मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : किसान एकता और सौहार्द को कुचलने की घिनौनी साजिश!

पॉलिटिका : किसान एकता और सौहार्द को कुचलने की घिनौनी साजिश!

के.पी. मलिक
किसान संगठन, जो कभी अराजनीतिक योद्धा बनकर किसानों की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करते रहे, आज अपनी ही आंतरिक दुश्मनी में धंस चुके हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की कीचड़ उछालने वाली जुबानी जंग, आरोपों की बौछार, व्यक्तिगत टिप्पणियां और नीयत पर कीचड़, न केवल शर्मनाक है, बल्कि किसान वर्ग खास कर खाप तंत्र को खोखला करने वाली
सुनियोजित साजिश का हिस्सा लगती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन संगठनों ने समय-समय पर किसान हित में संघर्ष कर समाज को नई दिशा देने का काम किया है। लेकिन आज राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर किसान संगठनों के कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच चल रही जुबानी जंग, आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत कटाक्ष न केवल दुर्भाग्यपूर्ण हैं, बल्कि पूरे किसान समाज को कमजोर करने वाले भी हैं। संदेह होता है कि यह कलह उन कुटिल ताकतों को हथियार थमा रहा है, जो किसान आंदोलन को नेस्तनाबूद देखना चाहती हैं।
दरअसल, ये तल्ख टिप्पणियां
और अपमानजनक कटाक्ष किसानों के वास्तविक दर्द, फसल का घाटा, कर्ज का बोझ, नीतिगत अन्याय से ध्यान भटकाने का कुत्सित खेल हैं। जिन संगठनों से किसान एकजुटता, अनुशासन और बलिदान की उम्मीद करते हैं, वहां से वैमनस्य और अराजकता का जहर बह रहा है। यह न केवल दुर्भाग्य है, बल्कि किसान संगठनों की विश्वसनीयता पर करारा तमाचा है, यह नई पीढ़ी के युवा किसानों को तोड़ने और भटकाने का सुनहरा अवसर! मतभेद लोकतंत्र की धड़कन हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर अपमानित करने वाली भाषा और अपशब्दों की बाढ़ अहंकार का वैंâसर है, मेरा दावा है कि यह अहंकार का वैंâसर पूरे आंदोलन को खा जाएगा।
मेरे विचार से यह घृणित नाटक अब बंद होना चाहिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान संगठनों और खाप पंचायतों को मिल बैठकर समाधान निकालने के प्रयास करने चाहिए।
जिन संगठनों से किसान एकता, संघर्ष और अनुशासन की उम्मीद करता है, वहीं से आपसी वैमनस्य का संदेश जाना चिंता का विषय है। यह स्थिति उन ताकतों को मजबूत करती है, जो किसान आंदोलन और किसान संगठनों को कमजोर देखना चाहती है। मेरा किसान संगठनों के अध्यक्षों और शीर्ष नेताओं से तल्ख और कड़वा सवाल है कि क्या आप अपने निजी हितों और सरकारी खैरात की भूख में किसान समाज को बर्बाद और तबाह करने पर तुले हैं? तुरंत अपने पदाधिकारियों को ललकारें, संयम सिखाएं, मर्यादा थोपें, सोशल मीडिया पर बयानबाजी के सख्त दिशानिर्देश जारी करें।
बहरहाल, आज आवश्यकता है आपसी संवाद की, संयम की और आपसी सम्मान और सहयोग की। किसान और मजदूर एकता ही सबसे बड़ी ताकत है। अगर हम आपस में ही लड़ते रहेंगे, तो हमारी आवाज कमजोर होगी और हमारे मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे। आइए, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर समाज और किसान हित को प्राथमिकता दें, क्योंकि मजबूत किसान संगठन ही मजबूत समाज और मजबूत देश की नींव होते हैं। आवेश में एक गलत शब्द भी किसान एकता को भाला मार सकता है। आपसी संवाद की गुंजाइश को खत्म न करें, वरना यह जुबानी जंग खूनी आपसी संघर्ष में बदल जाएगी। बता देना चाहता हूं कि किसान एकता ही अटल कवच है; आपसी लड़ाई में हमारी आवाज बुलंद होने के बजाय कुंद होकर दम तोड़ देगी और आपके तमाम मुद्दे और मांगें कूड़ेदान में फेंक दिए जाएंगे। व्यक्तिगत अहं से ऊपर उठो, वरना इतिहास तुम्हें गद्दार लिखेगा। सभी सामाजिक और किसान संगठनों से अपील है कि संगठनों के नेतृत्वों से मिलो, इस आपसी लड़ाई और मतभेद की आग को बुझाओ, नहीं तो यह जंग किसान और ग्रामीण समाज के विनाश का काल बन जाएगी। मजबूत संगठन ही देश की रीढ़ हैं; इन्हें तोड़ना देशद्रोह है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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