मुख्यपृष्ठस्तंभन्याय पर उठते सवाल और राजघाट का सत्याग्रह

न्याय पर उठते सवाल और राजघाट का सत्याग्रह

अनिल तिवारी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा होता है। जब आम नागरिक या राजनीतिक दल यह कहने लगें कि उन्हें न्याय की उम्मीद नहीं रही, तो यह केवल एक दल या व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
दिल्ली के राजघाट पर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और आतिशी सहित आम आदमी पार्टी के नेताओं का पहुंचना इसी चिंता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी जस्टिस स्वर्णकांता के पैâसलों और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर अपना विरोध दर्ज करा रही है। आम आदमी पार्टी का आरोप है कि उसे तोड़ने और दबाव में लाने की कोशिशें हो रही हैं, इसलिए अब सत्याग्रह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। आम आदमी पार्टी के बुरे दिन तब शुरू हुए थे जब उसने गुजरात में राजनीतिक हिस्सेदारी खोजने की कोशिश की। उसके बाद से आम आदमी पार्टी लगातार निशाने पर रही और पार्टी के कई दिग्गज नेताओं को जेल जाना पड़ा। उपयुक्त मामले के बिना वे महीनों तक जेल में सड़ते रहे, न्याय की उम्मीद लगाए रहे पर आखिर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। हालत यह है कि अब तो गुजरात के निकाय चुनाव में भी आम आदमी पार्टी जमीन खोती नजर आ रही है इस तरह की जमीन देश के लगभग हर राज्य में क्षेत्रीय दल खो रहे हैं। पिछले एक दशक में देश के कई राज्यों जैसे महाराष्ट्र, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब सहित अनेक राज्यों में राजनीतिक और संवैधानिक विवाद सामने आए हैं, जिनसे लोगों के मन में न्यायिक निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे हैं। निचली अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक कई मामलों में पैâसलों और प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हुई है। न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम सहारा मानी जाती है। यदि जनता या जनप्रतिनिधियों के मन में यह भावना गहराने लगे कि न्याय प्रक्रिया सत्ता के दबाव से प्रभावित हो सकती है, तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। राजघाट का यह सत्याग्रह केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि न्याय में घटते विश्वास की उस बेचैनी का प्रतीक है, जिसे गंभीरता से समझने की जरूरत है।

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