-भारत में भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी चरम पर
भारत के अहम पड़ोसी नेपाल की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। जहां सोशल मीडिया बैन को लेकर शुरू हुआ जेन-जेड आंदोलन ने हिंसक रूप लिया है वहीं आंदोलन ने इतना व्यापक रूप लिया कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा है। इससे पहले नेपाल के गृह, कृषि और स्वास्थ्य मंत्री समेत पांच मंत्रियों का इस्तीफा सामने आया था। नेपाल में भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई ने युवाओं को आंदोलित करने पर मजबूर किया है। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार का सामना कर रहे नेपाली युवाओं ने हाल ही में बांग्लादेश में हुए सड़क आंदोलनों को देखा है। उससे पहले श्रीलंका के आंदोलन को भी देखा है। ऐसे में बेरोजगार युवक नेताओं का विलासिताभरा जीवन और तानाशाही कब तक बर्दाश्त करते। आखिरकार, युवकों के आक्रोश के आगे ओली सरकार को झुकना ही पड़ा। पड़ोसी देश नेपाल की घटना का हिंदुस्थान पर भी असर पड़ने की बात कही जा रही है। यहां के लोग भी वर्तमान उद्योगपतियों की चहेती और तानाशाही वाली सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। इस संदर्भ में प्रस्तुत है कुछ मुंबईकरों के आक्रोश भरे विचार।
भारतीय युवाओं में भी आक्रोश
नेपाल में भ्रष्टाचार के चलते बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुंच गई और युवाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाकर भ्रष्टाचारी सरकार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। लोकतंत्र बचाने के लिए देश के युवा संगठित होकर अपनी आवाज उठा रहे हैं, इसी तरह की स्थिति हमारे देश में बेरोजगारी को लेकर है, जिससे इस तरह के हालात बन सकते है, क्योंकि भारत में आज भी युवा डिग्री लेकर घूम रहे है, आत्महत्या कर रहे है, जिनके पास रोजगार नहीं हैं। हालांकि हिंसा इसका मार्ग नहीं है।
– एडवोकेट पंकज मिश्रा
-मोदी सरकार रहे सतर्क
नेपाल की मौजूदा स्थिति बेहद दुखद और हृदयविदारक है। मंत्रियों के घरों, संसद और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय पर हुए हमले इस बात को दर्शाते हैं कि समाज पीड़ा में है और युवा अपनी आवाज बुलंद करना चाहते हैं। यह केवल राजनीति का नहीं, बल्कि मानवीय संकट है। जहां जीवन खोए जा रहे हैं, परिवार भय में जी रहे हैं और एक पूरी पीढ़ी गरिमा, स्वतंत्रता और उम्मीद की तलाश में है। भारत में इस तरह का माहौल न बने, इस तरह की मुसीबतों से बचने के लिए सरकार को सतर्क रहना होगा।
– डॉ. अजय एल. दुबे,
-लोगों में भारी गुस्सा व निराशा
नेपाल में भड़की हिंसा का मुख्य कारण कई कारकों का मिला-जुला परिणाम है। सरकार द्वारा सोशल मीडिया ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के पैâसले ने एक तत्काल चिंगारी का काम किया। इस प्रतिबंध से युवाओं, विशेषकर जेन-जी के लोगों में भारी गुस्सा और निराशा पैदा हुई, जो अपनी आजीविका और अभिव्यक्ति के लिए इन प्लेटफार्मों पर बहुत अधिक निर्भर थे। भारत में भी महंगाई से परेशान लोग लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार से लोग तंग आ चुके हैं।
– हरीश सिंह, पत्रकार
संस्थापक अध्यक्ष, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
-सरकार संभल जाए
