सैयद सलमान / मुंबई
आधुनिक तकनीक ने इंसान की जिंदगी को काफी हद तक आसान बना दिया है। आज दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से कुछ ही सेकंड में संपर्क किया जा सकता है। दीन-दुनिया की तमाम बातें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। लेकिन तकनीक के इस विस्तार ने कई नई सामाजिक और कानूनी चुनौतियां भी पैदा की हैं।
हाल ही में झारखंड के एक जागरूक नागरिक ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को पत्र लिखकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उसने पूछा है कि क्या व्हॉट्सऐप, फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भेजा गया तलाक का संदेश वैध और विश्वसनीय माना जा सकता है?
‘फैसलों’ पर सवाल!
यह सवाल महज धार्मिक या कानूनी नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और मानवीय संबंधों से भी जुड़ा हुआ है। विवाह किसी सामान्य अनुबंध का नाम नहीं है। यह विश्वास, जिम्मेदारी और सामाजिक स्वीकार्यता पर आधारित एक गंभीर संबंध है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति मोबाइल फोन पर एक संदेश भेजकर इस रिश्ते को समाप्त करने का दावा करे तो उसकी सत्यता और वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वैसे भी तलाक का यह तरीका मुस्लिम समाज को हंसी का पात्र बनाता है।
डिजिटल दुनिया में पहचान की पुष्टि हमेशा आसान नहीं होती। मोबाइल फोन चोरी हो सकता है, सोशल मीडिया अकाउंट हैक हो सकता है, किसी व्यक्ति के नाम से फर्जी संदेश भेजे जा सकते हैं और अब तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से नकली ऑडियो और वीडियो भी तैयार किए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में सिर्फ एक डिजिटल संदेश को अंतिम और निर्णायक प्रमाण मान लेना किसी भी मुस्लिम महिला के लिए गंभीर अन्याय का कारण बन सकता है।
चिंता की बात यह है कि कई मामलों में बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के ऐसे संदेशों को आधार बनाकर सामाजिक या पारिवारिक पैâसले कर दिए जाते हैं। कई बार स्थानीय स्तर पर दोनों पक्षों की बात सुने बिना निष्कर्ष निकाल लिया जाता है। इसका सबसे अधिक नुकसान महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ता है। एक गलतफहमी या तकनीकी गड़बड़ी पूरे परिवार को संकट में डाल सकती है।
साफ दिशा-निर्देश की दरकिनार
किसी भी वैवाहिक विवाद में सबसे पहले संवाद, समझौते और सुलह की संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए। दुनिया के लगभग सभी सभ्य समाजों और धार्मिक परंपराओं में यही सिद्धांत अपनाया गया है। इस्लाम भी पारिवारिक स्थिरता और आपसी समझ को महत्व देता है। तलाक को पहली प्रतिक्रिया के बजाय अंतिम विकल्प माना गया है। इस्लाम में तलाक की अनुमति तो दी गई है, लेकिन इसे सख्त नापसंदीदा अमल बताया गया है। तलाक लेने या देने के लिए कई शर्तों की कसौटी पर पूरा उतरना जरूरी होता है। इसलिए किसी क्षणिक आवेश में भेजे गए संदेश को तुरंत प्रभाव से लागू कर देना न तो सामाजिक दृष्टि से उचित लगता है और न ही इस्लाम की धार्मिक भावना के अनुरूप।
आज जरूरत इस बात की है कि तकनीक से जुड़े इन नए प्रश्नों पर गंभीर और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाए। धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और मुस्लिम समाज के जिम्मेदार लोगों को मिलकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करना चाहिए। यदि तलाक या किसी अन्य महत्वपूर्ण निर्णय का आधार डिजिटल माध्यम हो, तो उसकी प्रामाणिकता की जांच के लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की जानी चाहिए। स्क्रीन पर दिखाई देनेवाले संदेश के आधार पर किसी रिश्ते का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। यह कुरआन की तालीम के भी विरुद्ध है।
डिजिटल साक्षरता की जरूरत
साथ ही समाज में डिजिटल साक्षरता बढ़ाने की भी आवश्यकता है। खासकर मुस्लिम समाज को इस विषय पर गंभीर मंथन करना होगा। मुस्लिम युवाओं को यह समझाना होगा कि सोशल मीडिया तो बस संवाद का माध्यम है। यह जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों का विकल्प नहीं हो सकता। परिवार, विवाह और सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़े मामलों में प्रत्यक्ष संवाद, गवाह, मध्यस्थता और उचित प्रक्रिया का महत्व कभी कम नहीं हो सकता।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित मुस्लिम समाज की सभी संबंधित संस्थाओं के सामने यह एक महत्वपूर्ण अवसर है कि वे समय की जरूरत को समझते हुए स्पष्ट और व्यावहारिक नीति तैयार करें। तकनीक को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन उसे बिना जांचे-परखे अंतिम सत्य भी नहीं माना जा सकता।
डिजिटल युग में सबसे बड़ी जरूरत संतुलन की है। तकनीक की सुविधाओं का लाभ उठाना चाहिए, लेकिन साथ ही सत्य, न्याय और मानवीय संवेदनशीलता के मूल्यों को भी सुरक्षित रखना चाहिए। जब तक यह संतुलन कायम नहीं होगा, तब तक तकनीक लोगों को जोड़ने के बजाय रिश्तों को तोड़ने का माध्यम भी बन सकती है। पवित्र वैवाहिक संबंधों की गरिमा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हर निर्णय जल्दबाजी के बजाय विवेक, प्रमाण और न्याय के आधार पर लिया जाए।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉाfनक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।
