मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : नफरत का जवाब सिर्फ योग्यता

इस्लाम की बात : नफरत का जवाब सिर्फ योग्यता

 

सैयद सलमान
मुंबई
देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में कभी-कभी ऐसा दौर आता है, जब कुछ समुदायों को संदेह, पूर्वाग्रह या नफरत के चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है। मुस्लिम समाज अक्सर ऐसी परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फंसता रहा है। ऐसे माहौल में आक्रोश या भावुक प्रतिक्रियाएं आना स्वाभाविक है, लेकिन इतिहास गवाह है कि किसी भी समाज ने सम्मान, प्रभाव और स्थायी पहचान आक्रामकता के बजाय शिक्षा, क्षमता और अपने नेतृत्व के बल पर हासिल की है। आज विरोध या तीखी प्रतिक्रिया देने का वक्त नहीं है। यह समय आत्मनिरीक्षण, सृजन और तैयारी का है। अगर किसी समाज को अपने प्रति बनी नकारात्मक धारणाओं की दीवार को ढहाना है तो उसका सबसे सटीक उत्तर ज्ञान, योग्यता और उत्कृष्ट उपलब्धियां ही हो सकती हैं।
राष्ट्र निर्माण में भागीदारी
​किसी भी पिछड़े या हाशिए पर खड़े वर्ग को आगे बढ़ाने का सबसे कारगर तरीका उसे बैसाखियां देना नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाना है। इसी सोच के साथ अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि मुस्लिम समाज के भीतर शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा और सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं को प्राथमिकता दी जाए। यह कवायद चंद युवाओं को प्रशासनिक कुर्सियों पर बैठाने तक सीमित न होकर, पूरे समाज के भीतर आत्मविश्वास जगाने, नया नेतृत्व तैयार करने और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी बढ़ाने का एक बड़ा आंदोलन होना चाहिए।
​भारतीय प्रशासनिक सेवाओं और अन्य शीर्ष सरकारी पदों पर मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व हमेशा से चर्चा के केंद्र में रहा है। तमाम सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्ट बताती हैं कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन ने युवाओं के एक बड़े हिस्से को उन मंचों से दूर रखा, जहां नीतियां बनती हैं और देश का प्रशासन तय होता है। इस खाई को पाटने के लिए खोखली राजनीतिक बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। इसके लिए समाज के भीतर एक गंभीर, जमीनी और शैक्षणिक क्रांति की दरकार है। ​अक्सर प्रतिभाओं के दम तोड़ने की वजह अवसरों की कमी नहीं होती, बल्कि सही जानकारी और मार्गदर्शन का अभाव होता है। आज की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि मेधावी और मेहनती युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुकम्मल संसाधन, सही दिशा और प्रेरणा मिले। देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों, अनुभवी शिक्षकों और सफल प्रशासनिक अधिकारियों के अनुभवों को जोड़कर एक ऐसा ढांचा तैयार किया जा सकता है जो युवाओं के हुनर को तराश सके।
​सिविल सेवा में चयन का एकमात्र पैमाना योग्यता, कठिन परिश्रम और कड़ी प्रतिस्पर्धा है। इसलिए मुस्लिम युवाओं को इस कसौटी पर खरा उतरने के लायक बनाना कोई विशेषाधिकार या खैरात नहीं है। यह उन्हें समान अवसरों की दौड़ में शामिल होने के लिए सशक्त बनाना है। जब विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए लोग व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं तो शासन ज्यादा संवेदनशील, व्यावहारिक और समावेशी बनता है। विविधता महज कागजी प्रतिनिधित्व का मामला नहीं है, बल्कि यह बेहतर और निष्पक्ष प्रशासन की बुनियादी जरूरत है।
आर्थिक आंकड़े पैमाना नहीं!
​शिक्षा की ताकत यह है कि इसका असर किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। जब किसी परिवार का कोई बच्चा उच्च शिक्षा पाता है या किसी प्रतिष्ठित पद पर पहुंचता है तो उसकी पूरी नस्ल सुधर जाती है। सोच का दायरा बदलता है, उम्मीदें परवान चढ़ती हैं और समाज में तरक्की की एक नई संस्कृति जन्म लेती है। इसलिए शिक्षा को सिर्फ नौकरी पाने का जरिया मान लेना उसकी अहमियत को कमतर आंकना होगा। शिक्षा दरअसल सामाजिक बदलाव का सबसे अचूक हथियार है।
​मुस्लिम समाज के लिए भी यह समय अपनी प्राथमिकताओं को दोबारा तय करने का है। दान, पुण्य और आपसी सहयोग की सामाजिक परंपराएं अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन यदि समाज अपनी ऊर्जा और संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगाए तो इसके नतीजे ज्यादा दूरगामी और स्थायी होंगे। फौरी मदद किसी व्यक्ति का आज का संकट तो टाल सकती है मगर शिक्षा उसकी आनेवाली पीढ़ियों की तकदीर बदल देती है।
​किसी भी राष्ट्र की मजबूती का पैमाना उसकी ऊंची इमारतें या आर्थिक आंकड़े नहीं होते। देश की असली ताकत इसमें है कि उसका हर नागरिक खुद को मुख्यधारा का हिस्सा और राष्ट्र की प्रगति का बराबर का साझेदार समझे। जब हर वर्ग को अवसरों, जिम्मेदारियों और नेतृत्व में अपनी हिस्सेदारी दिखने लगती है, तब लोकतंत्र वाकई मजबूत होता है।
​वक्त का तकाजा है कि मुस्लिम युवा अपनी ऊर्जा को शिकायतों में जाया करने के बजाय तैयारियों में झोंक दें। प्रतिक्रिया देने से बेहतर है कि वे अपनी उपलब्धियों से बात करें और परिस्थितियों को कोसने के बजाय उन्हें अपनी ताकत से बदलें। नफरत का सबसे करारा जवाब नफरत नहीं, बल्कि शिक्षा, योग्यता और उत्कृष्टता है। यही वह सीधा रास्ता है जो समाज को गरिमा भी दिलाएगा और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका वâो भी सार्थक करेगा।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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