मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : किसानों की आत्महत्या के भयावह आंकड़े ... महाराष्ट्र ‘टॉप’ पर!

पॉलिटिका : किसानों की आत्महत्या के भयावह आंकड़े … महाराष्ट्र ‘टॉप’ पर!

के.पी. मलिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादे के मुताबिक, साल २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी होनी थी, लेकिन किसानों की आमदनी कम होने के चलते उल्टा उनकी समस्याएं बढ़ती जा रही है और समस्याएं भी इस कदर बढ़ती जा रही हैं कि किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं। किसानों के अलावा खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के आंकड़े भी तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल ही में कृषि क्षेत्र में लगे लोगों के आर्थिक तनाव को उजागर करते हुए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में खुलासा किया है कि साल २०२३ में ४,६९० किसानों और ६,०९६ खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की थी यानी साल २०२३ में हर दिन कम से कम १३ किसानों और १० से ज्यादा खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है। रिपोर्ट के मुताबिक कृषि क्षेत्र में लगे लोगों में से हर घंटे आत्महत्या से तकरीबन एक मौत हो जाती है। हालांकि, एनसीआरबी ने वर्ष २०२२ की तुलना में वर्ष २०२३ में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं की संख्या अपेक्षाकृत कम बताई गई है। लेकिन ये कहकर सरकार को बचाया नहीं जा सकता, क्योंकि हमारे कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्महत्याओं के लिए कहीं न कहीं सरकार न सिर्फ दोषी है, बल्कि जिम्मेदार भी।
वाजिब मांगें
दरअसल, जो किसान या खेतिहर मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं, वो कहीं न कहीं देश के कृषि क्षेत्र की आर्थिक बदहाली, खेती की जमीन जबरन छीने जाने की बढ़ती कोशिशें, फसलों के वाजिब दाम न मिलना और प्राकृतिक आपदाएं जैसी कटु वास्तविकताओं का ही परिणाम है। अगर सरकार चाहे, तो किसानों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो सकती है और उनमें मजबूर होकर आत्महत्या करने का चलन भी कम हो सकता है, लेकिन इसके लिए किसानों के प्रति सरकार का रुख अपनत्व वाला होना चाहिए। आजादी के बाद से एक किसान ही तो है, जिसे आज तक न्यायपूर्ण तरीके से कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। कहने को देश में किसानों के लिए तमाम स्कीमें हैं और केंद्र की मोदी सरकार ५०० रुपए महीने के हिसाब से लाखों किसानों को किसान सम्मान निधि भी देती है, लेकिन क्या किसानों ने कभी किसान सम्मान निधि की मांग की या कभी सरकार से ऐसी कोई मदद मांगी? किसान तो सिर्फ अपनी फसलों के वाजिब भाव चाहते हैं, जिसके लिए सरकार तैयार नहीं होती। बहरहाल, एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, साल २०२३ में कुल १० हजार ७८६ किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों ने आत्महत्या की, जो कुल आत्महत्याओं (१ लाख ७१ हजार ४१८) का करीब ६.३ फीसदी है। आत्महत्या से मरने वाले किसानों में ४३ फीसदी (४,६९०) किसान या और ५७ फीसदी (६,०९६) खेतिहर मजदूर थे। आत्महत्या करने वाले किसानों में ४ हजार ५५३ पुरुष, जबकि १३७ महिलाएं थीं। खेतिहर मजदूरों में ५ हजार ४३३ पुरुष और ६६३ महिलाएं थीं।
