द्विजेंद्र तिवारी
मुंबई
क्रिकेट को लंबे समय से अंग्रेजी हुकूमत के गुलाम देशों यानी कॉमनवेल्थ (राष्ट्रमंडल) का खेल माना जाता रहा है, जिसमें भारत, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान जैसे देशों का दबदबा है। भारत-पाकिस्तान मैच के बहिष्कार को लेकर चर्चा में आया एशिया कप उतना लोकप्रिय नहीं हो रहा है। इसमें कुल आठ टीमें हैं जिनमें से तीन टीमों और उसके खिलाड़ियों पर नजर डालें तो खेल और कमाई का अपवित्र गठजोड़ दिखाई पड़ता है। ये तीन टीमें हैं संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ओमान और हांगकांग (चीन)।
प्रवासियों की टीमें
ये टीमें ज्यादातर प्रवासी खिलाड़ियों से बनी हुई हैं। यूएई टीम के कप्तान हैं पाकिस्तान में जन्मे मोहम्मद वसीम और उनकी टीम के कुछ अन्य खिलाड़ियों के नाम हैं- आलीशान शराफू, ध्रुव पाराशर, आर्यांश शर्मा, राहुल चोपड़ा, हर्षित कौशिक, सिमरनजीत सिंह आदि। कहने की जरूरत नहीं कि टीम के लगभग सभी खिलाड़ी भारत और पाकिस्तान मूल के हैं।
वही स्थिति हांगकांग चीन टीम की है। टीम में चाऊ मिन, फुंग ली, शिंग पिंग जैसा एक भी नाम नहीं है, जिससे एहसास हो कि यह हांगकांग चाइनीज खिलाड़ियों वाली टीम है। उनकी टीम के नाम पढ़कर तो यही लगता है कि भारत और पाकिस्तान की बी अथवा सी टीमें मिलकर वहां से खेल रही हैं। टीम के खिलाड़ी हैं- यासिम मुर्तजा (कप्तान), बाबर हयात, जीशान अली, निजाकत खान, नसरुल्ला राणा, मार्टिन कोएट्जी, अंशुमान रथ, कल्हण चल्लू, आयुष शुक्ला, एजाज खान, अतीक इकबाल, किंचित शाह, आदिल महमूद, हारून अरशद, अली हसन, शाहिद वासिफ, गजनफर मोहम्मद, मोहम्मद वहीद, अनस खान, एहसान खान।
वही हाल ओमान टीम का है। इसके सदस्य हैं- जतिंदर सिंह (कप्तान), हम्माद मिर्जा, विनायक शुक्ला, सुफियान यूसुफ, आशीष ओडेदरा, आमिर कलीम, मोहम्मद नदीम, सुफियान महमूद, आर्यन बिष्ट, करण सोनावले, जिक्रिया इस्लाम, हसनैन अली शाह, पैâसल शाह, जीतेन रामानंदी, मुहम्मद इमरान, नदीम खान, शकील अहमद, समय श्रीवास्तव।
आईसीसी के नियम
हो सकता है कि भारत या पाकिस्तान मूल के इन प्रवासियों में से कोई वहीं पैदा हुआ हो, उसके पास नागरिकता या परमानेंट रेजीडेंसी (पीआर) हो। उनके टीम में होने पर भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन स्थानीय चाइनीज या अरबी खिलाड़ी इन टीमों से पूरी तरह नदारद हैं।
इससे यह सवाल उठता है कि क्या प्रवासी-प्रधान टीमें वैध राष्ट्रीय टीमें हैं या सिर्फ मार्वेâटिंग के हथकंडे? प्रवासी खिलाड़ियों पर आईसीसी के नियम के मुताबिक, विदेश में जन्मा कोई भी खिलाड़ी आईसीसी टूर्नामेंटों में किसी देश का प्रतिनिधित्व तभी कर सकता है जब उसके पास उस देश की नागरिकता या पीआर हो। इसके अलावा, उसने निर्दिष्ट अवधि के दौरान किसी अन्य राष्ट्रीय टीम के लिए न खेला हो। पर मूल प्रश्न यही है कि क्या इससे उस देश में क्रिकेट की जड़ें मजबूत होंगी और लोकप्रियता बढ़ेगी? पहली नजर में ऐसा होता दिख नहीं रहा। दुबई और अबू धाबी के स्टेडियम में स्थानीय अरबी दर्शक नगण्य दिखाई पड़ते हैं।
पूंजीपतियों के सहारे
ऐसा लगता है कि आईसीसी की खामियों और स्थायी निवास के नियमों का इस्तेमाल करके कुछ पूंजीपति ऐसी ‘टीमें’ बनाते हैं। लेकिन ये टीमें किसी राष्ट्रीय गर्व, भावना या पहचान से रहित होती हैं। जैसे कागज के फूलों का गुलदान, जिसमें खुशबू नहीं होती।
ये टीमें अक्सर टूर्नामेंटों में कुछ ही बार खेलती हैं, फिर जब फंडिंग खत्म हो जाती है या आगे नहीं बढ़ पातीं तो गायब हो जाती हैं। कनाडा, अमेरिका या पूर्वी अप्रâीका जैसी टीमों को याद कीजिए। ये टीमें विश्व कप में थोड़े समय के लिए तो दिखाई दीं, लेकिन कभी भी अपने देश में क्रिकेट संस्कृति विकसित नहीं कर पाईं।
इसकी तुलना अफगानिस्तान से करें। एक ऐसा देश जहां सीमित संसाधन हैं और अशांत राजनीतिक और घरेलू परिस्थितियां हैं, लेकिन उसने अपने भीतर से एक प्रतिस्पर्धी और उत्साही राष्ट्रीय टीम बनाई है। अफगानिस्तान का क्रिकेट में उदय यह साबित करता है कि असली सफलता स्थानीय प्रतिभाओं को विकसित करने से मिलती है, उन्हें बाहर से लाने से नहीं।
अगर आईसीसी क्रिकेट के वैश्वीकरण को लेकर गंभीर है, तो उसे प्रवासी-प्रधान टीमों को प्रतिनिधित्व देने से बचना होगा। इसके लिए इंप्रâास्ट्रक्चर बनाना, स्थानीय खिलाड़ियों को शामिल करना और जमीनी स्तर पर खेल को प्रोत्साहित करने की जरूरत होगी। अन्यथा, ये दिखावटी ‘टीमें’ बनी रहेंगी और उस देश के लोगों का नहीं, बल्कि इंवेस्टमेंट करनेवाले पूंजीपतियों के व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व करेंगी।
(लेखक कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
