के.पी. मलिक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पश्चिमी यूपी हमेशा सत्ता की दिशा तय करनेवाला इलाका माना जाता है। यही वजह है कि २०२७ विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर शुरू हुई हलचल अब राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बनती जा रही है। रालोद प्रमुख जयंत चौधरी के द्वारा करीब ३५ विधानसभा सीटों की मांग की चर्चा केवल एक राजनीतिक मोलभाव नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी यूपी में बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी मानी जा रही है।
दरअसल, पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट राजनीति का प्रभाव दशकों से निर्णायक रहा है। चौधरी चरण सिंह की विरासत और किसान राजनीति की जमीन पर खड़ी राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) भले ही पिछले कुछ वर्षों में कमजोर हुई हो, लेकिन जाट वोट बैंक पर उसका असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। खासकर, किसान आंदोलन के बाद पश्चिमी यूपी में राजनीतिक माहौल बदला और रालोद को नई राजनीतिक ऊर्जा मिली। यही कारण है कि जयंत चौधरी अब एनडीए के भीतर केवल सहयोगी दल की भूमिका में नहीं रहना चाहते, बल्कि मौके की नजाकत को समझते हुए अपनी राजनीतिक ताकत के हिसाब से हिस्सेदारी मांग रहे हैं।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यदि वह रालोद की मांग मानती है तो नुकसान उसके अपने नेताओं को उठाना पड़ सकता है। पश्चिमी यूपी में कई सीटें ऐसी हैं जहां वर्तमान में भाजपा के विधायक हैं, लेकिन रालोद उन सीटों को अपनी पारंपरिक जमीन मानती है। बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बिजनौर, हापुड़, बुलंदशहर और मथुरा जैसे जिलों की कई सीटों पर रालोद अपनी दावेदारी मजबूत मानती है। यदि इन सीटों पर रालोद को टिकट मिलता है तो भाजपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है। यही वजह है कि सीट शेयरिंग एनडीए के भीतर सबसे संवेदनशील मुद्दा बन सकता है।
दरअसल, भाजपा की रणनीति हमेशा सामाजिक समीकरणों को साधने की रही है। पार्टी जानती है कि पश्चिमी यूपी में जाट वोट पूरी तरह उसके साथ बना रहे, इसके लिए जयंत चौधरी का साथ राजनीतिक रूप से फायदेमंद है। खासकर लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा यह जोखिम नहीं लेना चाहेगी कि जाट और किसान वोटों में किसी तरह की नाराजगी पैदा हो। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा इतनी बड़ी पार्टी होने के कारण अपने मौजूदा विधायकों को भी नाराज नहीं कर सकती। यही राजनीतिक संतुलन २०२७ की सबसे बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है।
दरअसल, इस पूरे समीकरण का सबसे दिलचस्प पहलू समाजवादी पार्टी की भूमिका है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव लगातार पश्चिमी यूपी में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि अखिलेश जानते है कि यदि रालोद उसके साथ आती है तो मुस्लिम-जाट समीकरण फिर से मजबूत हो सकता है, जैसा २०२२ चुनाव में कई सीटों पर देखने को मिला था। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लगातार चल रही है कि अगर भाजपा जयंत चौधरी की सीटों की मांग को गंभीरता से नहीं लेती, तो क्या रालोद फिर से सपा के साथ जा सकती है?
हालांकि, राजनीति में स्थायी दोस्ती और दुश्मनी जैसी कोई चीज नहीं होती। जयंत चौधरी फिलहाल केंद्र की सत्ता का लुफ्त उठा रहे हैं और उन्हें इसका सियासी फायदा भी मिल रहा है। लेकिन रालोद जैसी क्षेत्रीय पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज उसका जनाधार होता है। यदि पार्टी को लगता है कि एनडीए में रहकर उसका राजनीतिक विस्तार सीमित हो रहा है तो भविष्य में नए समीकरण बनने से इनकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल, पश्चिमी यूपी में किसान सियासत का एक और महत्वपूर्ण पहलू गन्ना मूल्य, बकाया और समय पर भुगतान, बिजली की दरें और एमएसपी जैसे मुद्दे आज भी बेहद प्रभावी हैं। जयंत खुद को केवल जातीय नेता नहीं, बल्कि किसान राजनीति के चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। ऐसे में वे २०२७ से पहले अपनी राजनीतिक ताकत का बड़ा प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे, ताकि समर्थकों को यह संदेश जा सके कि रालोद अब केवल ‘छोटी सहयोगी पार्टी’ नहीं बल्कि मजबूत क्षेत्रीय सियासी दल बन चुका है।
वहीं दूसरी ओर भाजपा के सामने दुविधा साफ है। यदि वह रालोद को ज्यादा सीटें देती है तो नेताओं में अंदरूनी असंतोष बढ़ सकता है और यदि कम सीटें देती है तो पश्चिमी यूपी का समीकरण कमजोर पड़ सकता है। वहीं सपा इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और किसी भी असंतोष को अपने पक्ष में बदलने की रणनीति तैयार कर रही है यानी २०२७ का चुनाव केवल भाजपा बनाम सपा नहीं रहनेवाला। असली लड़ाई सीटों, जातीय समीकरणों, किसान राजनीति और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं की होगी। पश्चिम उत्तर प्रदेश एक बार फिर राज्य की सत्ता का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बनने जा रहा है, जहां जयंत चौधरी की राजनीतिक चालें एनडीए और विपक्ष दोनों की रणनीति तय कर सकती हैं।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
