मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : `सिस्टम' का पूर्ण अपराधीकरण! ... क्या विपक्ष की चेतना जागी?

रोखठोक : `सिस्टम’ का पूर्ण अपराधीकरण! … क्या विपक्ष की चेतना जागी?

संजय राऊत

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों को देखकर क्या देश जागेगा? पश्चिम बंगाल और असम का चुनाव भाजपा ने खुलेआम चुराया है। जब `सिस्टम’ पर आपराधिक मानसिकता वाले लोग कब्जा कर लेते हैं, तब क्या होता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पश्चिम बंगाल और असम में देखने को मिला। यदि इस घटनाक्रम से विपक्ष की चेतना जागी होगी, तो ही उन्हें सद्बुद्धि आएगी!

राजनीति बदमाशों का अंतिम अड्डा है। पश्चिम बंगाल में मोदी-शाह और उनकी टीम ने जिस तरह से चुनाव लड़ा और ममता बनर्जी को पराजित किया, उसे देखकर यह स्पष्ट हो गया है कि राजनीति वाकई बदमाशों का ही अड्डा है।
जब बदमाशों के हाथ में सत्ता की बागडोर होती है, तो पूरा `सिस्टम’ ही गुनहगार बना दिया जाता है।
पश्चिम बंगाल और असम में वही होता दिख रहा है।
राहुल गांधी एक भरोसेमंद नेता हैं। उन्होंने अत्यंत प्रखरता से कहा, `असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव भाजपा ने चुनाव आयोग की मदद से `हड़प’ लिए हैं।’ बंगाल में भाजपा द्वारा सौ से अधिक सीटें हथिया ली गईं, यही तरीका हमने पहले भी देखा है। मध्य प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र के २०२४ के चुनाव इसी तरह चुराए गए। `सिस्टम’ पर कब्जा कर लिया गया। राहुल गांधी जो कह रहे हैं, उसका सारांश अंतत: वही है भारत की सभी संवैधानिक संस्थाएं (system) आपराधिक गिरोहों के कब्जे में चली गई हैं।
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों ने देश में खलबली मचा दी। भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध भूमिका लेने वाले क्षेत्रीय दलों और उनके नेताओं को भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में यह मुख्य रूप से हुआ। मुख्यमंत्री स्टालिन के पारंपरिक कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र में १ लाख २ हजार वोट ‘SIR’ (सिलेक्टिव इंक्लूजन एंड रिमूवल) के नाम पर उड़ा दिए गए। स्टालिन ८,७९५ मतों से हार गए।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र में ५१ हजार वोट ‘SIR’ के तहत हटा दिए गए। ममता १५ हजार वोटों से हार गईं।
उससे पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री केजरीवाल के निर्वाचन क्षेत्र से २५ हजार वोट रहस्यमय तरीके से काट दिए गए। केजरीवाल १५ हजार वोटों से हार गए। भाजपा की राजनीति का यह एक आपराधिक पैटर्न है।
परिवर्तन क्यों हुए?
केरल में वामपंथियों की सरकार थी, वहां सत्ता परिवर्तन हुआ और कांग्रेस की सत्ता आई। तमिलनाडु में द्रमुक (डीएमके) और अन्ना द्रमुक (एआईडीएमके) को लोगों ने ठुकरा दिया और अभिनेता विजय की `टीवीके’ (तमिलगा वेत्री कड़गम) पार्टी का विकल्प चुना। इस पार्टी ने सौ से अधिक सीटें जीतीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि दक्षिण का कोई भी द्वार भाजपा के लिए नहीं खुला, लेकिन अब भाजपा को दक्षिण की आवश्यकता ही नहीं रही। तमिलनाडु के `युवा’ मतदाताओं ने विजय की टीवीके पार्टी को स्वीकार किया। पुरानी `हिंदी’ मुखालफत, द्रविड़ अस्मिता जैसी अवधारणाओं को नई पीढ़ी ने स्वीकार नहीं किया और मुख्यमंत्री के रूप में उत्तम कार्य करने वाले स्टालिन को भी हार का सामना करना पड़ा। स्टालिन मोदी-शाह की भ्रष्ट, धार्मिक और द्वेषपूर्ण राजनीति के खिलाफ लगातार दृढ़ भूमिका लेते रहे। भाजपा की आपराधिक `सिस्टम’ ने उनकी हार सुनिश्चित की। तमिलनाडु में आश्चर्यजनक बात यह रही कि `टीवीके’ पार्टी के विजय (अर्थात सी. जोसेफ विजय) ईसाई हैं। इस प्रकार, तमिल जनता ने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को ही खत्म कर दिया। भाजपा के नकली हिंदुत्व और द्रविड़ अस्मिता के जाल में न फंसते हुए तमिलों ने विजय को भारी मतदान किया।
