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देश एनर्जी इमरजेंसी में, मोदी सरकार चुनाव आयोग को बचाने में व्यस्त! … कोयला खत्म होने के कगार पर, होर्मुज बंद और तेल १०४ डॉलर, लेकिन सत्ता को चिंता ज्ञानेश कुमार की!

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक साथ तीन खतरे बज रहे हैं। करीब ४० प्रतिशत कोयला आधारित बिजलीघरों में ईंधन का भंडार ‘क्रिटिकल’ स्तर पर पहुंच गया है। बिजली की मांग बढ़ रही है, घरेलू कोयले की आपूर्ति दबाव में है और सरकार अब बिजलीघरों में महंगा आयातित कोयला मिलाने पर विचार कर रही है। यानी कोयला देश का, बिजलीघर देश के और संकट आया तो बिल जनता की जेब से! सरकारी आंकड़ों पर आधारित रॉयटर्स की रिपोर्ट बिजली संकट की साफ चेतावनी दे रही है।
उधर भारत की तेल-नस बने होर्मुज जलडमरूमध्य पर लगा ताला पूरी तरह खुलने का नाम नहीं ले रहा। ईरान ने अमेरिकी सैन्य दबाव और बंदरगाहों की नाकेबंदी में राहत मिलने पर सात दिनों के भीतर होर्मुज खोलने तथा क्षेत्रीय संघर्ष रोकने का प्रस्ताव दिया है। प्रस्ताव १६ सितंबर को मध्यस्थों के जरिए अमेरिका तक पहुंचा, लेकिन वॉशिंगटन से अब तक वह जवाब नहीं आया, जिसका दुनिया इंतजार कर रही है। मोदी सरकार ट्रंप के सामने झुक चुकी है।
महंगा तेल खतरे की घंटी
कूटनीति की उम्मीद से कच्चा तेल करीब दो प्रतिशत नीचे जरूर आया, मगर ब्रेंट लगभग १०४ डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहना भारत के लिए राहत नहीं, खतरे की घंटी है। महंगा तेल यानी बढ़ता आयात बिल, रुपये पर दबाव, महंगा पेट्रोल-डीजल, ऊंचा मालभाड़ा और अंततः रसोई तक पहुंचती महंगाई।
कहां खर्च हो रही है राजनीतिक ऊर्जा?
केंद्र की राजनीतिक ऊर्जा कहां खर्च हो रही है? चुनाव आयोग में सामने आईं १४ लिखित आपत्तियों के बाद सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बचाव की दीवार मजबूत करने में जुटे दिखाई दे रहे हैं। आयोग को स्पष्टीकरण पर स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है, जबकि बिजलीघरों के कोयले और देश की तेल आपूर्ति पर वैसी बेचैनी दिखाई नहीं देती।

केंद्र की राजनीतिक ऊर्जा कहां खर्च हो रही है? चुनाव आयोग में सामने आईं १४ लिखित आपत्तियों के बाद सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बचाव की दीवार मजबूत करने में जुटे दिखाई दे रहे हैं। आयोग को स्पष्टीकरण पर स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है, जबकि बिजलीघरों के कोयले और देश की तेल आपूर्ति पर वैसी बेचैनी दिखाई नहीं देती।

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