तौसीफ कुरैशी
राजनीति में कई बार भाषणों से अधिक असर तस्वीरें छोड़ जाती हैं। मध्य प्रदेश के दतिया से आई एक ऐसी ही तस्वीर ने यह संदेश देने की कोशिश की कि कांग्रेस कम से कम इस उपचुनाव में अपने भीतर की खींचतान को पीछे छोड़कर एकजुट होकर लड़ना चाहती है। दतिया विधानसभा उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं है। यह उस राजनीतिक मनोविज्ञान की भी परीक्षा है, जिसमें संगठन की एकता और नेतृत्व की विश्वसनीयता दांव पर लगी है। २०२३ के विधानसभा चुनाव में यह सीट कांग्रेस ने जीती थी। ऐसे में इसे बचाए रखना पार्टी की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। पिछले कुछ दिनों से मध्य प्रदेश कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के बीच मतभेदों की खबरें लगातार चर्चा में थीं। राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं या हैं। कुछ नेताओं ने तो जीतू पटवारी को खुश करने की कोशिश में दिग्विजय सिंह पर सार्वजनिक रूप से गंभीर आरोप तक लगा दिए। इससे यह संदेश जा रहा था कि कांग्रेस फिर उसी पुरानी बीमारी आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है, लेकिन दतिया जाने वाली ट्रेन में एक अलग कहानी लिखी गई। जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह साथ बैठे, साथ यात्रा की और दतिया पहुंचकर कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में भी साथ दिखाई दिए। उससे भी महत्वपूर्ण यह रहा कि जीतू पटवारी ने स्वयं वीडियो साझा करते हुए लिखा कि वे दिग्विजय सिंह जी के साथ दतिया पहुंचे हैं।
राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है। यह केवल यात्रा नहीं थी, बल्कि कार्यकर्ताओं के लिए एक संदेश था कि व्यक्तिगत मतभेद यदि हों भी, तो चुनाव संगठन का होता है और संगठन सबसे ऊपर है। कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा भाजपा नहीं रही। कई बार उसकी सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना बिखराव रहा है। जब-जब कांग्रेस के नेता अलग-अलग दिशाओं में खड़े दिखाई दिए, तब-तब कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा और मतदाता का भरोसा भी डगमगाया। लेकिन जब नेतृत्व एक मंच पर, एक भाषा में और एक लक्ष्य के साथ दिखाई देता है, तब राजनीतिक ऊर्जा स्वत: पैदा होती है। दतिया का यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा जैसी मजबूत चुनावी मशीनरी का मुकाबला केवल नारों से नहीं किया जा सकता। उसके लिए संगठनात्मक अनुशासन, साझा रणनीति और नेतृत्व की सामूहिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। यदि कांग्रेस मध्य प्रदेश में इसी तरह अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर चुनाव लड़े, तो मुकाबला निश्चित रूप से अधिक रोचक और भाजपा के लिए कठिन हो सकता है। हालांकि, केवल साथ बैठ जाने से चुनाव नहीं जीते जाते। असली परीक्षा मतदान तक एकजुट रहने की होती है। क्या यह एकता केवल दतिया तक सीमित रहेगी या पूरे प्रदेश में संगठन की नई कार्यशैली बनेगी? इसका उत्तर आने वाले दिनों में मिलेगा। फिलहाल, इतना जरूर कहा जा सकता है कि दतिया से निकली यह तस्वीर कांग्रेस के लिए उम्मीद की तस्वीर है। राजनीति में संदेश कभी-कभी शब्दों से नहीं, साथ चलने से बनते हैं।
सत्यमेव जयते
फाइलों का लोकतंत्र और सत्ता का रिमोट
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक वह दिन नहीं होता, जब कोई नेता झूठ बोलता है। नेता तो सदियों से झूठ बोलते आए हैं। सबसे खतरनाक वह दिन होता है जब सच बोलने वाली फाइलें भी झूठ बोलने लगें। जब जांच एजेंसियों की कलम कानून से नहीं, सत्ता की उंगलियों से चलने लगे। जब अदालत तक पहुंचते-पहुंचते सच की सांस फूल जाए और न्याय की चाल राजनीति की बैसाखियों पर टिक जाए।
