तारिक अहमद
राहुल गांधी ने मीडिया पर जो बात कही है, वह केवल मीडिया की आलोचना नहीं है। यह उस पत्रकारिता के सामने खड़ा किया गया आईना है, जिसमें कभी सत्ता से सवाल पूछना लोकतंत्र का पहला धर्म माना जाता था। आज वही मीडिया सत्ता के सामने ऐसा खड़ा दिखाई देता है, जैसे उसके सामने कोई सवाल नहीं, केवल सलाम करने की मजबूरी हो। आप थकते क्यों नही, आम वैâसे खाते हो चूसकर या काटकर, अभी संसद में गतिरोध चल रहा और गृहमंत्री से सवाल कि आपके कपड़ों का लुक बहुत शानदार है और वह मुस्कराहट भरी शैली में निकल जाते है। राहुल गांधी ने साफ कहा हमें बार-बार इंटरप्ट किया जाता है। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते? इस पर खामोशी चादर ओढ़कर निद्रा में गुम हो जाते है, आखिर उनसे इतना डर क्यों लगता है? यह सवाल असल में राहुल गांधी से ज्यादा मीडिया से है।
बेशर्मी!
पत्रकार का काम किसी नेता का भाषण सुनकर ताली बजाना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है, फिर उसका विश्लेषण करना। लेकिन यह सब बंद कर दिया है पालतू बनकर पत्रकारिता कर कह रहे हैं। हम पत्रकार हैं, शर्म मगर उनको नही आती। लोकतंत्र में पत्रकार जनता की आंख और कान होता था या है। जनता प्रधानमंत्री तक सीधे नहीं पहुंच सकती, गृहमंत्री से सवाल नहीं कर सकती, सत्ता के गलियारों में जाकर जवाब नहीं मांग सकती। वह यह काम पत्रकार के जरिए करती है। लेकिन जब पत्रकार ही सवाल पूछने से डरने लगें या पतल चाटने लगें तो जनता किससे पूछे? सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी को मीडिया से शिकायत क्यों है। सवाल यह है कि मीडिया को सत्ता से शिकायत क्यों नहीं है? राहुल गांधी को इंटरप्ट करना आसान है, लेकिन फिर भी वह हर सवाल का या बेहूदगी का जवाब बड़ी विनम्रतापूर्वक देते हैं। उनके सामने तीखे सवाल दागना आसान है। उनके बयान का एक शब्द पकड़कर घंटों बहस करना आसान है। क्योंकि विपक्ष सत्ता में नहीं है। उसके पास पुलिस नहीं है। जांच एजेंसियां नहीं हैं, सरकारी विज्ञापन नहीं हैं। प्रशासनिक ताकत नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से सवाल पूछना? वह शायद आज की पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ा जोखिम हो गया है। यही लोकतंत्र की सबसे खतरनाक विडंबना है, जिससे सवाल पूछा जाना चाहिए, उसके सामने माइक्रोफोन झुक जाता है और जिससे सवाल पूछने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं, उसके सामने माइक चीखने लगता है। मीडिया का डर केवल पत्रकार का निजी डर नहीं होता। यह धीरे-धीरे पूरे समाज का डर बन जाता है।
नैतिकता खत्म!
जब सत्ता से सवाल पूछनेवाले कम होते जाते हैं तो सत्ता जवाबदेही से मुक्त होती जाती है और जिस दिन सत्ता को लगे कि उससे कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा, उसी दिन लोकतंत्र का सबसे जरूरी पहिया जाम होने लगता है। हमारे पुरखों ने पत्रकारिता को सत्ता के बरक्स खड़े होने की नैतिक ताकत दी थी, जिसे हम खोते जा रहे है। पत्रकारिता सत्ता की गोद में बैठने या पालतू बनने के लिए नहीं, सत्ता की आंख में आंख डालकर पूछने के लिए होती है क्यों?
आज असली परीक्षा राहुल गांधी की नहीं, मीडिया की है। अगर पत्रकार प्रधानमंत्री से पूछ सकता है कि बेरोजगारी क्यों है, महंगाई क्यों है, संसद क्यों बाधित है, संस्थाओं पर सवाल क्यों उठ रहे हैं, युवाओं के सवालों का जवाब क्या है तो वह पत्रकार है और अगर वह विपक्ष से ही सवाल पूछता रहे, सत्ता के सामने पहुंचते ही सवाल भूल जाए, दुम हिलाने लगे तो फिर वह पत्रकार नहीं, सत्ता का प्रवक्ता भर रह जाता है।
जल चुकी है मशाल!
राहुल गांधी का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह केवल एक नेता की शिकायत नहीं है। यह जनता का सवाल है। आखिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह से सवाल पूछने में इतना डर क्यों लगता है? उनसे पूछा जा सकता था संसद में गतिरोध खत्म करने के लिए यह बताया जा सकता है कि छात्रों पर पैलेट गन, कीलें लगी लाठी चलाने का बर्बरतापूर्ण आदेश किसने दिया था। क्या यह गृह मंत्री का आदेश है या नहीं आसान सा सवाल है लोकतंत्र में सत्ता बड़ी हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता उससे छोटी या पालतू नहीं होनी चाहिए। क्योंकि जिस दिन मीडिया सत्ता के सामने चूहे जैसा खड़ा हो जाए, उस दिन लोकतंत्र के दरवाजे पर बिल्ली कौन बनेगी यह सवाल जनता को खुद से पूछना पड़ेगा। लें मशालें लेकर चल पड़े हैं बच्चे मेरे देश के, अब वह अपना भविष्य और आनेवाली नस्लों को लेकर फिक्रमंद है।
