के कम से कम दो करोड़ लोगों को साई जंगल में पहुंचना ही चाहिए!
जंगल कटाई का हास्यास्पद बचाव; व्यक्ति दो, विवरण एक ही
कर्जत पंप स्टोरेज परियोजना पर्यावरणपूरक परियोजना ही है
क्या है वस्तुस्थिति?
– यह गुजरात की परियोजना नहीं है, यह महाराष्ट्र की है। इस परियोजना से निवेश महाराष्ट्र में, रोजगार महाराष्ट्र में और पैदा होने वाली बिजली भी महाराष्ट्र में ही!
– इससे १२ हजार मेगावाट बिजली महाराष्ट्र को मिलेगी। ३० हजार करोड़ का निवेश इससे आएगा।
– यह कोयले पर आधारित परियोजना नहीं है, बल्कि सौर ऊर्जा पर आधारित है, इसलिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली नहीं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल है।
– पंप स्टोरेज परियोजना होने के कारण इसका स्थान निश्चित होता है। इसे कहीं और नहीं किया जा सकता।
– इस परियोजना को २३३ हेक्टेयर जमीन लगने वाली है, इसलिए वैकल्पिक वृक्षारोपण के लिए कंपनी ने वन विभाग को पहले ही २५३ हेक्टेयर जमीन सौंप दी है। उसके बाद ही वन विभाग ने अनुमति दी है।
– साथ ही अनुमति के लिए १८ महीने की पूरी वैधानिक प्रक्रिया पूरी की है। सभी संबंधित प्राधिकरणों की अनुमतियां संपूर्ण पर्यावरणीय अध्ययन के बाद प्राप्त हुई हैं।
– यह परियोजना रायगड जिले के कर्जत तालुका के सैदोनगर में भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य से लगभग १६ किमी दूर है। सभी परियोजना घटक अभयारण्य की सीमा के बाहर और इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) के बाहर हैं। इसलिए अभयारण्य में कोई पेड़ नहीं काटा जा रहा है और न ही कोई काम चल रहा है।
– यह परियोजना भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर से लगभग २० किमी दूर है। मंदिर के पास कोई भी परियोजना कार्य प्रस्तावित नहीं है।
– इस परियोजना से पीक आवर्स में स्वच्छ बिजली मिलेगी। इतनी बिजली पैदा करने के लिए सालाना लगभग ४.६ मिलियन टन कोयले का दहन टाला जाएगा।
– सालाना ४० लाख वाहनों से जितना कार्बन उत्सर्जन होता है, उतना इस परियोजना से टलेगा।
– इसी परियोजना क्षेत्र में टोरेंट कंपनी ६० हजार पेड़ लगाएगी और वन विभाग ने ३० हजार पेड़, पानी और जमीन बचाई है। सालाना लगभग १९.७ अरब लीटर कूलिंग वाटर, जो ४ लाख लोगों के लिए पर्याप्त है, वह इसमें बचाया गया है। इतनी क्षमता की परियोजना में सालाना लगभग १.६ मिलियन टन फ्लाई ऐश और ४०-५० हेक्टेयर नई ओपन-कास्ट माइनिंग होती है। वह इस पंप स्टोरेज परियोजना के कारण टाली गई है।

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