डाॅ. रवीन्द्र कुमार
मेरे भारत महान के एक सूबे के एक छोटे से गांव में एक परिवार पूरे मनोयोग से देश सेवा और देश के नौजवानों की मदद कर रहा है। वे चुपचाप पब्लिसिटी से दूर, एकाग्रचित्त हो पूरी निष्ठा से इस निर्माण कार्य में लगे हैं। उनकी स्पेशिलिटी है : बेचारे (स्टडी में) ग़रीब बच्चों को नाममात्र के मानदेय पर डिग्री उपलब्ध कराना। उन्हें किसी विज्ञापन की ज़रूरत नहीं। लोग बाग ‘बाई वर्ड ऑफ माउथ’ की वजह से खुद ब खुद खिंचे चले आते हैं। यही हाल अंग्रेज़ी शराब की दुकानों का होता है। पहले बहुत लंबा लिखना पड़ता था ‘ठेका देशी शराब’ अथवा ‘सरकारी ठेका’ ‘इंगलिश वाइन शॉप एंड ठंडी ‘चाइल्ड’ बीयर’। सो यह परिवार बरसों से इस समाज सेवा के काम में लगा है। अब तक उनके बनाए प्रमाण पत्रों/ डिग्रियों के बल पर अनगिनत बेरोजगार रोजगार पा चुके हैं वह भी सेना और रेलवे में।
उनका काम है ही इतनी ‘फिनिश’ वाला कि वे पूरा ठेका ( ए टू ज़ैड) उठा लेते हैं अर्थात आपको न केवल डिग्री उपलब्ध कराते हैं बल्कि उससे रिलेटिड कागजात भी देते है जैसे कॉल लेटर, डेट शीट, रौल न. एडमिट कार्ड, अंक तालिका। एक बार मुझे एक वकील साब से यह कह कर मिलवाया गया था कि वे एक बहुत सफल वकील हैं। तफसील से पूछने पर पता चला वो पूरे केस का ठेका उठा लेते हैं, मुझे कनफ्यूज़ देख उसने क्लियर किया जैसे पुलिस स्टेशन में एफ.आई.आर. में हेरफेर कराना, कुछ का कुछ लिखावना। चार्जशीट में लूपहोल रख कर, कमजोर करना। अपोजिट पार्टी के वकील को भी अपने पक्ष में ले दे कर अपनी तरफ कर लेना आदि आदि। इस तरह उनकी यह विशेषज्ञता केवल डिग्री के मामले में ही नहीं है बल्कि उनके पास एक पूरा मेन्यू कार्ड है। रेट सहित:
आइटम रेट
मैट्रिक 1000
इन्टर 1500
ग्रेजुएशन 1700
मास्टर्स 2500 पैरा-मेडिकल 1200
नर्सिंग 1000 बी. एड. 2500 डी.एल.एड. 2000
एम.बी.ए. 2500
यह सूची केवल उदाहरणस्वरुप है। यह एक्जहौस्टिव नहीं। आपकी फरमाईश पर आप जौन सी कहेंगे वह भी बन जाएगी। क्या बोलते हैं ‘कस्टमाइज्ड’ सर्विस। दूसरे इस सूची से एक बात स्पष्ट होती है कि इनके रेट एफोर्डेबल हैं। मुझे नहीं लगता इससे सस्ता कहीं और मिलता होगा वह भी इतना विश्वसनीय।
मैंने सुना था कि अब कार चोर ऐसे ही नहीं दाएं-बाएं कार उठाते फिरते। अब वो ‘मेड टू ऑर्डर’ उठाते हैं (चुराते हैं) हाथ के हाथ डिलिवरी। इसी तरह यह डिग्री फैक्ट्री सोचो कितनी कम दर पर कितना महत्वपूर्ण काम कर रही है। बीस साल से ज्यादा समय से इस निर्माण कार्य में रत है। उनका कहना है कि उनसे प्राप्त डिग्री पा लोग नौकरी करके हैपी हैपी रिटायर भी कर गए। एक अन्य सूबे में तो तीन महीने के आरम्भिक प्रशिक्षण के बाद उचित पेमेंट दे देने पर आपको एम. बी.बी.एस. की डिग्री भी डिलीवर कर दी जाती है। आप चाहें तो खुल कर अपने माता-पिता के क्लीनिक पर अथवा खुद का क्लीनिक खोल कर दिल खोल कर मरीजों को मार सकते हैं। हमारे देश की तो कहावतें भी इनके फ़ेवर में बनी हैं। बस इतना ही साथ लिखा था, इतनी ही उम्र लिखी थी। ईश्वर को यही मंजूर था। सब बिधि हाथ है आदि आदि।
तो अब आपको घबराने की जरूरत नहीं वो भी सिर्फ इसलिए कि आपकी परसन्टेज कम है और कट ऑफ बहुत हाई गई है। आपको पत्राचार में भी दाखिला नहीं मिल रहा। वान्दा नहीं। निर्बल के बल हम हैं ना। अब नकली बैंक, नकली थाना, नकली पोस्ट ऑफिस यहाँ तक कि नकली अदालत भी। अब आप ये सूची बनाइये क्या-क्या रह गया है ? ताकि उद्यमशील लोगबाग इस स्टार्ट अप को स्टार्ट कर सकें।
(डाॅ.रवीन्द्र कुमार रेलवे से रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी हैं। वह एक प्रतिष्ठित लेखक, कवि एवं व्यंग्यकार हैं)
