मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : भारत पर प्रभाव बढ़ाने की अमेरिका की नई रणनीति!

पॉलिटिका : भारत पर प्रभाव बढ़ाने की अमेरिका की नई रणनीति!

के.पी. मलिक

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा को केवल एक सामान्य कूटनीतिक कार्यक्रम मानना शायद मौजूदा वैश्विक राजनीति को बहुत सतही तरीके से देखना होगा। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया एक नए शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-अमेरिका तनाव, ऊर्जा संकट, वैश्विक व्यापार युद्ध और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को पूरी तरह बदल दिया है।
राजनीतिक निवेश!
ऐसे माहौल में भारत अचानक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक शक्तियों में शामिल हो चुका है। यही कारण है कि वॉशिंगटन अब नई दिल्ली के साथ रिश्तों को सिर्फ दोस्ती के दायरे में नहीं बल्कि एक बड़े भू-राजनीतिक निवेश के रूप में देख रहा है।
अमेरिका अच्छी तरह समझता है कि आने वाले वर्षों में एशिया की राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका निर्णायक होने वाली है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल बाजार और चीन के मुकाबले एक संभावित संतुलन के रूप में भारत अमेरिका के लिए बेहद अहम हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका भारत को वास्तव में एक स्वतंत्र और बराबरी के साझेदार के रूप में देखता है या वह भारत की नीतियों और रणनीतिक पैâसलों पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है?
दरअसल, यहीं से इस यात्रा का असली राजनीतिक अर्थ शुरू होता है। अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास बताता है कि वॉशिंगटन कभी भी केवल आदर्शवाद या लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर रिश्ते नहीं बनाता। उसके हर रणनीतिक संबंध के पीछे आर्थिक हित, सुरक्षा हित और वैश्विक प्रभाव की स्पष्ट गणना होती है। इराक, अफगानिस्तान, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया से लेकर एशिया तक अमेरिका ने अक्सर साझेदारी और दबाव की राजनीति को साथ-साथ इस्तेमाल किया है। आज भारत के संदर्भ में भी वही सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका दोस्ती के जरिए प्रभाव स्थापित करने की कोशिश कर रहा है?
रणनीतिक संकेत!
ऊर्जा राजनीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हुए भारी मात्रा में सस्ता रूसी तेल खरीदा। इससे भारत को आर्थिक राहत मिली और महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिली। लेकिन यह पैâसला अमेरिका और यूरोपीय देशों को पूरी तरह पसंद नहीं आया। पश्चिम लगातार चाहता रहा कि भारत रूस से दूरी बनाए और ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिमी विकल्पों की ओर बढ़े। ऐसे में जब अमेरिकी नेता भारत को अमेरिकी तेल और गैस खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं तो यह केवल व्यापारिक प्रस्ताव नहीं बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी माना जाता है।
दरअसल, असली सवाल तेल खरीदने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपनी विदेश और आर्थिक नीति अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय करेगा या वैश्विक दबावों के अनुसार? क्योंकि भारत की सबसे बड़ी ताकत अब तक उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है। भारत ने कभी पूरी तरह किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने की राजनीति नहीं की। यही वजह है कि भारत ‘क्वाड’ का भी सदस्य है और ‘ब्रिक्स’ का भी। वह अमेरिका के साथ रक्षा समझौते भी करता है और रूस से हथियार भी खरीदता है। वह पश्चिमी निवेश भी चाहता है और ग्लोबल साउथ की आवाज भी बनने की कोशिश करता है। भारत की यह ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति उसे दुनिया की अन्य शक्तियों से अलग बनाती है।
कमजोर सियासी आजादी!
लेकिन आनेवाले वर्षों में यही संतुलन सबसे कठिन चुनौती बनने वाला है। अमेरिका अब पुराने दौर की तरह केवल सैन्य ताकत के जरिए प्रभाव नहीं बढ़ाता। उसकी नई रणनीति आर्थिक साझेदारी, तकनीकी निर्भरता, व्यापारिक समझौतों और कूटनीतिक दबाव के जरिए देशों की नीतियों को प्रभावित करने की होती है। सेमीकंडक्टर, एआई, रक्षा तकनीक, डिजिटल इंप्रâास्ट्रक्चर और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बढ़ती अमेरिकी भागीदारी भारत के लिए अवसर भी है और सावधानी का विषय भी। भारत को यह समझना होगा कि वैश्विक राजनीति में स्थायी दोस्ती नहीं होती, केवल स्थायी हित होते हैं।
अमेरिका अपने हितों के अनुसार, भारत के करीब आ रहा है और भारत को भी अपने हितों के आधार पर ही हर समझौते और साझेदारी का मूल्यांकन करना होगा। क्योंकि यदि आर्थिक निर्भरता और रणनीतिक दबाव धीरे-धीरे नीति निर्माण को प्रभावित करने लगें तो किसी भी देश की राजनीतिक स्वतंत्रता कमजोर पड़ सकती है।
मार्को रूबियो की यह यात्रा शायद इसी बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत है। यह केवल दो देशों के बीच रिश्ते मजबूत करने की कवायद नहीं बल्कि उस बड़े शक्ति-संघर्ष का हिस्सा है, जिसमें दुनिया की महाशक्तियां भारत को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखना चाहती हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत इस वैश्विक शक्ति-खेल में अपनी स्वतंत्र पहचान और रणनीतिक स्वायत्तता को बचाए रख पाएगा या फिर महाशक्तियों के बढ़ते दबाव के बीच उसकी नीतियां धीरे-धीरे बाहरी प्रभावों से संचालित होने लगेंगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

अन्य समाचार