के.पी. मलिक
विरासत का सवाल भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। अक्सर देखा जाता है कि परिवार के सदस्यों के बीच विरासत को लेकर मतभेद होते हैं, जो अंतत: टूट का कारण बनते हैं। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के परिवारों में पारिवारिक विवाद और टूट की घटनाएं भारतीय राजनीति में एक आम बात हो गई हैं। इन विवादों का असर सिर्फ पार्टी या परिवार तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव राज्य की राजनीति पर भी पड़ता है। पारिवारिक पार्टियों में वर्चस्व और सलाहकारों की भूमिका, विरासत का सवाल और आंतरिक संघर्ष जैसी समस्याएं भारतीय लोकतंत्र में एक बड़ी चुनौती हैं।
लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने बिहार चुनाव में आरजेडी की हार के बाद परिवार और राजनीति से सार्वजनिक रूप से नाता तोड़ने की घोषणा की है। यह विवाद महज विरासत की लड़ाई नहीं, बल्कि परिवार के भीतर गहरा भावनात्मक और राजनीतिक असंतोष है, जिसमें तेजस्वी यादव और उनके सलाहकार संजय यादव की भूमिका अहम रही है। संजय यादव और रमीज द्वारा रोहिणी को परिवार से दूर किए जाने के आरोपों ने इस टूट को और गहरा कर दिया है।
बाहरी हस्तक्षेप
सवाल ये है कि रोहिणी आचार्य के गुस्से की असली वजह क्या है? दरअसल, रोहिणी का गुस्सा मुख्यत: तेजस्वी यादव के करीबी सलाहकारों संजय यादव और रमीज नेमत की वजह से है। रोहिणी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें इन दोनों ने परिवार से बाहर कर दिया और इसी के चलते उन्होंने समस्त दोष खुद पर लेते हुए परिवार एवं राजनीति छोड़ने का पैâसला किया। उनके मुताबिक, तेजस्वी परिवार के अन्य सदस्यों और पार्टी के भीतर अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए बाहरी लोगों को तरजीह देते हैं।
तेजस्वी यादव बनाम रोहिणी के इस विवाद के केंद्र में है आरजेडी में वर्चस्व और नेतृत्व का सवाल, जहां तेजस्वी यादव प्रमुख चेहरा बन गए हैं, जबकि रोहिणी जैसे पारिवारिक सदस्य खुद को दरकिनार महसूस करते हैं। तेजस्वी के राजनीतिक पैâसलों और सलाहकारों की बढ़ती भूमिका से परिवार के भीतर असहमति और आक्रोश बढ़ा है। संजय यादव पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वे तेजस्वी के निर्णयों को निर्देशित कर रहे हैं और परिवार के अन्य सदस्यों को हाशिए पर धकेल रहे हैं। रोहिणी ने कई बार सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए संजय यादव पर अपनी नाखुशी जाहिर की है।
असर क्या होगा?
क्योंकि इस आंतरिक कलह ने न केवल परिवार, बल्कि पार्टी पर भी असर डाला है। पहले तेज प्रताप यादव अपनी पार्टी बना चुके हैं। अब रोहिणी के खुले विद्रोह से पार्टी कार्यकर्ताओं में असमंजस और अस्थिरता बढ़ी है, जिससे २०२५ की बिहार राजनीति में विपक्ष की स्थिति और कमजोर हो सकती है तो क्या माना जाए कि यह सिर्फ विरासत की लड़ाई है? क्योंकि विरासत एक बड़ा कारक है, पर विवाद केवल नेताओं की सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि भावनात्मक उपेक्षा, निर्णय प्रक्रिया से बाहर किए जाने और सलाहकारों के दखल की वजह से ज्यादा गहरा है।
दरअसल, बिहार में २०२५ की राजनीति पर लालू परिवार की इस टूट का प्रभाव साफ दिखाई देगा, क्योंकि आरजेडी के भीतर इस तरह की टूट बिहार में विपक्ष की राजनीति को कमजोर कर सकती है, जिससे एनडीए के लिए स्थिति और मजबूत हो सकती है और साथ ही विपक्षी गठबंधन की एकजुटता तथा विश्वसनीयता पर भी असर पड़ेगा। दरअसल, रोहिणी द्वारा कहा गया कि ‘किसी बेटी को अपने पिता को किडनी नहीं देनी चाहिए’, भावनात्मक असंतोष और उपेक्षा का प्रतीक है। उन्होंने जब अपने पिता को किडनी दी थी तो परिवार और पार्टी से अपेक्षा थी कि उनका योगदान सम्मानित होगा, लेकिन बदलती परिस्थितियों में उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया।
मुलायम सिंह यादव के परिवार में भी सत्ता और विरासत को लेकर विवाद सामने आए, अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच लंबे समय तक मतभेद रहे।
२०१६-१७ के दौरान उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के दोनों धड़ों में गंभीर फूट हुई थी, जिसके बाद अखिलेश ने पार्टी का नेतृत्व संभाला और शिवपाल यादव अलग हो गए। अंतत: पारिवारिक राजनीति के प्रभावी चेहरे वही रहे जिन्होंने संगठन पर नियंत्रण किया, जबकि अन्य सदस्य दरकिनार हो गए।
टूट का असर सिर्फ पार्टी या परिवार नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति के ध्रुवीकरण पर भी पड़ता है, जैसा बिहार, यूपी और महाराष्ट्र में देखने को मिलता है। आरजेडी में रोहिणी की बगावत २०२५ के बिहार की राजनीति में विपक्ष की मजबूती और एकता पर प्रश्नचिह्न लगा रही है। जो आंतरिक संघर्ष विरासत, भावनात्मक असंतोष और सत्ता के समीकरणों का मिला-जुला परिणाम है, जो भारतीय लोकतंत्र में परिवारवाद की व्यापक समस्या को उजागर करता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
