मुख्यपृष्ठस्तंभसियासी सरगोशियां : नफासत और सियासत की दबंगई

सियासी सरगोशियां : नफासत और सियासत की दबंगई

ईश्वरी राज

जनाब, चलिए आज भी शुरुआत करते हैं लखनऊ से। उसी लखनऊ से जहां नवाबों की नफासत और सियासत की दबंगई एक ही मेज पर कबाब और बुलडोजर का नक्शा लेकर बैठती है। यहां पहले आप की तहजीब है, पर कुर्सी के लिए धक्का-मुक्की भी जायज है।
बुलडोजर का नक्शा…
लखनऊ के भगवा-चोला वाले सरताज जब दहाड़ते हैं तो उसकी गूंज सीधे पटना की चौपाल तक जाती है। पटना में कुर्ता-पायजामा वाले चाचा मुस्कुराकर कहते हैं अरे भाई, दहाड़ना तो हमें आता है, पर हम गठबंधन की चाशनी में लपेटकर दहाड़ते हैं। आज इस घाट, कल उस घाट। लालटेन वाले युवराज तलवार भांज रहे हैं, पर चाचा के बिना न घाट मिलता है न नाव।
फोन और बर्फ का पिघलना…
पटना से हवा का रुख उत्तर की तरफ मुड़ता है तो देहरादून के पहाड़ों में खलबली मच जाती है। देवभूमि में टोपी-पहाड़ी वाले सरदार की कुर्सी पर दिल्ली की नजरें टिकी हैं। फोन की घंटी बजी नहीं कि यहां बर्फ पिघलने लगती है। कहते हैं पहाड़ में मौसम से ज्यादा तेज गुट बदलते हैं। लखनऊ वाले उस्ताद यहां भी शागिर्द भेजते रहते हैं सियासत सीखने।
देहरादून से ढलान उतरते ही भोपाल का मैदान आ जाता है। यहां साफा वाले मामा की मुस्कान में लखनऊ जैसी सख्ती और पटना जैसी चतुराई दोनों हैं। लाडली बहनों के भाईसाहब हर मंच से विकास गिनाते हैं, पर असली विकास तो रिसॉर्ट की बुकिंग में दिखता है।
रिसॉर्ट की बुकिंग!
विधायक जी को जरा सी हवा लगी नहीं कि सरकार की सांसें फूलने लगती हैं। मामा कहते हैं कि यूपी से बुलडोजर लाया, बिहार से गठबंधन का फॉर्मूला, अब राज करना आया। भोपाल से पगडंडी पकड़िए तो सीधे गुलाबी नगरी जयपुर पहुंच जाएंगे। यहां किले में पगड़ी वाले जादूगर और युवा शहजादे की तकरार लखनऊ की चाचा-भतीजे वाली स्क्रिप्ट जैसी है। बस फर्क इतना है कि यहां रेत उड़ती है और ऊंट सियासी सरगोशियां किस करवट बैठेगा, ये दिल्ली का दरबारी तय करता है। कमल-घराने की तलवारें म्यान से बाहर हैं, पर डर सबको रिसॉर्ट का ही है। तो जनाब, ये सियासी काफिला लखनऊ की तहजीब से शुरू होकर जयपुर की रेत तक पहुंच गया। हर शहर का लहजा अलग, पर सबका राग एक कुर्सी। लखनऊ में अदब से धक्का देते हैं, पटना में हंसकर पाला बदलते हैं, देहरादून में फोन पर सरकार गिराते हैं, भोपाल में प्यार से रिझाते हैं और जयपुर में जादू से बचाते हैं।
जनता माई-बाप…
बाकी जनता? वो तो इमरती खाकर, चाय पीकर ये नफासत, सियासत और तंज का मुशायरा सुनती रहती है। क्योंकि यहां हर चुनाव में शेर दहाड़ते हैं और चुनाव बाद सब दिल्ली की चौखट पर माथा टेकते हैं।

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