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संजय श्रीवास्तव : आधुनिक फाइटर जेट की कमी!.. एसयू-५७ई को लेकर सरकार असमंजस में

संजय उवाच

पिछड़ रही है

रूसी लड़ाकू विमान एसयू ५७ई स्टील्थ फाइटर जेट के सौदे की चर्चा अचानक तेज हो गई है। खबरों के जरिए ऐसी भावभूमि निर्मित की जा रही है कि भारतीय सेना और सरकार २०१९ के अपने अनुभवों को दरकिनार कर, राजनीति, कूटनीति के तमाम किंतु परंतु को परे रख रूसी प्रस्ताव को तकरीबन स्वीकार चुकी है। जल्द ही इस सौदे पर मुहर लगेगी। कुछ खबरों के जरिए जो वाकई तथ्यपरक हैं, इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि इस सौदे को शीघ्रातिशीघ्र हासिल कर लेना अत्यंत आवश्यक है।
विगत दिनों के रॉफेल विमानों की खरीदारी के बावजूद और उसके नौसेना वाले संस्करण के इतने ही विमानों की खेप के लिए मंजूरी के बाद भी वायुसेना को तकरीबन दर्जनभर स्क्वाड्रन की कमी रहेगी, अभी ३१ फाइटर और कॉम्बैट स्क्वाड्रन हैं, चाहिए ४२ या उससे अधिक। लड़ाकू विमानों की कमी से पुरानी पड़ती भारतीय वायु सेना को नए आधुनिक तकनीक वाले कई विमान चाहिए। स्क्वाड्रनों की संख्या पूरा करने का यही वक्त है। बीते दस बरसों में चीन ने अपनी सेना में ४३५ नए फाइटर और कॉम्बैट विमान शामिल किए तो पाकिस्तान ने ३१ नए विमान खरीदे, जबकि यहां तमाम मिग समेत १५० से अधिक लड़ाकू विमान कम हो गए। पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी विमानों की खेप जब २०३५ के बाद आयेगी, फिर उसकी तैनाती तक इतना समय बीत चुका होगा कि तब तक छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान आम हो चुके होंगे। सो पांचवीं पीढ़ी के इस रूसी विमान का समावेश तत्काल जरूरी है।
चीन के पास पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक विमान पहले से मौजूद हैं, जबकि हमारे पास हद से हद साढ़े चार पीढी वाले, हमें उसके मुकाबले में आना चाहिये, चीन अपनी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट पाकिस्तान को दे रहा है ऐसे में उसकी मजबूती बढ़ने का इंतजार करने से पहले हमें भी ऐसे उन्नत विमान खरीद ही लेने चाहिए।
वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल एपी सिंह का कहना है कि वायुसेना से जुड़ी परियोजनाओं में लगातार देरी होती है और चाहे स्वदेशी विमान हो, हथियार हो या विदेशी खरीद, उनकी देरी से उनकी क्षमता प्रभावित होती है। साफ है कि जल्द से जल्द हमें अपनी क्षमता को कम से कम आवश्यकतानुसार तो करनी ही होगी। ऐसे में पांचवीं पीढ़ी के उन्नत फाइटर जेट की खरीदी लाजिमी है, रूसी एसयू ५७ई कई नजरिए से अमेरिका के एफ ३५ के सौदे से बेहतर है।
अब जबकि हालात ये हैं कि प्रâांस से खरीदे गए लड़ाकू विमानों का सोर्स कोड जो किसी हथियार प्रणाली का मूल सॉफ्टवेयर या प्रोग्रामिंग कोड होता है और उसी के जरिए कोई उन्नत फाइटर जेट, हथियार प्रणाली, मिसाइल या रडार नियंत्रित तथा चालित होता है, भारत को देने से निर्माता कंपनी ने मना कर दिया, तो यह दबाव बन रहा है कि जवाब में बाकी २६ राफेल विमानों के सौदे को ही निरस्त कर दिया जाए, यदि ऐसा वास्तव में होता है तो लड़ाकू विमानों का सौदा और भी तेजी से निबटाना आवश्यक हो जाता है। वैसे भी सरकार ने २० अरब डॉलर खर्च कर ११४ मल्टीरोल फाइटर जेट खरीदने का जो लक्ष्य रखा है उसको चरणबद्ध तरीके से पूरा करने के लिये फिलहाल अमेरिका के एफ ३५ या रूस के एसयू-५७ई फाइटर जेट में से कोई एक या दोनों खरीदने होंगे या फिर इनके उचित विकल्प तलाशने होंगे क्योंकि स्वदेशी के आगत में विलंब है। सारी बातें इस ओर ले जाती हैं कि भारत को वर्तमान अमेरिकी रुख तथा भविष्य में आने वाली उसकी शर्तें, पाबंदियों एवं एफ ३५ बनाने वाली मार्टिन लॉकहीड कंपनी के कायदे-कानूनों की कठिनाइयों के मद्देनजर हमें एसयू-५७ई की ओर बढ़ना चाहिए।
सवालों के घेरे में
यह बढ़त अमेरिका को संदेश, संकेत देने, सबक सिखाने तथा दूसरे कूटनीतिक तौर पर भी बेहतर पैâसला होगा। निस्संदेह १०० प्रतिशत सोर्स कोड देने, भविष्य में एसयू ५७ई को अपने तरीके से बनाकर किसी और देश को बेचने का अधिकार देने वाला रूसी प्रस्ताव बहुत लुभाऊ है, पर सरकार और सेना ने इसके बावजूद इस सौदे को अभी तक अपनी हरी झंडी, कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, उसका असमंजस बना हुआ है तो उसकी गहरी और ठोस वजहें हैं। उसके सामने जो सवाल हैं उसके संतोषजनक उत्तर उसे चाहिए। राफेल सौदे पर भी उठे सवाल बमुश्किल दबे थे, वह इस बार फुलप्रूफ पैâसला ही लेगी। यह तय है कि प्रमुख बिंदुओं पर स्थिति साफ होने के बाद ही वह इस ओर बढ़ेगी, सरकार की यह समझदारी संभावित सौदे के प्रति सकारात्मक संकेत है।
भारत ने रूस के साथ मिलकर फाइटर जेट बनाने की योजना में २०१० से ही रुचि दिखाई। २०१८ में इस पर काम शुरू हुआ और २०१९ में वह डिजाइन में खामी, देरी, इसकी खासियतों का अपनी जरूरतों से मेल न खाने, अपने मानकों पर खरा नहीं उतरने जैसी जिन आपत्तियों के चलते भारत इससे बाहर आया, क्या आज वे कारण हमेशा के लिए दूर हो गए?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार हैं)

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