मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका: पुस्तकें बनाम मोबाइल: बदलती पाठकीय संस्कृति का मौन विलाप

साहित्य शलाका: पुस्तकें बनाम मोबाइल: बदलती पाठकीय संस्कृति का मौन विलाप

प्रो. दयानंद तिवारी

सभ्यताओं का इतिहास यदि किसी ने अपने पृष्ठों में सबसे अधिक सहेजा है, तो वह पुस्तक है। पुस्तक केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि समय की धड़कनों का अभिलेख, मनुष्य की चेतना का आलोक और युगों की तपस्या का प्रसाद है। वह मौन रहकर भी संवाद करती है, स्थिर रहकर भी पीढ़ियों को गति देती है। किंतु आज उसी पुस्तक के सम्मुख एक चमकती हुई स्क्रीन खड़ी है, जिसने मनुष्य की दृष्टि तो बांध ली है, परंतु उसका मन कहीं बिखेर दिया है।
कभी संध्या का समय पुस्तक के पन्नों की सरसराहट से जीवित होता था। किसी घर में प्रेमचंद की कहानियां पढ़ी जाती थीं, कहीं महादेवी वर्मा की करुणा आंखों को नम कर देती थी, तो कहीं दिनकर की पंक्तियां युवाओं की नसों में राष्ट्रप्रेम का रक्त प्रवाहित करती थीं। आज वही संध्या मोबाइल की झिलमिलाती रोशनी में बीत जाती है, जहां शब्द कम और शोर अधिक है; सूचना अधिक है, किंतु अनुभूति का स्पर्श क्षीण होता जा रहा है।
मोबाइल आधुनिक युग की उपलब्धि है; उससे विरोध नहीं, बल्कि उसके अंधाधुंध प्रभुत्व से चिंता है। ज्ञान का अथाह सागर भी उसी में है, किंतु मनोरंजन की अनवरत लहरें मनुष्य को तट तक पहुंचने ही नहीं देतीं। हम पढ़ते कम हैं, देखते अधिक हैं; समझते कम हैं, प्रतिक्रिया अधिक देते हैं। यही परिवर्तन पाठकीय संस्कृति की सबसे बड़ी चुनौती है।
पुस्तक मनुष्य को भीतर की यात्रा पर ले जाती है। वह पाठक से धैर्य मांगती है, एकांत मांगती है, आत्मसंवाद मांगती है। उसके प्रत्येक पृष्ठ पर ठहरने का आनंद है, प्रत्येक अध्याय में जीवन का कोई नया अर्थ छिपा है। इसके विपरीत, मोबाइल की संस्कृति क्षणभंगुर है। वहां सब कुछ तीव्र गति से बदलता है-चित्र, विचार, भाव और ध्यान भी। परिणामस्वरूप मनुष्य के भीतर ठहराव का सौंदर्य धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है।
यह चिंता केवल साहित्य की नहीं, संवेदना की भी है। जब मनुष्य पुस्तकें पढ़ता है, तब वह केवल कथा नहीं पढ़ता, वह चरित्रों के साथ जीता है, उनके दुख में भीगता है, उनकी विजय में मुस्कुराता है। यही प्रक्रिया उसके भीतर करुणा, सहिष्णुता और विवेक का निर्माण करती है। परंतु जब जीवन केवल स्क्रीन पर फिसलती उंगलियों तक सिमट जाता है, तब अनुभूति की गहराई भी उथली होने लगती है।
हिंदी साहित्य की परंपरा हमें बताती है कि शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, साधना हैं। कबीर की वाणी ने समाज को झकझोरा, तुलसी ने लोकजीवन को मर्यादा का दीप दिया, निराला ने स्वाधीन चेतना का स्वर जगाया और अज्ञेय ने आत्मान्वेषण का पथ प्रशस्त किया।
इन सबकी शक्ति पुस्तक के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित हुई। यदि नई पीढ़ी इन स्रोतों से दूर होती गई, तो भाषा केवल संप्रेषण का साधन रह जाएगी, संस्कार का माध्यम नहीं।
फिर भी आशा का दीप बुझा नहीं है। आवश्यकता पुस्तक और मोबाइल के बीच युद्ध छेड़ने की नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करने की है। यदि मोबाइल पर श्रेष्ठ साहित्य पढ़ा जाए, ई-पुस्तकों का अध्ययन किया जाए और डिजिटल माध्यम को ज्ञान का सेतु बनाया जाए, तो तकनीक भी संस्कृति की सहयात्री बन सकती है। किंतु यह तभी संभव है जब मनुष्य उपकरण का स्वामी रहे, उपकरण से जुड़कर उसका दास न बने।
परिवारों को पुन: पुस्तक-संस्कृति का वातावरण रचना होगा। विद्यालयों को पुस्तकालयों की ओर लौटना होगा। साहित्यिक गोष्ठियां, वाचन-परंपरा और पुस्तक-चर्चाएं केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अभियान बनने चाहिए। क्योंकि जिस समाज के हाथों से पुस्तक छूट जाती है, उसके विचार भी धीरे-धीरे उधार के हो जाते हैं।
समय हमें पुकार रहा है कि हम सुविधा और संस्कृति के बीच संतुलन साधें। मोबाइल हमारे युग की आवश्यकता है, किंतु पुस्तक हमारी आत्मा की आवश्यकता है। स्क्रीन आंखों को आकर्षित कर सकती है, पर पुस्तक हृदय को प्रकाशित करती है। और अंतत: वही समाज दीर्घजीवी होता है, जो अपने बच्चों को केवल तकनीक नहीं, पुस्तक का स्पर्श भी विरासत में देता है।
अंत में कहूं तो यही कि –
पुस्तकों की खुशबू में सभ्यता का भविष्य बसता है,
स्क्रीन की चमक में क्षण भर का आकर्षण हंसता है।
जो शब्दों का सम्मान करते हैं, वही समय का मान रखते हैं
क्योंकि मनुष्य तकनीक से नहीं, अपने विचारों से महान बनता है।
अस्तु

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