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सहारनपुर की सियासत : विरासत से महत्वाकांक्षा तक, और घर की लड़ाई में बिखरता एक राजनीतिक खानदान

 सामना संवाददाता / लखनऊ

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझना हो तो सहारनपुर को पढ़ना पड़ता है। यह जिला केवल चुनावी नक्शे पर बनी कुछ विधानसभा सीटों का नाम नहीं रहा, बल्कि यहां राजनीति का मतलब कभी जनता के बीच प्रतिष्ठा, रिश्तों की पूंजी और विरोधियों को साथ लेकर चलने की क्षमता हुआ करता था। आज भी सहारनपुर पश्चिमी यूपी की सियासत का एक बड़ा केंद्र है। फर्क बस इतना है कि कल यहां राजनीति जनता-जनार्दन की लड़ाई समझकर की जाती थी, आज कई घरानों में वह अपनी-अपनी लड़ाई बनती दिखाई दे रही है। इस जिले में कभी दो बड़ी राजनीतिक धुरियां थीं। एक धुरी कांग्रेस के चौधरी यशपाल सिंह के आसपास घूमती थी। दूसरी धुरी काजी रशीद मसूद के परिवार के इर्द-गिर्द थी उसूलों की सियासत करते थे घटियापन नही था। चौधरी यशपाल सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके पुत्रों ने कम से कम इतना किया है कि पिता की राजनीतिक विरासत को आपसी संघर्ष का अखाड़ा नहीं बनने दिया। चुनावी सफलता अभी भले उनके कदम न चूम रही हो, लेकिन विरासत को जिंदा रखने की कोशिश जारी है। दूसरी तरफ काजी रशीद मसूद का परिवार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय ऐसा था, जब यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। काजी रशीद मसूद के राजनीतिक छाते के नीचे अलग-अलग विचारों और स्वभाव के लोग मौजूद थे। रिश्ते थे, संगठन था, प्रभाव था और सबसे बड़ी बात एक राजनीतिक व्यवस्था थी। मगर राजनीति में महत्वाकांक्षा जब मर्यादा से बड़ी हो जाए तो वह विरासत नहीं संभालती, घर से ही उसकी दीवारें खोदना शुरू कर देती है। यहीं से मसूद परिवार की कहानी बदलती दिखाई देती है। आरोप और राजनीतिक चर्चाएं यह रही हैं कि परिवार के भीतर बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और समानांतर राजनीतिक केंद्र खड़े करने की कोशिशों ने उस सामूहिक नेतृत्व को कमजोर किया, जिसकी बदौलत यह परिवार दशकों तक सहारनपुर की राजनीति में प्रभावशाली बना रहा। पहले एक-एक कर पुराने राजनीतिक साथी दूर हुए, फिर रिश्तों की जगह समीकरणों ने ली और समीकरणों की जगह निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने। राजनीति में आदमी विरोधी से नहीं टूटता, अक्सर वह अपने ही लोगों को छोटा समझने की आदत से टूटता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इमरान मसूद की जीत को केवल किसी एक व्यक्ति की निजी राजनीतिक विजय के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। उस चुनाव में सांप्रदायिकता, ध्रुवीकरण और नफ़रती राजनीति के खिलाफ बने माहौल ने विपक्षी राजनीति को भी ऊर्जा दी। राजनीतिक जानकारों का एक वर्ग मानता है कि यदि चुनाव का केंद्रीय विमर्श अलग होता तो परिणाम का गणित भी अलग हो सकता था। यह जीत उस व्यापक राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा थी जिसमें केवल एक उम्मीदवार नहीं, बल्कि एक विचारधारा भी मैदान में थी। लेकिन जीत आदमी को बदल दे, ऐसा जरूरी नहीं। कई बार जीत आदमी को यह भ्रम दे देती है कि अब वही इतिहास है। सहारनपुर में इमरान मसूद की राजनीति पर एक पुरानी टिप्पणी अक्सर सुनाई देती रही है वह विरोधियों का “इलाज” करने की बात करते हैं, लेकिन कई बार राजनीतिक विरोधी एकजुट होकर उसी राजनीति का “इलाज” कर देते हैं। 2024 से पहले के चुनावी परिणामों और लगातार पराजयों ने यह साफ किया कि केवल आक्रामक भाषा, निजी प्रभाव और महत्वाकांक्षा से राजनीति की लंबी पारी नहीं खेली जाती। राजनीति में कोई किसी को हमेशा कमतर नहीं समझ सकता। जिस दिन वे सारे “कमतर” लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं, बड़े-बड़े राजनीतिक किले दरक जाते हैं। अब स्थिति यह है कि परिवार के भीतर का संघर्ष खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया पर पारिवारिक विवादों को जिस तरह सार्वजनिक किया जा रहा है, उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एक पक्ष द्वारा भावनात्मक दबाव बनाने के आरोप हों या दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया सार्वजनिक जीवन में पारिवारिक रिश्तों को इस स्तर तक ले जाना किसी भी राजनीतिक परिवार की प्रतिष्ठा को मजबूत नहीं करता। यहां बात केवल राजनीति की नहीं, संस्कार की भी है। रिश्ते तब नहीं परखे जाते जब सब अच्छा हो। रिश्तों की असली परीक्षा तब होती है जब सामने वाले में सौ कमियां दिखाई देने लगें। अच्छाई के साथ रहना आसान है, लेकिन बुराई, मतभेद और संकट के बीच रिश्ते की मर्यादा बचाए रखना कठिन है। किसी बच्ची या परिवार के निजी सम्मान को विवाद का हथियार बनाना सामाजिक रूप से भी गलत माना जाएगा। राजनीति के लिए घर की इज्जत नीलाम करना कोई बहादुरी नहीं है।दादा की राजनीतिक विरासत केवल सांसद बनने से नहीं बचती। वह विरासत रिश्तों को बचाने से बचती है। मसूद परिवार की राजनीतिक यात्रा भी अपने आप में सहारनपुर की राजनीति का इतिहास है। भारतीय लोकदल से जनता पार्टी, जनता दल से राष्ट्रीय लोकदल, समाजवादी पार्टी से कांग्रेस और बीच में अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के प्रयोग दल बदलते रहे, चुनावी परिणाम बदलते रहे, लेकिन परिवार की राजनीतिक अहमियत लंबे समय तक बनी रही काज़ी रशीद मसूद रहमतुल्ला अलैह के परिवार का सियासी डीएनए कांग्रेस के विरोध की सियासत रही है जब सभी पार्टियों के दरवाज़े बंद हो गए थे सपा में नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो गया था तब कांग्रेस की तरफ काज़ी परिवार ने मजबूरी में रुख किया था 2012 में लेकिन इनका सियासत में स्थाई रूप से कोई घर नही रहा है अपने अनुरुप माहौल नही रहने पर छोड़कर दूसरे दल में अपनी संभावनाए तलाशने लगते है और छोड़ देते है उसका उस दल को बहुत नुकसान होता जिसको छोड़कर जाते है क्योंकि सबकुछ इनका ही होता है उस दल के कैडर के लोगों को बर्फ में लगा देते है मतलब उस दल को ठेके पर ले लेते है सब कुछ यही है जैसे अब कांग्रेस है उसके कैडर के लोग है ही नही सब घर बिठा दिए गए।कहा जाता है कि इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत काज़ी मसूद से हुई। आगे की पीढ़ियों में काज़ी राशिद मसूद और काज़ी रशीद मसूद ने इस विरासत को अलग-अलग स्तरों पर इमानदारी से आगे बढ़ाया। फिर नई पीढ़ी आई महत्त्वाकांक्षी इमरान मसूद, सरल सौभाव के चाणक्य नोमान मसूद, अगली सियासी विरासत के दावेदार हमजा मसूद, दुनिया से बेफिक्र काज़ी शादान मसूद और दादा के साथ आखिरी वक्त में जो हुआ उसका गम लिए काज़ी शायान मसूद जैसे नाम सामने आए। रिश्ते भी आपस में इतने जुड़े हुए हैं कि परिवार का झगड़ा केवल घरेलू नहीं रह जाता, वह सीधे राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है। आज इसी खानदान की दो शाखाओं में संघर्ष है। एक तरफ चाचा-भतीजे और भाई-भाई के राजनीतिक समीकरण हैं, दूसरी तरफ रिश्तों की ऐसी गांठें हैं जिन्हें सत्ता की कुर्सी भी शायद आसानी से नहीं खोल सकती। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस लड़ाई का लाभ किसे मिलेगा? जिन राजनीतिक विरोधियों को कभी चुनौती देकर “इलाज” करने की बात कही जाती थी, वे शायद आज दूर बैठकर तमाशा देख रहे हों। क्योंकि राजनीति का सबसे आसान नियम है जब दुश्मन को हराना मुश्किल हो, तो उसे अपने ही अहंकार से लड़ने दो। सहारनपुर की राजनीति में यही हो रहा है। एक तरफ परिवार अपने भीतर उलझा है, दूसरी तरफ दूसरे राजनीतिक लोग जनता के बीच काम करने की कोशिश कर रहे हैं। जनता खाली जगह को हमेशा भर देती है। राजनीति में कोई स्थान स्थायी रूप से किसी खानदान के नाम दर्ज नहीं होता। मसूद परिवार की असली चुनौती अब चुनाव जीतना भर नहीं है। असली चुनौती है क्या यह परिवार अपनी राजनीतिक विरासत से बड़ा अपना अहंकार मान चुका है? अगर जवाब हां है, तो फिर सहारनपुर की राजनीति में एक लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले खानदान का पतन किसी विरोधी की साजिश से नहीं होगा। वह पतन घर के भीतर पैदा हुई महत्वाकांक्षाओं से होगा। और राजनीति का इतिहास गवाह है जिस घर में हर आदमी बादशाह बनने लगे, वहां आखिर में ताज नहीं बचता, सिर्फ टूटे हुए सिंहासन बचते हैं। सत्यमेव जयते

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