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आरपीएफ जवानों की बढ़ी मुश्किलें…तबादला नीति बनी हजारों परिवारों की मुसीबत!.. बच्चों की पढ़ाई पर मंडराया संकट

सामना संवाददाता / मुंबई

रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में पारदर्शिता के नाम पर लागू की गई ट्रांसफर मैनेजमेंट मॉड्यूल (टीएमएम) व्यवस्था अब खुद सवालों के घेरे में आ गई है। फरवरी-मार्च २०२६ में पूरे होने वाले वार्षिक टेन्योर तबादले जून माह तक भी लटके रहने से हजारों जवान और उनके परिवार गंभीर मानसिक, आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना कर रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवारों की स्थिरता तक पर खतरा मंडराने लगा है।
आरपीएफ कर्मियों का आरोप है कि टीएमएम प्रणाली को जमीनी हकीकत और आरपीएफ की विशेष जरूरतों को समझे बिना लागू किया गया। रेलवे स्टेशनों, ट्रेनों और रेल संपत्तियों की सुरक्षा जैसे संवेदनशील कार्यों में स्थानीय परिस्थितियों की अहम भूमिका होती है, लेकिन नई डिजिटल व्यवस्था इन व्यावहारिक पहलुओं को नजरअंदाज करती दिखाई दे रही है।
तबादलों में हो रही देरी का सबसे बड़ा असर जवानों के परिवारों पर पड़ा है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद अधिकांश कर्मचारियों ने अपने बच्चों का स्कूलों में प्रवेश करा दिया है। फीस, किताबों और यूनिफॉर्म पर हजारों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। अब यदि अचानक तबादला आदेश जारी होते हैं तो परिवारों को नए शहरों में फिर से स्कूल तलाशने पड़ेंगे। कई विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया बंद हो चुकी है, जबकि निजी स्कूलों की भारी फीस अलग परेशानी बन गई है।
इस अव्यवस्था ने कर्मचारियों पर दोहरी आर्थिक मार भी डाल दी है। पुरानी फीस डूबने की आशंका के साथ नए स्थान पर दोबारा प्रवेश और अन्य शैक्षणिक खर्चों का बोझ बढ़ने वाला है। दूसरी ओर रेलवे पर भी स्थानांतरण और यात्रा भत्तों का अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ सकता है।
आरपीएफ कर्मियों का कहना है कि किसी भी सुरक्षा बल की ताकत उसके जवानों के मनोबल और पारिवारिक स्थिरता में निहित होती है। ऐसे में लंबित तबादलों ने हजारों परिवारों को असमंजस और अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया है। कर्मचारियों ने रेलवे बोर्ड और आरपीएफ महानिदेशालय से मांग की है कि लंबित तबादलों पर तत्काल मानवीय और व्यावहारिक निर्णय लिया जाए, ताकि परेशान परिवारों को राहत मिल सके।

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