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फलसफा : अनकहे जख्म

सना खान

हर बड़ा इंसान अपने अंदर एक अधूरा बचपन लेकर चलता है। एक ऐसा बचपन जो शायद कभी खुलकर हंस नहीं पाया, कभी बिना डर के जी नहीं पाया, कभी अपने दर्द को शब्द नहीं दे पाया। कुछ बच्चों के हिस्से खिलौने नहीं आते जिम्मेदारियां आ जाती हैं। कुछ बच्चों को प्यार से ज्यादा डांट मिलती है। कुछ को समझने से ज्यादा तुलना मिलती है। और कुछ बच्चे इतना अकेलापन देख लेते हैं कि कम उम्र में ही खामोशी उनकी आदत बन जाती है। लोग कहते हैं, ‘अब तो तुम बड़े हो गए हो’ लेकिन कोई यह नहीं समझता कि कुछ दर्द उम्र के साथ खत्म नहीं होते। वो इंसान के स्वभाव में उतर जाते हैं। बचपन में सुने गए शब्द सालों बाद भी इंसान के अंदर गूंजते रहते हैं। ‘तुम किसी काम के नहीं हो’ ‘तुमसे कुछ नहीं होगा’ ‘दूसरों जैसे क्यों नहीं बन सकते?’ शायद कहने वाले भूल जाते हैं, लेकिन सुनने वाला बच्चा उन्हें पूरी जिंदगी याद रखता है। फिर वही बच्चा बड़ा होकर हर रिश्ते में खुद को साबित करने लगता है। हर जगह अपनापन ढूंढता है। हर छोटी नजरअंदाजी से टूट जाता है। क्योंकि उसके अंदर आज भी वो बच्चा बैठा है जो सिर्फ एक बार समझा जाना चाहता था। कुछ लोग जरूरत से ज्यादा समझदार इसलिए लगते हैं क्योंकि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में दर्द देख लिया होता है। वो रोना बंद कर देते हैं, लेकिन दर्द महसूस करना नहीं। वो लोगों के बीच रहना सीख जाते हैं, लेकिन किसी पर भरोसा करना नहीं। और सबसे दुखद बात यह है कि कई लोग पूरी जिंदगी अपने बचपन की कमी को भरने में निकाल देते हैं। किसी को प्यार की कमी सताती है, किसी को अपनापन, किसी को सुरक्षा, तो किसी को सिर्फ यह एहसास कि वो भी किसी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बचपन की चोटें इंसान को सिर्फ दुखी नहीं करतीं वो उसका पूरा व्यक्तित्व बदल देती हैं। कुछ लोग गुस्सैल बन जाते हैं, कुछ बेहद खामोश, कुछ लोगों से दूर भागने लगते हैं और कुछ हर किसी को खुश रखने में खुद को खो देते हैं। लेकिन सच यह है कि हर टूटे हुए इंसान के पीछे कोई न कोई अधूरा बचपन होता है। इसलिए जब भी किसी को परखें, उसके व्यवहार से पहले उसकी कहानी समझने की कोशिश कीजिए। क्योंकि कई लोग आज भी बड़े शरीर में एक डरे हुए बच्चे की तरह जी रहे हैं। और कुछ बच्चे उम्र बढ़ने के बाद भी कभी सच में बड़े नहीं हो पाते। (हर मानसिक स्थिति ‘पागलपन’ नहीं होती। कई बार इंसान सिर्फ मानसिक रूप से थका हुआ, टूटा हुआ या बेहद अकेला होता है। इसलिए मानसिक संघर्ष को मजाक नहीं, समझ और सहारे की जरूरत होती है।)

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