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फलसफा : `ना’ कहना सीख लिया है…

सना खान

खुद को खोने के बाद और फिर वापस पाने के बाद कुछ चीजें हमेशा के लिए बदल जाती हैं। अब हम पहले जैसे नहीं रहते, न हर बात दिल पर लेते हैं, न हर रिश्ते को जरूरी समझते हैं। अब हम हर किसी के लिए नहीं रुकते, हर किसी को अपने करीब नहीं आने देते। क्योंकि अब समझ आ गया है कि हर रिश्ता निभाने के लिए नहीं होता, कुछ रिश्ते सिर्फ सिखाने के लिए होते हैं। पहले हम डरते थे, किसी के चले जाने से। अब हम डरते हैं, खुद के खो जाने से। पहले हम चुप हो जाते थे, ताकि रिश्ता बच जाए। अब हम चुप नहीं रहते, ताकि हम खुद बचे रहें। अब हम हर बात समझाने की कोशिश नहीं करते हैं, हर किसी को मनाने की कोशिश नहीं करते। क्योंकि अब पता है, जो समझना चाहता है,
उसे समझाने की जरूरत नहीं होती और जो नहीं समझना चाहता उसे समझाना खुद को थकाना होता है। हमने सीखा है, ‘ना’ कहना गलत नहीं होता, गलत होता है हर बार ‘हां’ कहकर खुद को नजरअंदाज करना। अब हम हर किसी के लिए मौजूद नहीं रहते, हर किसी को अपनी जिंदगी में जगह नहीं देते, हर किसी को अपने अंदर तक नहीं आने देते। क्योंकि अब समझ आ गया है, हर इंसान हमारी शांति के लायक नहीं होता। अब हम खुद को बचाते हैं, लोगों से नहीं, अपनी पुरानी आदतों से। उन आदतों से जो हमें बार-बार खुद से दूर ले जाती थीं। अब, हम रुकते नहीं, झुकते नहीं, हम बस खुद के साथ खड़े रहते हैं। चाहे सामने कोई हो, या कोई न हो। और अगर कभी किसी रिश्ते और खुद के बीच चुनना पड़े, तो अब हम खुद को चुनते हैं। क्योंकि अब समझ आ गया कि खुद को बचाना किसी भी रिश्ते से ज्यादा जरूरी है और अब अगर कोई हमें छोड़ भी दे, तो भी हम खुद को नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि अब हमें किसी और ने नहीं, हमने खुद को खोया था।

 

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