मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा : ‘हम सच नहीं, चुप रहने वालों को पसंद करते हैं’

फलसफा : ‘हम सच नहीं, चुप रहने वालों को पसंद करते हैं’

सना खान

कभी आपने महसूस किया है कि जो सच बोलता है, वह अक्सर पसंद नहीं किया जाता और जो चुप रहता है, उसे ‘अच्छा इंसान’ कह दिया जाता है। हम कहते हैं हमें ईमानदारी चाहिए, हमें सच्चाई पसंद है। लेकिन जब कोई सच बोल देता है तो वही सच्चाई हमें चुभने लगती है।
क्योंकि सच हमेशा सहज नहीं होता, वह हमें असहज करता है। वह हमें आईना दिखाता है और सच यह है हमें आईना पसंद नहीं, हमें अपनी बनाई हुई छवि पसंद है। हम ऐसे लोगों को पसंद करते हैं, जो हमें गलत होने का एहसास न दिलाएं। जो हमारी बातों से सहमत रहें जो हमें चुनौती न दें जो हमें हमारे ही नजरिए में सही बनाए रखें। इसलिए हम उन लोगों के साथ सहज रहते हैं जो हमें वैसे ही रहने दें जैसे हम हैं चाहे वो सही हो या नहीं और जो यह सब नहीं करते उन्हें हम ‘रूखा’, ‘अहंकारी’ या ‘समझ से बाहर’ कह देते हैं। सच बोलने वाला इंसान अक्सर गलत नहीं होता बस असुविधाजनक होता है। क्योंकि वह वहां बोलता है जहां हम चुप रहना चाहते हैं। वह वहां सवाल उठाता है जहां हम नजरें फेर लेते हैं और यही उसकी सबसे बड़ी ‘गलती’ बन जाती है वह हमें हमारे ही सामने खड़ा कर देता है। धीरे-धीरे हम एक ऐसी दुनिया बना लेते हैं, जहां सच बोलना जोखिम बन जाता है और चुप रहना समझदारी। जहां सच्चाई की कीमत स्वीकार्यता से चुकानी पड़ती है और इसी डर में बहुत से लोग सच जानते हुए भी चुप रहना चुन लेते हैं। क्योंकि उन्हें पता होता है कि सच बोलने से रिश्ते टूट सकते हैं, लोग दूर हो सकते हैं और सबसे ज्यादा उन्हें ‘गलत’ ठहराया जा सकता है। लेकिन एक और सच है चुप रहकर हम रिश्ते तो बचा लेते हैं, पर धीरे-धीरे खुद से दूर होते जाते हैं। हर बार जब हम सच दबाते हैं हम थोड़ा-थोड़ा अपने ही खिलाफ खड़े हो जाते हैं और एक दिन हमारे शब्द नहीं, हमारी पहचान ही बदल जाती है, लेकिन क्या सच बदल जाता है अगर हम उसे बोलना छोड़ दें? या फिर हम ही धीरे-धीरे उससे दूर हो जाते हैं? सच यह है हम सच से नहीं डरते हम उस असुविधा से डरते हैं जो सच हमारे भीतर पैदा करता है। क्योंकि सच हमें सिर्फ दिखाता नहीं वह, हमसे जवाब भी मांगता है और जवाब देना हमारी सबसे बड़ी मुश्किल है। इसलिए हम उन लोगों को चुनते हैं जो हमें सुकून दें, सच्चाई नहीं। लेकिन सुकून और सच हमेशा साथ नहीं चलते। सुकून आपको वैसे ही रहने देता है तथा सच आपको बदलने पर मजबूर करता है। और शायद हमारी सबसे बड़ी आदत यही बन चुकी है हम सुकून चुनते हैं, सच नहीं। कभी-कभी जो हमें अच्छा लगता है वह सही नहीं होता। और जो सही होता है वह हमें अच्छा नहीं लगता। और शायद यहीं हम फैसला लेते हैं सच सुनना है या सुकून में रहना है। शायद फलसफा इतना ही है हम सच बोलने वालों को नहीं चुप रहने वालों को पसंद करते हैं। क्योंकि सच हमें बदलता है और हम बदलना नहीं चाहते। और अंत में शायद हम सच से नहीं भागते हम उस इंसान से भागते हैं, जो सच सुनने के बाद बनना पड़ेगा।

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