असम में पिछले पांच वर्षों से एक बेलगाम मुख्यमंत्री का शासन चल रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा का व्यवहार कभी भी लोकतंत्र और संस्कृति के अनुरूप नहीं रहा। उनके कार्यकाल में न तो असम का विकास हुआ और न ही असम के युवाओं को रोजगार मिला। फिर भी उनकी और भाजपा की विजय हुई। असम में उनके खिलाफ जनमत की हवा बह रही थी, फिर भी ये लोग वैâसे जीतते हैं, इसका उत्तर सबको पता है।
असम में जीत चुराई गई। धर्म और कट्टरता का जहर भाजपा ने असम में भी घोला और लोकतंत्र में अंत में धर्म और द्वेष की राजनीति की जीत हुई।
धर्मध्वजा
पश्चिम बंगाल में भाजपा की `धर्मध्वजा’ फहराने का मोदी-शाह का सपना आखिरकार पूरा हुआ। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि यह `धर्मध्वजा’ लोकतंत्र के सीने पर पैर रखकर गाड़ दी गई है। यह देश के विपक्षी दलों को पूरी तरह परास्त करने की साजिश है। रशिया में पुतिन एकतरफा जीत हासिल करते हैं, पाकिस्तान के चुनावों में कौन जीतेगा यह वहां की आईएसआई या सेना प्रमुख तय करते हैं। दुनिया के तानाशाही या धार्मिक राष्ट्रों में जो होता है, वही लोकतंत्र के नाम पर भारत में हो रहा है। यह वैâसे होता है? भारत में विपक्षी दल नहीं हारते, बल्कि `सिस्टम’ की जीत होती है। यदि यह सिस्टम आपराधिक दिमाग वाले (क्रिमिनल माइंडेड) व्यक्तियों के हाथों में चली जाए, तो वह देश के लोकतंत्र और संविधान को पैरों तले रौंदते हुए बार-बार जीतता जाता है। दक्षिण में द्रमुक और पूर्व में तृणमूल को ठिकाने लगाकर भाजपा ने वे कांटें हटा दिए जो विरोधी थे। महाराष्ट्र में पहले ही शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस को तोड़कर विरोध की धार कम कर दी। दिल्ली में केजरीवाल को हरवाया गया। अन्ना द्रमुक, तेलुगु देशम और नीतीश कुमार भाजपा के खेल के `जोकर’ पहले ही बन चुके हैं। कांग्रेस में भाजपा के चमचे घुस गए हैं और वे राहुल गांधी की लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। राहुल गांधी ने जब SIR’ के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी, तब उनके पैर खींचने वाले कल के परिणामों के बाद तो समझदार हो गए होंगे। भाजपा की नीति उन नेताओं को हराने और उनका नेतृत्व नष्ट करने की है, जिनके नाम पर वे लोग जीत सकते हैं। इसी तरह अमेठी में राहुल गांधी को हराया गया था, हालांकि राहुल गांधी उससे फिर उभरकर खड़े हुए। `एसआईआर’ जैसा नया हथियार आया है, ईवीएम, रिटर्निंग ऑफिसर, स्थानीय प्रशासन, पुलिस तंत्र इन सबको `मैनेज’ करके मुख्य `सीटों’ को निशाना बनाया जाता है और बड़े नेताओं को पराजित किया जाता है। अधीर रंजन चौधरी, गौरव गोगोई, स्टालिन, ममता बनर्जी को इसी तरह हराया गया। चुनौती देने वाला नेतृत्व खड़ा ही न हो पाए और पूरा मैदान `अडाणी’ के लिए साफ हो जाए, यही एकमात्र कार्यक्रम चल रहा है। चुनाव आयोग ने इस पूरे प्रकरण में लोकतंत्र के विरुद्ध भूमिका निभाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच जीत का अंतर लगभग ३२ लाख ११ हजार वोटों का है। यदि `SIR’ में हटाए गए ९१ लाख वोटों पर विचार करें, तो प्रत्येक सीट पर औसतन ३० हजार मतदाताओं के नाम काटे गए। १७६ सीटों पर भाजपा-तृणमूल की जीत का अंतर ३० हजार से कम है, जबकि ११७ सीटों पर यह अंतर ३० हजार से अधिक है। लब्बो-लुआब यह कि इन ३२ लाख वोटों के कारण सौ से अधिक सीटों पर `उलटफेर’ हुआ। इसे अंजाम देने के लिए चुनाव आयोग ने भाजपा की मदद की। मतदाता फेहरिस्त से हटाए गए ९१ लाख मतदाताओं में से २७ लाख मतदाता अपना नाम फिर से सूची में शामिल कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। ये आंकड़े साधारण नहीं हैं। ये आंकड़े और उनके पीछे की पटकथा बेहद पेचीदा है। `सरकार विरोधी लहर’, `लोगों को बदलाव चाहिए था’, `भ्रष्टाचार और विकास का अभाव’ जैसा एक `Perception’ तैयार किया जाता है, लेकिन भाजपा की जीत की असली कहानी आंकड़ों की इस हेराफेरी में छिपी है। बंगाल में भाजपा को १.३९ करोड़ और तृणमूल को १.२७ करोड़ वोट मिले, लेकिन उसमें सौ सीटों की बाजी पलट गई। यह पहले ही तय था।
राहुल गांधी ने क्या कहा?
पश्चिम बंगाल और असम के नतीजे लोकतंत्र के खिलाफ रची गई और सफल हुई एक साजिश है। दिसंबर २०२५ के संसद के शीतकालीन सत्र में राहुल गांधी ने इसी साजिश का पर्दाफाश किया था। उस सत्र में राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और `SIR’ प्रक्रिया पर कुछ गंभीर सवाल खड़े किए थे। चुनाव आयोग और सत्ताधारी दल की मिलीभगत से मतदाता सूची में घोटाले और वोट की चोरी हो रही है। चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया तथा चयन समिति से भाजपा द्वारा मुख्य न्यायाधीश को हटाने के मुद्दे को उठाया था। राहुल गांधी की मांग थी कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनाव में होने वाले घोटालों पर संसद में विस्तृत चर्चा हो। उस समय ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ने राहुल गांधी का साथ नहीं दिया। तृणमूल कांग्रेस का रुख संसद में कई बार कांग्रेस से अलग दिखा। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे और राहुल गांधी से इतर रास्ता अख्तियार कर अलग ही मसलों पर चर्चा और आंदोलन भड़काने में उन्हें आनंद आया। कांग्रेस की कई भूमिकाओं का उन्होंने विरोध किया। ममता बनर्जी की हठधर्मिता वाले स्वभाव के कारण `इंडिया’ ब्लॉक में एकजुटता नहीं दिखी। गांधी `SIR’ पर चर्चा की मांग कर रहे थे और भाजपा ने `वंदे मातरम’ के १५० वर्ष पूरे होने तथा अन्य ऐतिहासिक मुद्दों पर चर्चा शुरू कर दी। उसके ठीक पांच महीने बाद ममता बनर्जी उसी `SIR’ मुद्दे पर चुनाव हार गई हैं।
पांच राज्यों के नतीजों से यदि देश के विपक्ष का `दिमाग’ हिला होगा, कुछ फर्क पड़ा होगा तो उसे नेक-अक्ली आएगी। राज्य में महाविकास आघाड़ी और देश में `इंडिया ब्लॉक’ का महत्व नहीं बचा है, ऐसा जिन भाजपा के चमचों (विपक्षी दलों के भीतर) को लगता है, वे भारतीय लोकतंत्र और संविधान के साथ बेईमानी कर रहे हैं।
इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
देश को राष्ट्रगान देने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘Where the mind is without fear’ अर्थात `जहां मन निर्भय हो’, उसके अंत में टैगोर कहते हैं,
‘स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में,
हे मेरे पिता (परमात्मा),
मेरे देश को जागृति मिले!’
गुलामी के दौर में लिखी गई यह कविता आज भी उतनी ही मौजूं है। देश जागे!

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