उमेश गुप्ता / वाराणसी
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) तथा पारुल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट जल से अत्यंत विषैले एवं कैंसरकारी रंग ‘मैलाकाइट ग्रीन’ को हटाने के लिए एक अभिनव एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है। यह शोध औद्योगिक जल प्रदूषण से उत्पन्न गंभीर पर्यावरणीय चुनौती के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
यह संयुक्त शोध कार्य आईआईटी (बीएचयू) के जैव-रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय तथा पारुल प्रौद्योगिकी संस्थान, पारुल विश्वविद्यालय, वडोदरा के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किया गया। शोध दल में आईआईटी (बीएचयू) के जैव-रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय के सह-प्राध्यापक डॉ. विशाल मिश्रा के साथ श्री आलोक तिवारी, गौरांग डामले, डॉ. शिवेंदु सक्सेना, डॉ. विशाल सांधवार, सुश्री दीक्षा सक्सेना तथा जेएसपीएम विश्वविद्यालय, पुणे के डॉ. दीपक जाधव शामिल रहे।
इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित ‘रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री’ की शोध पत्रिका ‘आरएससी एडवांसेज़’ (2026, खंड-16, पृष्ठ 24356–24369) में “एडसॉर्प्शन ऑफ मैलाकाइट ग्रीन फ्रॉम एक्वियस सॉल्यूशंस यूजिंग ए नॉवेल एसएनओ₂/पीएएनआई-को-पीपीवाई नैनोकॉम्पोजिट” शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह नवीन नैनो-संयोजित पदार्थ संतरे के छिलके (साइट्रस साइनेंसिस) के अर्क को प्राकृतिक अपचायक कारक के रूप में उपयोग कर तैयार किया गया है, जिससे यह तकनीक पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल एवं अपशिष्ट-आधारित बन गई है। इसमें टिन ऑक्साइड (एसएनओ₂) नैनोकणों पर पॉलिएनिलीन (पीएएनआई) एवं पॉलीपाइरोल (पीपीवाई) की सह-पॉलीमरित परत इन-सीटू पॉलिमरीकरण तकनीक द्वारा विकसित की गई है।
तकनीक की प्रमुख विशेषताएँ :
* संतरे के छिलके जैसे नवीकरणीय एवं शून्य-लागत अपशिष्ट पदार्थ का उपयोग
* मात्र 30 मिनट में 97.06 प्रतिशत मैलाकाइट ग्रीन रंग हटाने की क्षमता
* 1250 मिलीग्राम प्रति ग्राम की अत्यधिक उच्च अधिशोषण क्षमता
* महंगे उपकरण, खतरनाक रसायन या प्रशिक्षित श्रमिकों की आवश्यकता नहीं
* गैर-विषाक्त, जैव-संगत एवं औद्योगिक उपयोग हेतु आसानी से विस्तार योग्य तकनीक
विश्वभर में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रंगयुक्त अपशिष्ट जल को एक गंभीर पर्यावरणीय संकट माना जाता है। मैलाकाइट ग्रीन विशेष रूप से विषैला, कैंसरकारी तथा जैविक रूप से अपघटित न होने वाला रसायन है, जो जलीय जीवों एवं मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने शोधकर्ताओं को बधाई दी तथा कहा कि इस प्रकार का सहयोगात्मक एवं अनुप्रयुक्त शोध संस्थान की सामाजिक एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु सतत प्रौद्योगिकी विकास की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि आईआईटी (बीएचयू) समाजोपयोगी एवं वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाले नवाचारों को निरंतर प्रोत्साहित करता रहेगा।
डॉ. विशाल मिश्रा ने कहा कि यह संयुक्त शोध आईआईटी (बीएचयू) एवं पारुल विश्वविद्यालय के बीच मजबूत शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने बताया कि जैव-रासायनिक अभियांत्रिकी एवं उन्नत पदार्थ विज्ञान के समन्वय से औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन के लिए एक व्यावहारिक एवं किफायती समाधान विकसित किया गया है।
शोध दल ने आईआईटी (बीएचयू), पारुल विश्वविद्यालय तथा के. के. वाघ अभियांत्रिकी शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, नासिक द्वारा प्रदान किए गए शोध एवं आधारभूत संरचना सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। शोधकर्ताओं ने बताया कि भविष्य में इस तकनीक के पुनः उपयोग तथा वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल प्रणालियों में इसके परीक्षण पर कार्य किया जाएगा।
