मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : किस किसको कूटेंगे सर... दिमागी नक्सल कह कर

प्रणवाक्षर : किस किसको कूटेंगे सर… दिमागी नक्सल कह कर

प्रणव प्रियदर्शी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करने का यह कोई पहला मौका नहीं था। इससे पहले लगातार १२ बार वे लालकिले पर तिरंगा फहरा चुके हैं। बावजूद इसके, उनके इस भाषण पर सबकी नजरें टिकी थीं। लगातार तीसरे कार्यकाल में चल रहे किसी प्रधानमंत्री के एक भाषण को लेकर इतनी उत्सुकता सामान्य नहीं है, लेकिन यह बेवजह भी नहीं थी।
खास चरण
प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी, संघ परिवार और इनका पूरा इकोसिस्टम जिसे ‘अमृतकाल’ कहता नहीं थकता, उस दौर का यह एक बेहद खास चरण है जो २० जुलाई (२०२६) से शुरू हुआ है। उस दिन नीट पेपर लीक घोटाले पर सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे युवाओं के खिलाफ सरकार ने इस कदर निर्ममता से बलप्रयोग किया कि सब हैरान रह गए। कोई सोच भी नहीं सकता था कि राष्ट्रीय राजधानी में निहत्थे युवाओं पर कीलों वाली लाठियां चलवाई जाएंगी, पैलेट गन की गोलियां दागी जाएंगी, लड़कियों के कपड़े फाड़े जाएंगे, उनके साथ यौन दुर्व्यवहार किया जाएगा।
आंदोलन का चरित्र
उसी दिन इस आंदोलन की मांग ही नहीं, इसका चरित्र भी बदल गया। उससे पहले तक यह परीक्षाओं के संचालन में गड़बड़ियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित कराने का प्रयास था। लेकिन उसके बाद यह लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई एक सरकार के तानाशाही रवैये को चुनौती देने और उसे उसकी औकात याद दिलाने का अभियान बन गया। जंतर-मंतर पर जुटने वाली युवाओं की भीड़ पर भी इसका प्रत्यक्ष असर दिखने लगा। अपने टूटे पैरों और फूटे माथों के साथ अस्पताल से छूटकर युवा वहां आने लगे कि सरकार चाहे तो हमें और मारे, लेकिन हम उससे जवाब तो लेकर रहेंगे। शरीर से ज्यादा मन पर लगे घावों के साथ युवतियां बेखौफ और बेहिचक बता रही थीं कि हमें पार्श्वभाग पर मारा, सीने पर मारा और मेल पुलिस मेंबर्स ने मारा।
संसद रही ठप
यही स्थिति संसद के अंदर विपक्ष के विरोध में भी दिख रही थी। शिक्षामंत्री का इस्तीफा विपक्ष के तेवर को नरम नहीं कर पाया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने साफ शब्दों में कह दिया, ‘गृहमंत्री अमित शाह पद से इस्तीफा दें और प्रधानमंक्षी नरेंद्र मोदी युवाओं से माफी मांगें, इससे कम पर कोई बात नहीं होगी।’ नतीजा यह कि पूरा मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। न तो गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कोई बयान दिया और न ही प्रधानमंत्री मोदी ने इस घटना की जिम्मेदारी ली।
पाइंट ऑफ नो रिटर्न
ऐसे माहौल में कांग्रेस की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का वह चर्चित भाषण हुआ, जिसने साफ कर दिया कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच अब बात ‘पॉइंट ऑफ नो रिटर्न’ की ओर चली गई है। जिस तरह से राहुल गांधी ने मंच से पीएम मोदी की विदेश नीति के खोखलेपन को उजागर किया, उनके व्यक्तित्व और सोच पर हमला किया, वह दोनों के बीच संवाद से रास्ता निकलने की गुंजाइश को खत्म कर देता है। इसके बाद यही देखना रह गया था कि सरकार और खुद प्रधानमंत्री मोदी इन हमलों का कैसे जवाब देते हैं, जनता के सामने कैसे विपक्ष को गलत और खुद को सही साबित करने की कोशिश करते हैं।
सिस्टम के अंदर
ऐसे में जो कुछ पीएम ने कहा, वह कई मामलों में निराशाजनक भले हो, कुछ अर्थों में बेहद गंभीर है। जो अहम बात प्रधानमंत्री ने कही, उनमें सबसे महत्वपूर्ण है दिमागी नक्सलियों का उल्लेख। वैसे तो पीएम मोदी अर्बन नक्सल का भूत पहले से खड़ा करते रहे हैं, लेकिन वाम चरमपंथ खत्म करने के दावे के मद्देनजर यह नया शब्द लेकर आए हैं। पीएम के मुताबिक, हथियारी नक्सलियों का तो उनकी सरकार पूरी तरह खात्मा कर चुकी है, लेकिन दिमागी नक्सल देश में ही नहीं, सिस्टम के अंदर भी हर तरफ पसरे हुए हैं।
नया विशेषण क्यों
प्रधानमंत्री के ही दावों के मुताबिक, जब हथियारी नक्सल देश में बचे ही नहीं तो दिमागी नक्सल तो वैचारिक चुनौतियां ही पेश कर सकते हैं। फिर वैचारिक तौर पर लोकतांत्रिक तरीकों से उनका मुकाबला क्यों नहीं किया जा सकता? क्यों खुद प्रधानमंत्री को उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान करना पड़ रहा है? क्या उन्हें भी वैसे ही अलग-थलग किया जाएगा जैसे इस सरकार में मुस्लिम को अलग-थलग किया जाता रहा है? क्या जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ को मुस्लिम या आतंकवादी करार देने में नाकामी के चलते यह नया विशेषण गढ़ा गया है?
अहम फर्क
यहां उस बड़े फर्क की तरफ ध्यान न देना गलत होगा, जो राहुल गांधी और पीएम के नजरिए में दिख रहा है। जहां पीएम बाकायदा लालकिले से विरोधियों को ‘अलग-थलग’ करने का आह्वान करते हैं और यह भी नहीं बताते कि ऐसा संवैधानिक तरीकों से किया जाएगा या असंवैधानिक उपायों से, वहीं राहुल गांधी पीएम की छवि की धज्जियां उड़ाते हुए भी यह साफ करते हैं कि हम उन्हें नफरत नहीं मोहब्बत से और बगैर कोई हिंसा किए, अहिंसात्मक तरीकों से हराएंगे। इतना ही नहीं, वे यह भी साफ कर देते हैं कि आगे चलकर अगर कभी आरएसएस की आवाज को गलत ढंग से दबाने की कोशिश होती है, तो वे उन कोशिशों का भी इसी शिद्दत से विरोध करेंगे।

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