मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : सर्टिफिकेट ईमानदारी का

तरकश : सर्टिफिकेट ईमानदारी का

धनुर्धर

संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने बड़ी ईमानदारी से एक बात कही है। उन्होंने बताया है कि यह जो नई पीढ़ी जेन जी है, वह अपने से पहले की पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा ईमानदार है। गौर कीजिए, वह कह रहे हैं अपने से पहले की पीढ़ी के मुकाबले। यानी ईमानदारी का यह जो मुकाबला हो रहा है, वह जेन जी और उसके पहले वाली पीढ़ी के बीच है। खुद भागवत इस मुकाबले से बाहर हैं। यही इस बात का पुख्ता सबूत है कि भागवत जी पूरी ईमानदारी से बात कर रहे हैं। ईमानदारी की यह खासियत है कि दूसरों के मामले में वह ज्यादा आसानी से और ज्यादा सही ढंग से लागू की जा सकती है।
मार्गदर्शन का विशेषाधिकार
चूंकि संघ प्रमुख ७५ पार कर चुके हैं, यानी शास्त्रों के मुताबिक, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तीनों अवस्थाओं को पार कर संन्यास आश्रम में पहुंच चुके हैं और कायदे से मार्गदर्शक मंडल में शामिल होने की पात्रता अर्जित कर चुके हैं, इसलिए जब चाहे, जिसको चाहे पकड़कर उसका मार्गदर्शन कर सकते हैं। अबकी उन्होंने जेन जी को चुना। अब जेन जी से पूछने की कोई जरूरत तो थी नहीं। वैसे भी पूछने लग जाएं तो कोई भी मार्गदर्शन कराने को कहां तैयार होता है। उसमें भी आज की यह पीढ़ी! खुदा खैर करे। पूछने बैठते तो पूछते ही रह जाते और यह पीढ़ी नाक पर मक्खी भी न बैठने देती।
भांति-भांति के सर्टिफिकेट
सो, फटाफट सारे इंतजाम कर दिए गए, तारीख और स्थान घोषित करके मंच सजा दिया गया। इतने तामझाम के साथ जिसका मार्गदर्शन करना है, उसे भी थोड़ी अहमियत तो देनी ही होगी। सो, बातचीत में संघ प्रमुख ने इस पीढ़ी को ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे दिया। याद रखें, वे इतनी आसानी से किसी को सर्टिफिकेट देते नहीं हैं। मुस्लिम बेचारे कब से तरस रहे हैं। उन्हें अब तक नहीं मिला देशभक्ति का सर्टिफिकेट। हिंदू होने का सर्टिफिकेट दे दिया, लेकिन देशभक्ति का नहीं दिया।
हिंदू मतलब देशभक्त
कह दिया कि इस देश में पैदा हुए सभी लोग हिंदू हैं और हिंदू होने का मतलब ही देशभक्त होना है। तो भई ले लो। खुद को गर्व से हिंदू कहो और बन जाओ देशभक्त दम है तो। अब इसे आप बेईमानी नहीं कह सकते। यह होशियारी है, जो संघ और संघ प्रमुख ही नहीं तमाम संघसेवकों की रग-रग में समाई हुई है।
देश विरोधी का ठप्पा
बहरहाल, बात जेन जी और उसे मिले ईमानदारी के सर्टिफिकेट की हो रही थी। आप संघ प्रमुख की होशियारी देखिए। उन्होंने जेन जी को ईमानदार बताया, लेकिन अपने संगठन की ईमानदारी का सवाल सामने नहीं आने दिया। वह सामने आ जाता तो मुश्किल हो सकती थी। जिस संघ के प्रमुख जेन जी को ईमानदार बता रहे थे, उसी संघ के एक अन्य अहम पदाधिकारी दो दिन पहले जेन जी आंदोलन को देशविरोधी बता चुके हैं।
परस्पर विरोधी बयान
अब एक ही संगठन के दो बड़े पदाधिकारी दो तरह की बात करते हैं। दोनों में से कोई भी अपनी बात वापस नहीं लेता। संगठन भी उनमें से किसी के बयान को उनकी निजी राय नहीं बताता और दोनों ही उस संगठन में बने रहते हैं। ऐसे में क्या देश की जनता या सिर्फ जेन जी भी, उस संगठन को ईमानदार मान सकती है?
बेईमानी में ईमानदारी
आप कहेंगे मुश्किल है, लेकिन यहीं पर सवाल आता है होशियारी का। जरा होशियारी से सोचें तो रास्ता निकल जाता है। बात तो ईमानदारी की हो रही है। ईमानदारी हर चीज में देखी और पाई जा सकती है। श्रीमान नाना पाटेकर अपनी एक फिल्म में फरमा चुके हैं, ‘अब्दुल अपना धंधा है बेईमानी का, लेकिन करना पड़ता है ईमानदारी से।’ तो जब बेईमानी में ईमानदारी तलाशी जा सकती है तो क्या ईमानदारी से दोहरा मापदंड नहीं अपनाया जा सकता? बिल्कुल अपनाया जा सकता है।
बदल गया मापदंड
आप देखिए कि आडवाणी से लेकर मुरली मनोहर जोशी तक एक लाइन से सारे नेता ७५ पार करने के जुर्म में सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर मार्गदर्शक मंडल जॉइन करने के लिए मजबूर किए गए। लेकिन वक्त बदला तो मापदंड बदल दिया गया। अब नरेंद्र मोदी जी से लेकर मोहन भागवत जी तक सब इस नियम को अंगूठा दिखाते हुए अपने पद पर न केवल बने हुए हैं, बल्कि पूरी ठसक के साथ कभी जेन जी को कीलें लगी लाठियों से पिटवाकर माफ कर देते हैं और कभी उस पर देशविरोधी का ठप्पा लगवाकर उसे ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे देते हैं। बेवजह सवाल और संदेह न करें। जब बेईमानी में ईमानदारी हो सकती है तो देशद्रोह में ईमानदारी की संभावना क्यों नहीं देखी जा सकती?
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

अन्य समाचार