सामना संवाददाता / मुंबई
भारत में महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध अब सिर्फ अंधेरी गलियों या बंद कमरों की समस्या नहीं रहे, बल्कि भीड़भाड़ वाली सड़कों, बसों, मेट्रो और तथाकथित ‘सुरक्षित’ सार्वजनिक जगहों पर भी खुलकर हो रहे हैं। फर्क बस इतना आया है कि अब मोबाइल कैमरे और सीसीटीवी इन घटनाओं को छिपने नहीं दे रहे। रिपोर्ट में राजस्थान की उस घटना का उल्लेख है, जहां बाइक टैक्सी पर जा रही महिला के साथ सार्वजनिक सड़क पर अभद्रता की गई और वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया।
जयपुर में गर्भवती महिला से छेड़छाड़ के आरोपी की गिरफ्तारी भी वीडियो और जन दबाव के बाद तेज हुई। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कार्रवाई अक्सर अपराध के वायरल होने के बाद ही तेज होती है। यानी पीड़िता की पीड़ा से अधिक व्यवस्था को वैâमरे की गवाही और सोशल मीडिया के शोर से फर्क पड़ता है। रिपोर्ट में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की स्वीकारोक्ति भी इसी खामी की ओर संकेत करती है कि जब वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी मिली, तब पूरी ताकत से गिरफ्तारी हुई और शिकायत को हल्के में लेने वाले पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई हुई। दिल्ली बस और मेट्रो की घटनाएं बताती हैं कि केवल निगरानी वैâमरे अपराध रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कैमरा अपराध का प्रमाण बन सकता है, पर अपराधी की मानसिकता नहीं बदल सकता। एनसीआरबी के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, २०२२ में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के ४,४५,२५६ मामले दर्ज हुए थे, जिनमें बड़ी श्रेणी पति या रिश्तेदारों की क्रूरता, अपहरण, शीलभंग और दुष्कर्म से जुड़ी थी। २०२४ के ताजा एनसीआरबी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों के ४,४१,५३४ मामले दर्ज हुए, जो २०२३ की तुलना में मामूली कमी दिखाते हैं, लेकिन संख्या अब भी भयावह है। यह समस्या कानून से अधिक सामाजिक संस्कार, पुलिस संवेदनशीलता और सार्वजनिक जवाबदेही की है। कैमरे ने समाज का चेहरा दिखा दिया है अब जरूरत है कि पुलिस शिकायत को वायरल होने से पहले गंभीरता से ले, सार्वजनिक परिवहन में त्वरित प्रतिक्रिया दल हों, स्कूलों से लैंगिक संवेदनशीलता की शिक्षा शुरू हो और भीड़ तमाशबीन नहीं, सहायक बने। वरना कैमरा अपराध रिकॉर्ड करता रहेगा और समाज हर बार शर्मिंदा होकर फिर चुप हो जाएगा।
