– संजय राऊत
इंट्रो
तुकाराम मुंढे ने ‘एफडीए’ कमिश्नर के रूप में जो कार्रवाई शुरू की है, वह धमाकेदार है। जनता अब तक जहर पी रही थी, यह उनकी छापेमारियों से साफ जाहिर होता है। मुंढे को अपनी कार्यकुशलता दिखाने का मौका अन्य क्षेत्रों में भी मिलना चाहिए। मुंढे के इस बेबाक काम ने यकीनन मुझे टी. एन. शेषन की याद ताजा कर दी है!
तुकाराम मुंढे ने जनता को साफ और मिलावट-मुक्त खाना-पानी देने का बीड़ा उठाया है। होटलों, पेट्रोल पंपों, मेस और मिठाई की दुकानों पर मारी गई उनकी छापेमार कार्रवाई सभी का ध्यान खींच रही है। मुंढे का बुलडोजर तेजी से चल रहा है। महाराष्ट्र में हम सब अशुद्ध पानी और मिलावटी खाना पचाकर अब तक जैसे-तैसे जिंदा हैं, इसके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहिए। मुंढे की छापेमारी जारी ही थी कि देश के गृह मंत्री अमित शाह की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। शाह को खाने से फूड पॉइजनिंग होने का निदान हुआ और उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई। शाह को किस खाने से फूड पॉइजनिंग हुआ? उन्होंने वह खाना कहां खाया? इस पूरी तफ्तीश की जिम्मेदारी मुंढे पर सौंपी जानी चाहिए।
मुंढे ने हाई कोर्ट की कैंटीन पर छापा मारा। मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन की ‘पांच सितारा’ मेस में चूहे घूमते पाए जाने पर वहां कार्रवाई कर उसे बंद करा दिया। एमसीए मुंढे के खिलाफ हाई कोर्ट गई, जहां कोर्ट ने मुंढे को डांट लगाई।
मुंढे किसी को नहीं बख्शते। पूरा जग, समाज, निजाम और प्रशासन भ्रष्ट है; उसकी सफाई करने की जिम्मेदारी मानो ईश्वर ने उन्हीं को सौंपी है, ऐसा वे मानते हैं। फडणवीस के हिंदुत्ववादी मंत्री नितेश राणे ने कहा कि मुंढे केवल हिंदुओं की दुकानों पर ही छापे मारते हैं, मुस्लिम मोहल्लों में कार्रवाई करके दिखाएं। मुंढे ने तुरंत ‘सुलेमान मिठाईवाले’ पर छापा मारकर उसकी मिठाई बिक्री का लाइसेंस ही रद्द कर दिया। मुंढे रुकते नहीं हैं, वे लगातार छापे मारते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उपनगर के एक पांच सितारा होटल में एक मशहूर डॉक्टर अपने दोस्तों के साथ खाना खाने गए। खाने का ऑर्डर दिया, तब तक प्लेटें रखी गईं। प्लेट के पास कॉकरोच का एक बच्चा रेंगता हुआ डॉक्टर को दिखा। डॉक्टर को तुरंत ‘मुंढे’ याद आ गए। उन्होंने उस कॉकरोच की तस्वीर खींचकर सोशल मीडिया पर डाल दी। देखते ही देखते मुंढे की टीम होटल में हलचल मचाने पहुंच गई। एफडीए ने इस वक्त महाराष्ट्र में एक खास दहशत पैदा कर रखी है। मुंढे की तस्वीरें छप रही हैं, टीवी चैनलों पर साक्षात्कारों के सिलसिले जारी हैं। महाराष्ट्र में सूखे से झुलसता किसान मदद की गुहार लगा रहा है, ठीक उसी तरह मुंढे द्वारा बंद कराए गए होटलों और दुकानों का बेरोजगार स्टाफ भी सरकार से राहत की गुहार लगा रहा है!
