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ड्रोन से दुश्मन पर नजर…सेना तैयार कर रही ‘टेक्नो-वॉरियर्स’

-मणिपुर के लीमाखोंग में रेड शील्ड डिविजन ने शुरू किया विशेष प्रशिक्षण, जवान सीखेंगे एरियल सर्विलांस और टैक्टिकल रिकॉनिसेंस

भारतीय सेना अब पारंपरिक युद्धक क्षमता के साथ-साथ तकनीकी युद्ध कौशल को भी तेजी से मजबूत कर रही है। इसी दिशा में रेड शील्ड डिविजन ने स्पीयर कॉर्प्स के तहत मणिपुर के लीमाखोंग में ‘रेमोटली पायलटेड ट्रेनिंग ऑपरेटर्स कोर्स’ शुरू किया है। इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसे प्रशिक्षित सैनिक तैयार करना है, जो युद्धक्षेत्र और निगरानी अभियानों में ड्रोन तकनीक का प्रभावी और रणनीतिक उपयोग कर सकें।
हाल के वर्षों में ड्रोन आधुनिक युद्ध रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सीमा निगरानी, आतंकवाद-रोधी अभियानों, दुर्गम इलाकों की टोह और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने में इनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। खासकर उत्तर-पूर्व जैसे संवेदनशील और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक सेना के लिए बड़ी ताकत साबित हो सकती है।
इस कोर्स में जवानों को केवल ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, बल्कि उन्हें एरियल सर्विलांस, टैक्टिकल रिकॉनिसेंस, रियल टाइम इंटेलिजेंस जुटाने और ऑपरेशनल निर्णयों में तकनीकी सहायता देने की क्षमता भी विकसित कराई जाएगी। इसका मकसद ऐसे ‘टेक्नो-वॉरियर्स’ तैयार करना है, जो भविष्य के हाईटेक युद्ध में मैदान की स्थिति को तेजी से समझकर कमांडरों को सटीक जानकारी उपलब्ध करा सकें।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ड्रोन तकनीक आधुनिक सैन्य अभियानों की रीढ़ बन सकती है। भारतीय सेना की यह पहल संकेत देती है कि भविष्य का युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक, सूचना और त्वरित निर्णय क्षमता से भी लड़ा जाएगा।

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