मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा : खामोशी के पीछे का दर्द

फलसफा : खामोशी के पीछे का दर्द

सना खान

हर इंसान की जिंदगी में एक ऐसा कोना होता है जहां वो दुनिया से छुपकर खुद से लड़ रहा होता है। कुछ लड़ाइयां चेहरे पर दिखाई नहीं देतीं। उनमें न खून बहता है, न आवाज होती है फिर भी वो इंसान को धीरे-धीरे अंदर से खत्म कर देती हैं। आज की दुनिया में लोग थक शरीर से कम, दिमाग और भावनाओं से ज्यादा रहे हैं। हर दिन उम्मीदों का बोझ, रिश्तों की उलझन, अकेलेपन का डर, खुद को साबित करने की दौड़ इंसान को इतना थका देती है कि वो मुस्कुराना तो सीख जाता है, लेकिन खुश रहना भूल जाता है। सबसे खतरनाक दर्द वही होता है जो किसी को दिखाई नहीं देता। वो इंसान जो सबको हंसाता है, हर किसी का सहारा बनता है, हर वक्त ‘मैं ठीक हूं’ कहता है। कई बार वही रात में सबसे ज्यादा टूटकर रोता है। क्योंकि कुछ लोग अपना दर्द बताना नहीं सीख पाते। उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें समझेंगे नहीं, कमजोर कहेंगे या मजाक बना देंगे। धीरे-धीरे वो चुप होना सीख जाते हैं। इतना चुप कि एक दिन उनकी खामोशी उनकी पहचान बन जाती है। मानसिक दर्द हमेशा आंसुओं में नहीं दिखता। कभी-कभी वो बिना वजह गुस्से में, बिना कारण दूरी बनाने में, या हर किसी से कट जाने में दिखाई देता है। कुछ लोग मदद नहीं मांगते क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद अब कोई समझ ही नहीं पाएगा। और सच तो यह है कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा अकेला वही इंसान होता है जो हर किसी के बीच रहकर भी अपना दर्द किसी से कह नहीं पाता। हमें लोगों की जिंदगी नहीं बदलनी, बस इतना करना है कि जब कोई अंदर से टूट रहा हो, तो उसे यह महसूस न होने दें कि वो अकेला है। क्योंकि कई बार एक बातचीत, एक अपनापन, एक ‘मैं तुम्हारे साथ हूं’ किसी इंसान को बिखरने से बचा सकता है। और याद रखिए हर शांत दिखने वाला इंसान अंदर से सुकून में हो, यह जरूरी नहीं। कुछ लोग सिर्फ इसलिए खामोश होते हैं क्योंकि उनके दर्द को शब्द नहीं मिलते। (हर मानसिक स्थिति ‘पागलपन’ नहीं होती। कई बार इंसान सिर्फ मानसिक रूप से थका हुआ, टूटा हुआ या बेहद अकेला होता है। इसलिए मानसिक संघर्ष को मजाक नहीं, समझ और सहारे की जरूरत होती है।)

अन्य समाचार