के.पी. मलिक
-बदलता राजनीतिक परिदृश्य और क्षेत्रीय दलों की चुनौती
भारतीय राजनीति में विपक्षी एकता के सबसे बड़े प्रयोग के रूप में उभरे इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह गठबंधन अभी भी विपक्षी राजनीति का प्रभावी मंच बना हुआ है या फिर उसकी भूमिका धीरे-धीरे प्रतीकात्मक होती जा रही है। लंबे अंतराल के बाद आयोजित इस बैठक ने केवल राजनीतिक दलों को एक मंच पर नहीं लाया, बल्कि विपक्ष की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर भी गंभीर बहस को जन्म दिया। दरअसल, यह बैठक ऐसे समय में हुई जब गठबंधन के अधिकांश प्रमुख क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में राजनीतिक दबाव और चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जिन नेताओं को कभी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता था, उनकी राजनीतिक ताकत पहले की तुलना में कमजोर दिखाई दे रही है। यही कारण है कि इस बैठक को विपक्ष की शक्ति प्रदर्शन से अधिक आत्ममंथन की बैठक के रूप में देखा जा रहा है।
बदलता राजनीतिक परिदृश्य और क्षेत्रीय दलों की चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड), दिल्ली में आम आदमी पार्टी तथा महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे दलों ने राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इन दलों की राजनीतिक स्थिति को जटिल बना दिया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी अब भी मजबूत है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता पहले जैसी नहीं दिखती। बिहार में राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं। महाराष्ट्र में दलों के विभाजन और सत्ता परिवर्तन ने विपक्षी राजनीति को गहरा झटका दिया है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी भी अब पहले जैसी राजनीतिक बढ़त की स्थिति में नहीं दिखाई देती। इन परिस्थितियों में एक दिलचस्प बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस, जिसे कुछ वर्ष पहले विपक्ष की सबसे कमजोर कड़ी माना जा रहा था, अब कई मुद्दों पर सबसे सक्रिय विपक्षी दल के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।
क्या कांग्रेस फिर बन रही है विपक्ष की धुरी?
इंडिया गठबंधन के गठन के समय यह धारणा थी कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल मिलकर भाजपा के खिलाफ साझा राजनीतिक मंच तैयार करेंगे। लेकिन वर्तमान स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्षी राजनीति का भार धीरे-धीरे कांग्रेस के कंधों पर केंद्रित होता जा रहा है। संसद से लेकर सड़क तक, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, संविधान, आरक्षण और चुनावी प्रक्रियाओं जैसे मुद्दों पर कांग्रेस लगातार सक्रिय दिखाई देती है। राहुल गांधी की यात्राओं और कांग्रेस के संगठनात्मक अभियानों ने पार्टी को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनाए रखा है। यह स्थिति क्षेत्रीय दलों के लिए भी एक नई चुनौती लेकर आती है। एक ओर वे भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस की जरूरत महसूस करते हैं, दूसरी ओर वे अपने राज्यों में कांग्रेस के विस्तार को लेकर आशंकित भी रहते हैं। यही विरोधाभास इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी बन सकता है।
२०२७-२८ में विपक्ष की असली परीक्षा
आनेवाले दो वर्षों में कई महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से अधिकांश राज्यों में मुकाबला सीधे भाजपा और कांग्रेस के बीच दिखाई देता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और अन्य राज्यों में राजनीतिक संघर्ष का मुख्य केंद्र यही दो दल रहेंगे। ऐसे परिदृश्य में क्षेत्रीय दलों की भूमिका सीमित हो सकती है। यही वजह है कि विपक्षी राजनीति का राष्ट्रीय विमर्श धीरे-धीरे कांग्रेस बनाम भाजपा की दिशा में जाता दिखाई देता है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश इसका अपवाद है। देश की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोगशाला माने जाने वाले इस राज्य में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संबंध विपक्षी रणनीति की दिशा तय करेंगे। समाजवादी पार्टी की कोशिश होगी कि कांग्रेस सीमित सीटों पर चुनाव लड़े, ताकि विपक्षी वोटों का बिखराव कम हो। वहीं कांग्रेस अपने संगठन के विस्तार और राजनीतिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता को देखते हुए अधिक सक्रिय भूमिका चाह सकती है। यही संतुलन २०२७ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानी बन सकता है।
आम आदमी पार्टी और विपक्षी वोटों का गणित
विपक्ष की रणनीति में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न आम आदमी पार्टी की भूमिका को लेकर है। दिल्ली और पंजाब में मजबूत उपस्थिति रखने वाली यह पार्टी कई राज्यों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। समस्या यह है कि जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है, वहां आम आदमी पार्टी की उपस्थिति कई बार विपक्षी वोटों के विभाजन का कारण बन सकती है। इसका प्रभाव चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। इसी कारण विपक्षी राजनीति के सामने केवल भाजपा को चुनौती देने का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह तय करने का भी प्रश्न है कि विपक्षी दल आपसी प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन वैâसे स्थापित करें।
केवल गठबंधन नहीं, सड़क पर संघर्ष भी जरूरी
इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती शायद चुनावी गणित नहीं, बल्कि राजनीतिक ऊर्जा का संकट है। केवल सीटों के बंटवारे और संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई गठबंधन लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकता। किसी भी राजनीतिक मोर्चे की वास्तविक ताकत उसके जमीनी आंदोलनों, जनसंपर्क अभियानों और सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता से आती है। विपक्ष के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है कि वह जनता के बीच अपनी उपस्थिति और विश्वसनीयता को कैसे मजबूत करे। हाल के छात्र आंदोलनों, रोजगार से जुड़े अभियानों और सोशल मीडिया पर चल रहे राजनीतिक अभियानों ने यह संकेत दिया है कि राजनीतिक संघर्ष का स्वरूप बदल रहा है। आज जनता तक पहुंचने के लिए केवल पारंपरिक राजनीति पर्याप्त नहीं है। डिजिटल माध्यम, सामाजिक आंदोलन और वैकल्पिक राजनीतिक संवाद भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।
बहरहाल, इंडिया गठबंधन आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसका अस्तित्व केवल राजनीतिक दलों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी प्रभावशीलता से तय होगा। क्षेत्रीय दलों की कमजोर होती स्थिति, कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता, आम आदमी पार्टी की स्वतंत्र महत्वाकांक्षाएं और आनेवाले विधानसभा चुनाव विपक्षी राजनीति की नई दिशा तय करेंगे। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर सबसे संगठित और निरंतर राजनीतिक चुनौती कांग्रेस ही पेश कर रही है। लेकिन केवल कांग्रेस की सक्रियता से विपक्ष मजबूत नहीं होगा। इसके लिए क्षेत्रीय दलों, सामाजिक आंदोलनों और जनसरोकारों को एक साझा राजनीतिक परियोजना में बदलना होगा। इंडिया गठबंधन की असली परीक्षा चुनावी मंचों पर नहीं, बल्कि जनता के बीच होगी। यदि यह गठबंधन अपने राजनीतिक संदेश, संगठनात्मक समन्वय और जमीनी संघर्ष को मजबूत कर पाता है, तभी वह भविष्य में एक प्रभावी विपक्षी विकल्प बन सकेगा। अन्यथा यह केवल चुनावी अवसरवाद का एक अस्थायी प्रयोग बनकर रह जाएगा।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
