सना खान
शाम के करीब आठ बजे थे। मुंबई की लोकल से उतरकर आरव अपने फ्लैट की ओर बढ़ रहा था। स्टेशन के बाहर भीड़ थी, सड़क पर गाड़ियां थीं और आसपास हजारों लोग थे। फिर भी उसके फोन की स्क्रीन पर एक ही सवाल बार-बार उभर रहा था ‘आज किससे बात करूं?’ कमरे में पहुंचकर उसने बैग रखा। खाना मंगाया और मोबाइल खोल लिया। सामाजिक माध्यमों पर तस्वीरें देखता रहा। किसी दोस्त की शादी थी, कोई छुट्टी पर था, कोई दोस्तों के साथ बाहर था। उसने फोन बंद कर दिया। कुछ सेकंड बाद फिर खोल लिया।
तभी उसकी नजर एक ऐसी सेवा पर पड़ी, जहां कुछ घंटों के लिए किसी को संगत के लिए बुक किया जा सकता था। आरव ने पहले इसे मजाक समझा।
फिर सोचा-‘क्यों नहीं?’ उसने एक घंटे के लिए एक साथी बुक किया।
अगले दिन दोनों एक वैâफे में मिले। सामने बैठा व्यक्ति उसके लिए बिल्कुल अजनबी था। कोई पुराना परिचय नहीं था, कोई साझा दोस्त नहीं था। फिर भी दोनों ने चाय पी, काम और शहर की बातें कीं और कुछ देर हंसे। एक घंटे बाद मुलाकात खत्म हो गई।
सामने वाला चला गया। आरव भी घर लौट आया। लेकिन रास्ते भर उसके मन में एक सवाल घूमता रहा- ‘आज मेरे पास किसी से बात करने के लिए पैसे थे, लेकिन क्या मेरे पास किसी अपने के लिए समय नहीं था?’
अप्रैल २०२६ में एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी सेवाओं के लिए लगभग ६०० से २,००० रुपए प्रति घंटे तक शुल्क लिया जा रहा है।
जून २०२६ में दिल्ली में एक ‘रेंट-अ-बॉयप्रâेंड’ अनुभव सोशल मीडिया पर चर्चा में आया। एक महिला ने खरीदारी के लिए एक पुरुष साथी को बुक करने का अनुभव साझा किया। हालांकि, संबंधित मंच खुद को बॉयप्रâेंड किराये पर देने वाली सेवा के रूप में नहीं, बल्कि संगत और सहायता सेवाएं देने वाले मंच के रूप में प्रस्तुत करता है।
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। संगत खरीदना और रिश्ता खरीदना एक ही बात नहीं है। किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए साथ पाने की सुविधा हो सकती है, लेकिन उस सुविधा को भावनात्मक रिश्ते का विकल्प मान लेना एक अलग बात है।