नेपाल में जिस तरह जनता का सब्र टूटा और सड़कों पर सरकार के खिलाफ उबाल फूटा, वैसा ही मंजर हिंदुस्थान में भी दिखाई देने से इनकार नहीं किया जा सकता है। नरेंद्र मोदी सरकार पर लगातार महंगाई, बेरोजगारी और कर्ज के बोझ से त्रस्त जनता का आक्रोश तेज हो रहा है। देशभर में विरोध-प्रदर्शन और जनसभाओं में आम लोग अब खुलकर सवाल पूछ रहे हैं कि नौकरी कहां हैं? महंगाई कब रुकेगी? हर घर विकास का वादा कहां गया? विकास के नाम पर जनता पर कर्ज का बोझ डालने और कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने की नीति से लोगों में भारी असंतोष है।
– नवीन प्रसाद, गोरेगांव निवासी
-देश में न गरमाने पाए माहौल
मोदी सरकार जिस तरह जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रही है, उसी का नतीजा है कि गुस्सा अब सड़कों पर फूट रहा है। विपक्ष भी इसे हवा दे रहा है और साफ कह रहा है कि अब जनता सवाल पूछेगी और जवाब भी लेगी। नेपाल की तरह हिंदुस्थान में भी माहौल गर्माने लगा है। अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आनेवाले महीनों में बड़े जनआंदोलन खड़े हो सकते हैं।
– रोशन शाह, मालाड, निवासी
-युवकों का गुस्सा जायज; मार्ग गलत
नेपाल में हाल की घटनाएं यह दिखाती हैं कि जब फेसबुक, व्हॉट्सएप, यूट्यूब और एक्स सहित २६ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाया गया तो युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना। जेन-जी की मांगें केवल डिजिटल पहुंच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही की भी अपेक्षा कर रहे हैं।
-मनीष गुप्ता, प्रतियोगी छात्र
-गंभीर चेतावनी की तरह लिया जाए
नेपाल की घटना भारत को यह संदेश देती है कि जनता को दबाने की बजाय, उससे संवाद करना लोकतंत्र की कुंजी है। युवाओं की आवाज को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। भ्रष्टाचार और वंशवाद जैसे मुद्दे राजनीति को कभी भी अस्थिर कर सकते हैं। भारत के नेताओं और दलों को इसे सिर्फ पड़ोसी का संकट न मानकर, अपने लोकतांत्रिक ढांचे और भविष्य की राजनीति के लिए एक गंभीर चेतावनी की तरह लेना चाहिए।
-एडवोकेट आनंद उपाध्याय
-भारतीय युवकों में भी गुस्सा
भारतीय युवाओं को अपने पड़ोसियों से सीखना चाहिए कि वैâसे जानकारी प्राप्त करके, डिजिटल स्वतंत्रता का समर्थन करके और रचनात्मक संवाद में शामिल होकर आप क्षेत्र में जवाबदेही और न्याय के लिए एक व्यापक आंदोलन में योगदान दे सकते हैं। नेपाल की जनरेशन जेड का साहस भारतीय युवाओं को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकता है कि वे अपने समुदायों में परिवर्तन की वकालत वैâसे करें, साथ ही सीमाओं के पार एकजुटता को वैâसे बढ़ावा दें।
-मोहम्मद हदीस सिद्दीकी, सामाजिक कार्यकर्ता
-जनता की परेशानी से कोई मतलब नहीं
नेपाल के लिए असली जरूरत स्थायी और पारदर्शी शासन की है, जहां जनता की आकांक्षाएं राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर रखी जाएं। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब संस्थाएं स्थिर हों और निर्णय दीर्घकालिक विकास पर केंद्रित हों। नेपाल को अब आंतरिक एकता और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। भारत में भी सरकार को जनता की परेशानी से कोई मतलब नहीं है।
-उमेश उपाध्याय, समाजसेवक
-भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध
नेपाल में हालत बहुत गंभीर हैं। जहां पर यह हिंसा सोशल मीडिया के बारे में नहीं, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में है। यह विरोध भ्रष्टाचार के खिलाफ है। ये टूटे हुए घरों, टूटे हुए सिस्टम और टूटे हुए वादों की बात है, हम भारतीय भी अब इसके शिकार होते हुए नजर आ रहे है। जहां महंगाई की मार झेल रहे, जबकि ताकतवर लोग आम जनता के पसीने पर पलते हैं।
– मनन हितेंद्र पारेख, समाजसेवक
