मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका :  भारतीय राजनीति में उभरती एक नई ताकत!

पॉलिटिका :  भारतीय राजनीति में उभरती एक नई ताकत!

के.पी. मलिक

भारतीय राजनीति में समय-समय पर ऐसे चेहरे और आंदोलन सामने आते रहे हैं, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों और स्थापित नेतृत्व को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया और युवाओं के बीच चर्चा का विषय बने अभिषेक दीपके तथा उनकी कथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) को लेकर भी इसी तरह के सवाल उठने लगे हैं। ६ जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक गलियारों में उत्सुकता बढ़ गई है। सवाल यह नहीं है कि यह प्रदर्शन कितना बड़ा होगा, बल्कि यह है कि क्या यह एक क्षणिक सोशल मीडिया आंदोलन है या फिर भारतीय राजनीति में किसी नए राजनीतिक प्रयोग की शुरुआत?
कौन-सी जमीन पर आंदोलन?
किसी भी नए राजनीतिक आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जनता की किस चिंता को आवाज देता है। अभिषेक दीपके का संदेश मुख्यत: युवाओं, बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों, परीक्षा प्रणाली, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई देता है। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर उन्हें समर्थन देने वालों में बड़ी संख्या युवा वर्ग की बताई जाती है।
भारत की लगभग ६५ प्रतिशत आबादी ३५ वर्ष से कम उम्र की है। ऐसे में यदि कोई आंदोलन युवाओं के असंतोष को संगठित रूप से राजनीतिक अभिव्यक्ति देने में सफल हो जाता है, तो वह चुनावी राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। हालांकि, सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक राजनीतिक ताकत में बड़ा अंतर होता है। लाखों फॉलोअर्स होना और लाखों लोगों को सड़क पर उतार पाना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए ६ जून का प्रदर्शन इस आंदोलन की वास्तविक ताकत का पहला परीक्षण माना जा सकता है।
प्रदर्शन की अनुमति
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। इसलिए यदि प्रदर्शन के लिए सभी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है तो सरकार के लिए उसे रोकना आसान नहीं होगा। लेकिन यदि प्रशासन को कानून-व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण या सुरक्षा संबंधी चिंताएं दिखाई देती हैं तो अनुमति सीमित की जा सकती है या शर्तों के साथ दी जा सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो केंद्र सरकार के सामने दो विकल्प होंगे: पहला, प्रदर्शन को सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधि मानकर होने दिया जाए। दूसरा, यदि आंदोलन तेजी से राजनीतिक रंग लेने लगे तो प्रशासनिक स्तर पर अधिक निगरानी रखी जाए। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि किसी भी कार्रवाई को राजनीतिक दमन के रूप में प्रस्तुत होने से वैâसे रोका जाए। अक्सर नए आंदोलनों को प्रतिबंधित करने की कोशिश उन्हें और अधिक प्रचार दिला देती है।
विपक्ष की दुविधा
विपक्षी दलों के सामने भी स्थिति आसान नहीं है। एक तरफ बेरोजगारी, पेपर लीक और युवा असंतोष जैसे मुद्दे विपक्ष लंबे समय से उठाता रहा है। इसलिए स्वाभाविक रूप से वह इस आंदोलन के मुद्दों से सहमत दिखाई दे सकता है। दूसरी तरफ किसी नए उभरते चेहरे को खुला समर्थन देना विपक्षी दलों के लिए जोखिम भरा भी हो सकता है। इतिहास बताता है कि कई बार नए आंदोलन बाद में स्वयं राजनीतिक दल बन जाते हैं और फिर वही विपक्ष के वोट बैंक को चुनौती देने लगते हैं। इसलिए संभावना यही है कि विपक्ष आंदोलन के मुद्दों का समर्थन करे, लेकिन नेतृत्व को पूरी तरह अपने साथ जोड़ने में सावधानी बरते।
‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ मोमेंट
भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं जब व्यवस्था-विरोधी भावना ने नए राजनीतिक विकल्पों को जन्म दिया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर क्षेत्रीय दलों के उदय तक, जनता ने समय-समय पर स्थापित राजनीतिक ढांचों के खिलाफ नए प्रयोग किए हैं। अभिषेक दीपके का आंदोलन भी स्वयं को पारंपरिक राजनीति के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता दिखाई देता है। उनकी भाषा और संदेश का बड़ा हिस्सा व्यवस्था-विरोधी भावनाओं को संबोधित करता है। लेकिन किसी भी आंदोलन को राजनीतिक शक्ति बनने के लिए केवल नाराजगी पर्याप्त नहीं होती। उसे संगठन, नेतृत्व, संसाधन, वैचारिक स्पष्टता और दीर्घकालिक रणनीति की भी आवश्यकता होती है।
दीपके का अगला कदम
यदि ६ जून का प्रदर्शन अपेक्षा से अधिक सफल रहता है तो उनके सामने कई संभावित रास्ते खुल सकते हैं: पहला क़दम, इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जा सकता है। वह दिल्ली के बाद विभिन्न राज्यों में जनसभाएं और युवा सम्मेलन आयोजित कर सकते हैं। दूसरा कदम, मुद्दा-आधारित दबाव समूह बना सकते है। बिना चुनाव लड़े युवाओं और छात्रों के मुद्दों पर सरकारों पर दबाव बनाने का रास्ता चुन सकते हैं। तीसरा, राजनीतिक दल का विस्तार, यदि उन्हें लगता है कि जनसमर्थन स्थायी है, तो संगठन को औपचारिक राजनीतिक संरचना में बदला जा सकता है। चौथा कदम, विपक्ष या अन्य समूहों के साथ रणनीतिक सहयोग, कुछ मुद्दों पर अन्य संगठनों या दलों के साथ समन्वय भी संभव है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन चुनावी राजनीति बदल सकता है? फिलहाल, इस प्रश्न का उत्तर देना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई आंदोलन सोशल मीडिया पर बहुत बड़े दिखाई दिए, लेकिन चुनावी मैदान में प्रभाव नहीं छोड़ पाए। वहीं कुछ छोटे दिखने वाले आंदोलनों ने बाद में बड़ी राजनीतिक ताकत हासिल की। अभिषेक दीपके और उनके समर्थकों के लिए असली परीक्षा भीड़ जुटाने से अधिक संगठन बनाने की होगी।
यदि आंदोलन केवल एक व्यक्ति की लोकप्रियता पर निर्भर रहा तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता है। लेकिन यदि यह युवाओं के ठोस मुद्दों पर आधारित व्यापक नेटवर्क खड़ा कर लेता है, तो भविष्य में राजनीतिक दलों को इसकी उपेक्षा करना मुश्किल हो सकता है।
बहरहाल, अभिषेक दीपके और कथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को अभी भारतीय राजनीति की निर्णायक शक्ति कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी सच है कि जिस तेजी से युवाओं में राजनीतिक असंतोष और वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश बढ़ रही है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ६ जून का जंतर-मंतर प्रदर्शन केवल एक विरोध कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी होगी कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता जमीन पर राजनीतिक ताकत में बदल सकती है या नहीं। यदि यह आंदोलन युवाओं की आकांक्षाओं और असंतोष को संगठित राजनीतिक दिशा देने में सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति को एक नए खिलाड़ी का सामना करना पड़ सकता है। यदि नहीं, तो यह भी उन अनेक आंदोलनों की सूची में शामिल हो जाएगा, जो चर्चा तो बहुत बटोरते हैं, लेकिन स्थायी राजनीतिक प्रभाव नहीं छोड़ पाते।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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