मुख्यपृष्ठअपराधरिपोर्टर डायरी : दाऊद का सिर दर्द बन गया है 'सलीम'!

रिपोर्टर डायरी : दाऊद का सिर दर्द बन गया है ‘सलीम’!

सुनील ओसवाल

मुंबई वो शहर जो सपनों की भी राजधानी है और सायों की भी। जहां एक तरफ ऊंची इमारतों की चमक है, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं इमारतों की छाया में पलता रहा है एक और संसार अंडरवर्ल्ड।
यह वो दुनिया थी जहां डर, पैसा और वफादारी की अपनी भाषा थी और उस भाषा का सबसे दिलचस्प हिस्सा थे। उपनामों का यानी उपनाम। एक तरफ ऊंची इमारतों की चमक तो दूसरी तरफ गलियों में घूमती दहशत अंडरवर्ल्ड की दास्तानें और इन दास्तानों में सबसे दिलचस्प बात है कि गैंगस्टरों के टोपण नाम, यानी उनके कोडनेम, जो डर, चालाकी और पहचान तीनों की कहानी कहते हैं।
मुंबई के अंडरवर्ल्ड में अगर किसी नाम ने सबसे ज्यादा उलझन पैदा की, तो वो था, सलीम। दाऊद इब्राहिम के गिरोह में एक नहीं, बल्कि कई सलीम थे। सबकी चाल एक जैसी, सबकी जुबान सख्त, पर पहचान में फर्क जरूरी था और वहीं से शुरू हुआ उपनामों नामों का खेल।
तभी पहचान आसान करने के लिए हर सलीम को मिला उसका उपनाम-
सलीम तलवार, क्योंकि वो तेज और खतरनाक था। सलीम हड्डी, क्योंकि दुबला-पतला था। सलीम पासपोर्ट क्योंकि नकली दस्तावेज बनाने में उस्ताद था।
और सलीम कुत्ता, जो गुस्से में काट खाने को तैयार रहता था। इन नामों के पीछे सिर्फ मजाक या शौक नहीं, बल्कि एक जरूरत थी- पहचान की जरूरत, उस अंधेरे में जहां सबका असली नाम धुंधला पड़ जाता था।
छोटा, लंबा और चिकना-पहचान का खेल
अंडरवर्ल्ड की फाइलों में ‘छोटा’ और ‘बड़ा’ जैसे शब्द सिर्फ कद या उम्र नहीं, बल्कि पहचान के प्रतीक बन गए। दो शकील थे एक लंबा, एक छोटा। लंबा बना शकील लंबू और छोटा वही बना जो बाद में दुनियाभर में मशहूर हुआ- छोटा शकील। अबू सालेम का चेहरा हमेशा चमकता रहता था, होंठ लाल और आवाज मुलायम इसलिए पूरा गिरोह उसे कहने लगा सालेम चिकना। फारुख लैदर का कारोबार करता था तो बन गया फारुख लादी। नाम बदलते गए, मगर इन उपनामों ने उनकी पहचान स्थाई बना दी।
डर का ब्रांड
मुंबई के अंडरवर्ल्ड में नाम ही ब्रांड थे। छोटा राजन, डैडी, अण्णा, लंकेश, चिकना ये नाम सुनते ही लोग सिहर उठते थे। पुलिस की डायरी में भी यही नाम दर्ज थे, जैसे गली के लोगों की यादों में। अरुण गवली को उसके इलाके में लोग बाप माणूस कहते थे, वही आगे चलकर बन गया डैडी। सदा पावले अपने भांजे के कारण सदा मामा कहलाया। शरद शेट्टी दक्षिण भारतीय था, तो सब उसे शेट्टी अण्णा बुलाने लगे। रिश्तों के ये शब्द अंडरवर्ल्ड में खून के रिश्तों से भी गहरे हो गए।
नामों में छिपी कहानियां
किसी को लस्सी का शौक था तो बना राजू घट्टा, किसी को डोसा पसंद था तो बना अहमद डोसा। एक शख्स फिल्मों में गुंडे का रोल करने गया फिल्म थी पुराना मंदिर और वही उसका टोपण नाम बन गया। मुंबई की गलियों में जब कोई कहता ‘पुराना मंदिर आया है’, तो लोग जान जाते थे कि मामला अब खामोश नहीं रहेगा।

आवाज, डर और पहचान
अंडरवर्ल्ड में कई बार आवाज ही पहचान बन जाती थी।
छोटा शकील की आवाज में बात करनेवाला एक आदमी पुलिस को सालों तक उलझाए रहा-
लोग फोन पर सुनते और समझते कि ‘छोटा खुद बोल रहा है।’
यह वो दौर था जब एक नाम, एक आवाज और एक अफवाह से शहर कांप उठता था।
विरासत की तरह बचे नाम
समय बीत गया। कई नाम पुलिस की फाइलों में धूल खा रहे हैं, कई गोली से मरे, कई दुबई के सन्नाटे में खो गए।पर उनके टोपण नाम आज भी मुंबई की हवा में तैरते हैं।
हड्डी, चिकना, डैडी, लंकेश —
ये नाम अब भी दहशत और किस्सों दोनों में जिंदा हैं।

मुंबई का अंडरवर्ल्ड सिर्फ गोलियों की कहानी नहीं, बल्कि नामों की विरासत है, जहां डर का भी एक नाम होता था।
‘मुंबई में नाम नहीं, उपनाम चलता था, क्योंकि यहां पहचान नहीं, डर बिकता था।’

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