सपा के यादव परिवार की आय से अधिक संपत्ति का मामला भारतीय लोकतंत्र की ऐसी ही एक लंबी कथा है। यह केवल किसी एक परिवार की संपत्ति का हिसाब नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें फाइलें खुलती भी हैं, बंद भी होती हैं और कभी-कभी वर्षों तक अधखुली रखी जाती हैं, ताकि उनका इस्तेमाल न्याय से ज्यादा राजनीति में हो सके। साल २००५ में सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पर एक याचिका पहुंची। आरोप था कि एक राजनीतिक परिवार की संपत्ति में असाधारण वृद्धि हुई है। अदालत ने सीबीआई को जांच का आदेश दिया। शुरुआती जांच में सवाल उठे, विसंगतियां सामने आर्इं और लगा कि कानून अपना रास्ता बनाएगा। लेकिन भारत में कानून का रास्ता अक्सर संसद की गलियों से होकर गुजरता है। २००८ आया। केंद्र की सरकार भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर संकट में थी। सरकार को संसद में संख्या चाहिए थी। सपा, जो कल तक विरोध में थी, अचानक समर्थन में खड़ी दिखाई दी। सरकार बच गई। उसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंजता रहा कि क्या यह केवल वैचारिक परिवर्तन था या सत्ता और जांच के बीच कोई अनकहा समझौता भी था? इन आरोपों का कोई न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया, लेकिन संदेह भारतीय राजनीति की स्थायी छाया बन गया। यहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना जन्म लेती है। जांच एजेंसियां जब किसी विपक्षी नेता के घर पहुंचती हैं तो उन्हें शेर कहा जाता है। वही एजेंसियां सत्ता के समीकरण बदलते ही अचानक संत क्यों हो जाती हैं? यह प्रश्न किसी एक दल से नहीं, पूरी व्यवस्था से है।
यादव परिवार का मामला वर्षों तक अदालतों में चलता रहा। कानूनी प्रक्रियाएं आगे बढ़ीं, कुछ लोग जांच के दायरे से बाहर हुए, कुछ सवाल अनुत्तरित रह गए। अदालतों ने अपने निर्णय कानून के अनुसार दिए और उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में यह पूछना भी जरूरी है कि बड़े मामलों में अंतिम सत्य तक पहुंचने में इतना समय क्यों लगता है।
देश की जनता अब मुकदमों की भाषा नहीं पढ़ती, वह राजनीति का व्याकरण पढ़ती है। उसे दिखाई देता है कि चुनाव आते हैं तो फाइलें खुल जाती हैं। चुनाव बीतते हैं तो वही फाइलें अलमारी में लौट जाती हैं। जैसे न्याय नहीं, मौसम बदल रहा हो। यह बीमारी केवल एक दल की नहीं है। कांग्रेस ने भी जांच एजेंसियों पर सवाल झेले। भाजपा पर भी विपक्ष वही आरोप लगाता है। क्षेत्रीय दल भी सत्ता में आते ही वही संस्थाएं अपने पक्ष में देखने लगते हैं, जिन पर विपक्ष में रहते हुए अविश्वास जताते थे। यानी समस्या व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है। लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, संस्थाओं की निष्पक्षता बचाने में होती है। यदि सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग या कोई भी जांच एजेंसी जनता के मन में स्वतंत्र नहीं दिखती, तो सबसे बड़ा नुकसान संविधान का होता है। लोकतंत्र की ताकत जनता का भरोसा है। यह भरोसा कानून की किताबों से नहीं, न्याय के अनुभव से पैदा होता है। जब जनता को लगता है कि ताकतवर लोगों की फाइलें राजनीतिक जरूरत के हिसाब से चलती हैं, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होने लगता है। यादव परिवार का मामला अंतत: अदालतों और कानून की प्रक्रिया का विषय है। दोष या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय न्यायपालिका ही करेगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न देश के सामने जरूर छोड़ दिया है क्या भारत की जांच एजेंसियां पूरी तरह स्वतंत्र हैं या वे आज भी सत्ता के रिमोट से संचालित होने के आरोपों से मुक्त नहीं हो सकीं? जब तक इस प्रश्न का उत्तर व्यवस्था अपने आचरण से नहीं देगी, तब तक हर बड़ी फाइल के साथ एक नया संदेह जन्म लेता रहेगा।
