मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : दीदी के सांसदों में ऐसी अफरा-तफरी क्यों?

प्रणवाक्षर : दीदी के सांसदों में ऐसी अफरा-तफरी क्यों?

 प्रणव प्रियदर्शी

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मिली पराजय के बाद उसकी जो दुर्गति हो रही है, उसने विपक्षी खेमे को स्वाभाविक ही सकते में डाल दिया है। चुनावों में हार-जीत कोई नई चीज नहीं है। लेकिन कोई पार्टी चुनाव जीतने के बाद हारी हुई पार्टी का नामो-निशान मिटाने पर तुल जाए, ऐसा भारतीय राजनीति में अब तक नहीं देखा गया था।
सत्ता पक्ष का सहयोग
कहने को कहा जा सकता है कि अगर किसी पार्टी के ज्यादातर विधायक-सांसद पार्टी-नेतृत्व की कार्य-शैली से नाराज हों, मौके का इंतजार कर रहे हों और मौका मिलते ही वहां से निकल भागने पर आमादा हो जाएं तो इसमें दूसरी कोई पार्टी भला क्या कर सकती है? लेकिन टीएमसी छोड़ रहे सांसदों-विधायकों को जिस तरह से सत्ताधारी पार्टी का सहयोग मिल रहा है, सत्ता पक्ष के ताकतवर नेताओं के साथ उनकी बैठकें हो रही हैं, वह सब कुछ स्पष्ट कर देता है।
दिखी गर्मजोशी
स्वाभाविक ही, विपक्षी दलों ने हालात की गंभीरता को समझने में देर नहीं की। इंडिया ब्लॉक की बैठक में ममता बनर्जी और सोनिया गांधी में दिखी गर्मजोशी ने काफी कुछ बता दिया। उसके ठीक बाद अभिषेक बनर्जी और राहुल गांधी की मुलाकात ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। संभवत: इन्हीं संकेतों को देखते हुए यह चर्चा भी सार्वजनिक हो गई कि तृणमूल और एनसीपी जैसे कांग्रेस से निकले दलों के कांग्रेस में विलय का टाइम आ गया है।
विलय का तर्क
इस चर्चा के अपने मायने हैं। मौजूदा राजनीतिक चुनौतियां इसकी जरूरत भी बता रही हैं। लिहाजा, यह तर्क जोर पकड़ रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के ३० सांसदों के दो तिहाई हिस्से को फोड़ना सत्तारूढ़ पार्टी के लिए जितना आसान हो सकता है, कांग्रेस में विलय के बाद १३० सांसदों के दो तिहाई हिस्से को पार्टी से अलग करना उतना आसान नहीं होगा। यही तर्क एनसीपी जैसे दलों पर भी लागू होता है।
लंबा और जटिल काम
बावजूद इसके, याद रखना चाहिए कि व्यवहार में किसी स्वतंत्र पार्टी का अपने अस्तित्व को भुलाते हुए किसी अन्य पार्टी में विलीन होने का पैâसला जितना मुश्किल है, उतना ही जटिल भी। टॉप के नेता हालात के दबाव में मन बनाते भी हैं तो नीचे अलग-अलग स्तरों पर नेताओं के अपने अलग समीकरण होते हैं। कार्यकर्ताओं का भी अपना मूड होता है। उन सबकों विश्वास में लेना और विलय के लिए तैयार करना एक लंबा और जटिल काम है।
ऐसी जल्दबाजी क्यों
आश्चर्य नहीं कि विलय की चर्चा जितनी तेजी से पैâली, उतनी ही जल्दी ठंडी भी पड़ गई। लेकिन यह सवाल बना रह गया कि आखिर सत्तारूढ़ बीजेपी लोकसभा सदस्यों को अपनी ओर करने की ऐसी जरूरत क्यों महसूस कर रही है? पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित तृणमूल विधायकों के दल-बदल को ममता या अभिषेक से नाराजगी की आड़ कुछ हद तक दी जा सकती है, लेकिन सांसदों को निर्वाचित हुए तो दो साल हो गए। अगले लोकसभा चुनाव में भी अभी तीन साल हैं।
बदनामी की नई खेप
फिर बीजेपी नेतृत्व अभी क्यों खामखा बदनामी और आरोपों की नई खेप आमंत्रित कर रहा है? जवाब में एक बात यह कही जा रही है कि संसद के पिछले सत्र में परिसीमन विधेयक का गिरना बीजेपी नेतृत्व को खल गया है। वह जल्द से जल्द इसे पारित कराना और विरोधियों को जवाब देना चाहती है। मगर इस जवाब में ज्यादा दम इसलिए नहीं है क्योंकि राज्यसभा हो या लोकसभा बीजेपी (और एनडीए भी) दो तिहाई बहुमत से बहुत दूर है। इस तरह के छिटपुट दल-बदल से वह खाई भरी नहीं जा सकेगी।
डर क्या है?
तो क्या बीजेपी नेतृत्व ने राहुल गांधी की इस भविष्यवाणी को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है कि मौजूदा मोदी सरकार एक साल के अंदर गिर जाएगी? क्या उसे यह डर सता रहा है कि विपक्षी दल जेडी-यू और टीडीपी जैसे दलों के नेतृत्व को मनाकर संसद सत्र के दौरान अचानक कोई बड़ा झटका दे सकते हैं? क्या टीएमसी सांसदों में मची इस अफरा-तफरी के पीछे लोकसभा में बहुमत से अपनी दूरी को कम से कम करने की बीजेपी नेतृत्व की इच्छा है?
लंबी लड़ाई पर निगाहें
हालांकि, इंडिया ब्लॉक की बैठक में दिया राहुल गांधी का बयान तो बताता है कि उनकी नजरें लंबी लड़ाई पर टिकी हैं। उन्होंने सहयोगी दलों को बताया है कि पुराने ढर्रे पर राजनीति करते हुए देश को उस गड्ढे से नहीं निकाला जा सकता, जिसमें वह फंस चुका है। नए दौर में विपक्षी दलों को प्रतिरोध की राजनीति करनी होगी, वैसी राजनीति जो आजादी से पहले के दौर में कांग्रेस सफलतापूर्वक कर चुकी है।
पुराना दौर
इस कथित प्रतिरोधी राजनीति का दूसरा दौर कैसा होगा और कांग्रेस उसमें कितनी सफल होगी, यह तो वक्त बताएगा। फिलहाल, जो सवाल सबका ध्यान खींच रहा है और अगले कुछ महीने खींचता रहेगा, वह यह है कि क्या राहुल गांधी वाकई विपक्षी राजनीति को प्रतिरोध के पुराने दौर में ले जाना चाहते हैं या यह उन संभावित चुनौतियों की ओर से ध्यान भटकाने की एक कोशिश भर है, जो जल्दी ही सत्तारूढ़ खेमे की राह में आने वाली हैं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।)

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