मिलावट का खेल
महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के अनेक खाद्य पदार्थों में मिलावट का खेल जारी है। सबसे ज्यादा मिलावट दूध और उससे बनी चीजों में होती है। दूध मलाईदार और सफेद दिखे, इसलिए उसमें ‘यूरिया’ मिलाया जाता है। पनीर और मावे से बनी मिठाइयां तो मानो ‘जहर’ ही साबित हो रही हैं। मिठाई पर लगा चांदी का ‘वरक’ सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। यह सब बंद कराकर मुंढे ने जनता पर बड़ा अहसान किया है। चुनाव आयोग में टी. एन. शेषन ने जिस तरह आचार संहिता का सख्ती से पालन शुरू कराया था, उसी तर्ज पर मुंढे ने एफडीए के नियमों पर अमल कराना शुरू किया है। मुंढे अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर रहे, वे केवल कायदे-कानून का पालन करवा रहे हैं; लेकिन सवाल यह है कि क्या शेषन ने आचार संहिता के नाम पर जो अतिरेक किया था, वही ‘शेषनगीरी’ मुंढे भी कर रहे हैं? सबकुछ ठप कराकर मुंढे आखिर क्या हासिल करेंगे? मुंढे के महकमे के मंत्री नरहर झिरवल हैं। इतने अहम, संवेदनशील और जनहित के महकमे की कमान झिरवल जैसे मंत्री को सौंपना अक्ल शून्यता के लक्षण हैं। अन्न एवं औषधि प्रशासन विभाग का मतलब मंत्रियों के लिए कमाई का सबसे बड़ा चरागाह होता है; ऐसे मंत्रियों की हालत मुंढे ने पतली कर दी है। छापे मारकर ‘सेटिंग’ करना, गुटखा और तंबाकू के दूसरे राज्यों से आए ट्रकों से वसूली करना और जहर से लोगों को मारना, यह सब मुंढे ने फिलहाल तो रोक दिया है। अलबत्ता, इससे राज्य की मिलावट और भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म हो गया, ऐसा नहीं है; लेकिन मिलावट खोरों के दिलों में खौफ जरूर पैदा हो गया है। जब कोई विभाग अनियमितताओं के खिलाफ कड़े कदम उठाता है, तो वहां भ्रष्टाचार की ‘रेट’ बढ़ जाती है, ऐसा माना जाता है। कोई नया पुलिस अफसर आता है, तो अपने इलाके में शराब, मटका और जुए के अड्डों पर छापे मारकर उन्हें बंद करा देता है; लेकिन ये अड्डे हमेशा के लिए कभी खत्म नहीं होते। मुंढे के मामले में ऐसा कहना नाइंसाफी होगी, लेकिन उनकी छापा टीमों द्वारा मचाए गए खौफ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुंढे ने दवाओं और सलाइन की कालाबाजारी पर नकेल कसी है, बड़े गिरोह फिलहाल ठंडे पड़ गए हैं, यह सच है; लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को मुंढे को केवल एक ही महकमे तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उनकी मुस्तैदी का फायदा दूसरे क्षेत्रों को भी मिलना चाहिए।
दायरा बढ़ाएं
तुकाराम मुंढे के भीतर का ‘शेषन’ जब तक जागा हुआ है, तब तक फडणवीस को उनकी काबिलियत का सही इस्तेमाल कर लेना चाहिए। महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और बदइंतजामी फैली हुई है, आर्थिक अनुशासन बिगड़ चुका है। राज्य में जगह-जगह निरंकुश जमींदारों का राज चल रहा है। इस सब पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री फडणवीस को एक स्पेशल ‘टास्क फोर्स’ का गठन करना चाहिए और उसकी कमान तुकाराम मुंढे को सौंपनी चाहिए। मुंढे के भीतर की ईमानदारी की आग को इसी तरह बाहर आने दें। फडणवीस को तुकाराम मुंढे जैसे पांच अफसर प्रशासन से चुनने चाहिए (लेकिन क्या ऐसे पांच मोती मिल पाएंगे?)। नगर विकास, राजस्व, शक्तिपीठ मार्ग, स्कूली पोषण आहार, आदिवासी विकास मंत्रालय और सहकारिता में हो रहे घोटालों व लूट-खसोट पर नकेल कसने के लिए यदि ‘मुंढे टास्क फोर्स’ बन जाए, तो महाराष्ट्र की छवि सुधर जाएगी। मुंढे मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के कार्यालय के भ्रष्ट तंत्र पर ही छापे मार देंगे। उसके बाद भाजपा के लोग, जो आज मुंढे के काम की सराहना कर रहे हैं, वही स्यापा करने लगेंगे, ‘मुंढे देशद्रोही हैं। फडणवीस को बदनाम करने के लिए मुंढे विपक्षियों से सुपारी लेकर काम कर रहे हैं।’
मुंढे नाम का शेषन जब तक दूसरों पर शिकंजा कसता है, तब तक सबको प्यारा लगता है।
आज मुंढे होटलवालों, वड़ा-पाववालों, मिठाईवालों और पनीरवालों के पीछे पड़े हैं, तब तक सब ठीक है। आचार संहिता का पालन तो केवल गरीबों को ही करना होता है!
