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नासिक म्हाडा घोटाले का कंप्लेनर ही निकला ‘किंगपिन’’ …. सरकारी दफ्तर से चलता था …नकली नक्शों का कारखाना!

नासिक से मंत्रालय तक हड़कंप
सुनील ओसवाल / नासिक
नासिक के बहुचर्चित म्हाडा घोटाले में अब ऐसा विस्फोटक खुलासा हुआ है, जिसने पूरे सरकारी तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। भूमि अभिलेख विभाग का उप अधीक्षक, जिसने खुद १९४ विकासकों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, वही अब जांच में पूरे घोटाले का कथित ‘मास्टरमाइंड’ बनकर सामने आया है। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि सरकारी कार्यालय के भीतर ही फर्जी नक्शे, नकली शिक्के और दस्तावेज तैयार किए जा रहे थे और उसी आधार पर करोड़ों की जमीनों का खेल खेला गया। क्राइम ब्रांच ने उसके साथ महापालिका नगररचना विभाग के सहायक संचालक को भी गिरफ्तार कर लिया है। दोनों को अदालत ने ११ मई तक पुलिस हिरासत में भेजा है। सूत्रों के मुताबिक, जांच अब केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि कई विभागों के अफसरों की गर्दन तक पहुंच सकती है।
‘फर्जीवाड़ा सेंटर’
पुलिस जांच में सामने आया है कि उप अधीक्षक ने अपने पद और विभागीय जानकारी का इस्तेमाल कर भूमि अभिलेख कार्यालय को ही फर्जीवाड़े का अड्डा बना दिया था। आरोप है कि उसने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर नकली मोजणी नक्शे तैयार किए, फर्जी शिक्के बनवाए और उन पर हस्ताक्षर कर बनावट ‘फॉर्म ४’ और ‘फॉर्म १२’ तैयार किए। सबसे गंभीर बात यह है कि इन फर्जी दस्तावेजों को सरकारी रिकॉर्ड में रखकर आधिकारिक नकलें जारी की गईं और चुनिंदा विकासकों को लाभ पहुंचाया गया। पुलिस को संदेह है कि यह पूरा नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था और करोड़ों रुपये की सरकारी जमीनों को नियमों से बाहर निकालने का काम कर रहा था।
जांच के दौरान ही बिल्डरों को राहत!
जांच एजेंसियों के मुताबिक, जब पूरे मामले की जांच जारी थी, उसी समय उप अधीक्षक ने सात विकासकों को ‘एनओसी’ जारी कर दिया। पुलिस इसे घोटाले में शामिल लोगों को बचाने और आर्थिक लाभ पहुंचाने की कोशिश मान रही है। सूत्रों का कहना है कि कई फाइलों में जानबूझकर तकनीकी खामियों को नजरअंदाज किया गया और सरकारी नियमों को दरकिनार कर मंजूरियां दी गईं।
नगररचना विभाग पर भी उठे सवाल
महानगरपालिका नगररचना विभाग के सहायक संचालक कल्पेश पाटील पर आरोप है कि उन्होंने आठ मामलों में पुराने, संदिग्ध और छेड़छाड़ किए गए नक्शों को बिना जांच मंजूरी दी। जांच में यह भी सामने आया है कि नियमों के अनुसार, पुनर्जांच जरूरी होने के बावजूद उसे टाल दिया गया। अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने बड़े स्तर पर फर्जी दस्तावेजों को मंजूरी बिना अंदरूनी मिलीभगत के वैâसे मिलती रही?

पुलिस को पहले दिन से था शक
पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि शिकायतकर्ता खुद जांच के घेरे में आ गया। म्हाडा जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद भी उप अधीक्षक ने तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं कराई। मंत्रालय से सवाल उठने के बाद उसने जमीन मालिकों तथा विकासकों के नाम छिपाए। बाद में दबाव बढ़ने पर नाम जोड़ने का पत्र दिया गया। पुलिस को तभी से संदेह था कि कहीं पूरा खेल अंदर से ही संचालित तो नहीं हो रहा।
जांच के घेरे में अभियंता
सूत्रों के अनुसार, महानगरपालिका के नगररचना, मिलकत और भूसंपादन विभागों में कुछ अधिकारी और उप अभियंता वर्षों से एक ही जगह जमे हुए हैं। औपचारिक बदली दिखाकर उन्हें फिर उसी विभाग में वापस लाया जाता रहा। अब ऐसे अधिकारियों की भूमिका की भी जांच शुरू हो गई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या यह पूरा नेटवर्क केवल नासिक तक सीमित था या इसके तार मंत्रालय स्तर तक जुड़े हुए हैं।

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