अगर राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो बड़ी निराशा हाथ लगती है देश की आर्थिक वैâपिटल वाले राज्य महाराष्ट्र में किसान सबसे अधिक आत्महत्याएं करते हैं। देश में हुई कुल किसान आत्महत्याओं का ३८.५ फीसदी यानी करीब ४ हजार १५१ मामले महाराष्ट्र से आते हैं। उसके बाद महाराष्ट्र से लगे कर्नाटक में २२.५ फीसदी, आंध्र प्रदेश में ८.६ फीसदी, मध्य प्रदेश में ७.२ फीसदी और तमिलनाडु ५.९ फीसदी संख्या के साथ प्रमुख स्थान पर है। लेकिन कमाल की बात यह है कि आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों में बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, और अधिकांश पूर्वोत्तर राज्यों में शून्य किसान आत्महत्या दर्ज की गई, मगर कुछ विशेषज्ञ इस वर्गीकरण और आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं।
जवाबदेही!
दरअसल, किसानों की इन मौतों का कारण कर्ज, फसलें और व्यवस्था की विफलता को माना जा रहा है। क्योंकि इन मौतों के पीछे की मुख्य वजहें यही हैं कि किसान कर्ज का बोझ झेल नहीं पाता तो उसको यह रास्ता सबसे आसान नजर आने लगता है, फसल की विफलता, न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की अनिश्चितता, बाजार में उसकी फसलों गिरती कीमतें और बढ़ती महंगाई इसके अलावा सरकारी नीतियों की खामियां भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ के कपास और सोयाबीन पट्टे तथा कर्नाटक की सूखा-संवेदनशील भूमि में सबसे अधिक आत्महत्याएं दर्ज हुई हैं। राज्यों की सरकारें ऋण माफी, बीमा, और एमएसपी सुधारों का दावा तो करती हैं, लेकिन व्यावहारिक राहत अब तक सपना और दूर की कौड़ी बनी हुई है।
देश में किसानों की आत्महत्याएं सामाजिक और लैंगिक पहलू भी बनी हुई हैं। पुरुष किसानों में आत्महत्या की दर कहीं अधिक है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं की आत्महत्या भी चिंता का कारण बनी हुई है इनमें सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा गहराई है। सर्वाधिक मामलों में आत्महत्या करने वालों की वार्षिक आय १ लाख रुपए से कम थी, जिससे स्पष्ट है कि छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा संकट में हैं। हालांकि, किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन किसानों पर संकट जस का तस है। आंकड़ों के मुताबिक साल २०२२ की तुलना में किसान आत्महत्याओं में लगभग १० फीसदी की कमी आई है, लेकिन कृषि मजदूरों की आत्महत्या की संख्या लगभग बराबर रही या मामूली बढ़ी है। यानी चंद सुकून की खबरों के अलावा, गहरी जवाबदेही और दीर्घकालीन नीति और योजनाओं में बदलाव की जरूरत है।
बहरहाल, इस धरातल की सच्चाई के बीच सवाल वही पुराना आकार लेता है कि क्या भारतीय कृषि नीति नाममात्र की राहत और चयनित प्रोत्साहनों के रास्ते वाकई इस संकट से निपट पाएगी? या फिर हर घंटे एक किसान की मौत देश की नीति-निर्माताओं की गूंगी असहायता का गवाह बनती रहेगी? क्योंकि नीति निर्माताओं को किसानों और खेतिहर मजदूरों की कोई चिंता नहीं है और इससे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि इस देश में ऐसे लोगों को कृषि मंत्री बना दिया जाता है, जो कृषि के बारे में न तो कुछ जानते हैं और न ही किसानों को होने वाले घाटे से कभी गुजरे हैं। एसी रूमों में बैठकर किसानों के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं और उसमें से भी तमाम योजनाओं का लाभ ज्यादातर किसानों तक पहुंचता ही नहीं है, क्योंकि उनके हिस्से की सुविधाओं का बंदरबांट मंत्रालय से ही शुरू हो जाता है। यही वजह है कि कृषि नीतियां बनाने वालों को सब कुछ वैसे ही हरा-भरा दिखता है, जैसे सावन के अंधे को सब कुछ हरा-हरा दिखता है। ऐसे में ये सवाल भी है और चिंता भी कि किसानों और खेतिहर मजदूरों के अच्छे दिन कब आएंगे?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं तल्ख टिप्पणीकार हैं।)

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