डाॅ. रवीन्द्र कुमार
एक ज़माना था कि उन सभी चीजों से बहुत विस्मय हुआ करता था और वो पोर्टेबल वस्तुएं हाथों-हाथ बिका करती थीं। जैसे टू-इन-वन, थ्री-इन-वन। ट्रांजिस्टर भी एक तरह का पोर्टेबल रेडियो ही था। पेज़र हुआ, मोबाइल हुआ सब एक तरह के पोर्टेबल उपकरण ही हैं। लोग-बाग कार में लाइटर, फ्रिज, टी वी., ए.सी. आम लगाने लगे। हद तो तब हो गयी जब सुना कि अब चलता-फिरता ओ-यो भी मार्किट में आ गया है। आगे न जाने क्या-क्या और पोर्टेबल देखने को मिलेगा। मैंने सुना है कि किसी-किसी देश में प्लेटफॉर्म नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। बल्कि पोर्टेबल प्लेटफॉर्म ट्रेन के साथ-साथ ही चलता है। जैसे विमान का लेंडिंग-गियर खुलता बंद होता है वैसे ही ये पोर्टेबल प्लेटफॉर्म खुल जाता है। बोले तो सीढ़ियां नीचे गिर जाती हैं और यात्री उतर जाते हैं तो सीढ़ियां वापिस फ़ोल्ड होकर कोच से लग जाती हैं।
इसी श्रंखला में अब आ गयी है पोर्टेबल सड़क। इस नवाचार (इनोवेशन) के लिए भारत की पावन पवित्र भूमि को चुना गया है। यह भी अपने आप में कोई कम गर्व करने की बात नहीं है। अभी तक हम सिर्फ डेमोक्रेसी की मम्मी थे। अब हम सड़कों के पापा भी हो जाएँगे। कैसा लगेगा जब लोग कहेंगे ‘पापा सड़क का’। दुनिया में हमारा नाम होगा। यह सड़क कुछ इस नवीनतम तकनीक से बनाई जाया करेंगी कि जहां भी दरकार हो, जहां वी.आई.पी. मूवमेंट हो वहाँ ही रात-रात में यह कार्पेट की तरह खोल दी जाया करेगी और ईवेंट समाप्त होते ही कार्पेट की तरह ही फ़ोल्ड करके किसी भी दूसरे स्थान पर ले जायी जा सकेगी। कितना अद्भुत नज़ारा होगा। बिलकुल महारणा प्रताप के घोड़े चेतक की तरह। चेतक की विद्युत सी चपलता पर कवि श्री श्यामनारायण पाण्डेय जी ने ‘चेतक की वीरता’ नामक कविता में लिखा था:
राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था
है यहीं रहा, अब यहां नहीं
वह वहीं रहा, है वहां नहीं
थी जगह न कोई जहां नही
इसी भांति हमारी ये पोर्टेबल सड़क जहां जाएगी ईवेंट होने तक तो समां बांध ही देगी। अज्ञानी लोग ना जाने क्यूँ जीवन के मर्म को समझने से इंकार कर देते हैं। ये जीवन क्षण-भंगुर है। यहाँ कुछ भी परमानेन्ट नहीं। ना तो सड़क, ना सड़क बनाने वाले और ना ही सड़क पर चलने वाले। अतः आप तो सड़क के इस नवीनतम भारतीय नवाचार पर गर्व करें। यह आपका अधिकार भी है और कर्तव्य भी है। लोग तो आलोचना करते ही रहेंगे। आप क्या समझते हो लोगों ने शाहजहां की आलोचना नहीं की होगी जब अगला ताजमहल बना रहा था। अरे बेकार क्यों इतना खर्चा करना, वो भी जमुना के किनारे, सीलन रहेगी। मजबूती नहीं आएगी। पहले ही क्या मकबरों की कमी है जो एक और बना दिया आदि आदि।
अतः ये ना देखें कि सड़क कितने सेंटीमीटर मोटी बननी थी इतनी सी ही बनी है। यह तो हाथ से ही उखड़ जाती है। यह तो दो हफ्ते भी नहीं चली आदि आदि शिकायतें वही लोग कर रहे हैं जो इस असलियत से परिचित नहीं हैं कि ये विश्व में सड़क निर्माण के कौशल की अनूठी मिसाल है। अब लगता है कि ये तभी मानेंगे जब विश्व में कोई देश हमें इस उपलब्धि पर भारी भरकम पुरस्कार हमारे गले में डाल देगा। वरिष्ठ नागरिकों को याद होगा टेलीफोन आबंटन में एक ओ.वाई.टी. श्रेणी हुआ करती थी। ‘ओन योर टेलीफोन’। उसी तरह अब आ गई है ओ.वाई.आर. । नहीं समझे ? ओन.योर.रोड.।
