मुख्यपृष्ठस्तंभसोशल मीडिया का सेंसेशनल आलेख भक्त मूर्ख नहीं, सब जानते हैं!

सोशल मीडिया का सेंसेशनल आलेख भक्त मूर्ख नहीं, सब जानते हैं!

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-इतने वर्षों तक गैस, पेट्रोल की मूल्यवृद्धि, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ किए गए आंदोलन उन्हें याद आते होंगे। अब कुछ कहा तो अपने ही लोग उन्हें नोच डालेंगे, यह डर है। सारी चीजें किसके फायदे के लिए हो रही हैं, स्वामी और मधु किश्वर के इंटरव्यू वे भी देखते होंगे।

-दस वर्षों बाद जो हुआ है, उसे देखकर अब धीरे-धीरे उनका भ्रम टूट रहा है। वे अब शांत होने लगे हैं। बचकानी बातें सुनकर चुप हो जाते हैं। उनके बच्चों का भविष्य भी खतरे में है। उन्हें भी आर्थिक परेशानियां हैं। जिसे उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर-राजा माना था, वह आखिर लकड़ी का ठूंठ निकला, यह मानने में उन्हें तकलीफ हो रही है।

सोशल मीडिया पर लगातार यह कहनेवाले लोगों पर मुझे दया आती है कि भक्त लोग मूर्ख हैं, उन्हें अक्ल नहीं है, उन्होंने अपना दिमाग गिरवी रख दिया है वगैरह। शायद यह उनका १२ वर्षों का प्रâस्ट्रेशन हो।
किसने कहा कि भक्त लोग या भाजपा समर्थक मूर्ख हैं? वे बिल्कुल मूर्ख नहीं हैं। उनमें से कितने ही उच्च शिक्षित हैं। देश में क्या चल रहा है, यह उन्हें अच्छी तरह पता है। महंगाई वैâसे बढ़ रही है, रुपए का अवमूल्यन क्यों हो रहा है, मैन्युपैâक्चरिंग इंडस्ट्री वैâसे गड्ढे में चली गई है, विदेशी निवेश वैâसे घटा है, दुनिया में भारत की क्या छवि है, भारत को अमेरिका और इजरायल वैâसे नचा रहे हैं, वैâसे ब्लैकमेल कर रहे हैं, रूस और ईरान के दूर चले जाने से हमारा तेल वैâसे महंगा हुआ है, क्रूड सस्ता होने के बावजूद पेट्रोल के दाम कम न करके हमें वैâसे लूटा गया है, देश पर कर्ज ढाई गुना वैâसे हो गया, अमीरों पर कर कैसे कम किए गए, सारे भ्रष्टाचारी भाजपा में कैसे घुस गए, सिर्फ विरोधियों पर ही छापे वैâसे पड़ते हैं, पत्रकारिता और न्याय व्यवस्था वैâसे खोखली कर दी गई है, चुनाव वैâसे मैनेज किए जाते हैं, सब कुछ अडानी की जेब में वैâसे डाला जा रहा है, उन्हें बचाने के लिए सरकार वैâसे ब्लैकमेल हो रही है, बलात्कार के आरोप झेलनेवाले लोग सरकार में गर्दन उठाकर वैâसे बैठे हैं, यह सब उन्हें समझ में आता है।
उन्हें सब समझ में आ रहा है। इस सबका झटका उन्हें भी उतना ही लग रहा है जितना हमें। राहुल गांधी को ऊपर-ऊपर से चाहे कितनी भी गालियां दें, लेकिन वह समझदारी की बात करता है और कुछ दिनों बाद उसकी भविष्यवाणियां सच साबित होती हैं, यह देखते हुए उन्हें बहुत तकलीफ होती होगी। इसलिए अब उसे पप्पू कहना कम हो गया है।
खुद के बेटे ने चीटिंग करके परीक्षा में सफलता पा ली, तो लोगों के सामने अकड़ दिखाई जा सकती है, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर यह कसक बनी रहती है कि अपना बेटा मठ्ठ तो है ही, साथ ही झूठा भी है।
आईटी सेल से आए जिन फॉरवर्ड संदेशों को वे आगे भेजकर दूसरों को जवाब देते हैं, उनमें से नब्बे प्रतिशत पोस्ट फेक न्यूज होती हैं, यह अब तक उन्हें पता चल चुका है। हम तो पैâक्ट चेक करते हैं, लेकिन वे विश्वास करते हैं। आईटी सेल हमें नहीं, बल्कि उन्हें ही बेवकूफ बना रहा है, यह बात उन्हें चुभती होगी। असल में उन्हें फेक न्यूज बनानी पड़ती है, यही बात भीतर से चुभती होगी।
इतने वर्षों तक गैस, पेट्रोल की मूल्यवृद्धि, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ किए गए आंदोलन उन्हें याद आते होंगे। अब कुछ कहा तो अपने ही लोग उन्हें नोच डालेंगे, यह डर है। सारी चीजें किसके फायदे के लिए हो रही हैं, स्वामी और मधु किश्वर के इंटरव्यू वे भी देखते होंगे। चाय बेचना, मगरमच्छ पकड़ना और एमए की डिग्री, इनमें कितना सच है और कितना झूठ, यह समझने की विवेक-बुद्धि उनके पास है।
इतिहास, विज्ञान और गणित का उनका अध्ययन भी अच्छा है। झूठा इतिहास, विज्ञान की खिल्ली, (a+ं)² की जो हालत की गई, वह उन्हें समझ आता है। रडार और बादल, गटर गैस वगैरह सुनकर वे भी माथा पकड़ लेते होंगे।

स्वतंत्रता बाद साठ-सत्तर वर्षों तक सत्ता न पानेवाली कांग्रेस-विरोधी विचारधारा की आज यह तीसरी-चौथी पीढ़ी है। पीढ़ियों से उनके घरों में यह विचार रहा है। वाजपेयी सरकार अस्थिर थी। मोदी सरकार बहुमत वाली बनी। वर्षों इंतजार किया था। पार्टी और निष्ठा बदले बिना इंतजार किया था। ऐसी पूर्ण सत्ता दिलाने वाला व्यक्ति उन्हें सुपरमैन लगे, इसमें गलत कुछ नहीं।
दस वर्षों बाद जो हुआ है, उसे देखकर अब धीरे-धीरे उनका भ्रम टूट रहा है। वे अब शांत होने लगे हैं। बचकानी बातें सुनकर चुप हो जाते हैं। उनके बच्चों का भविष्य भी खतरे में है। उन्हें भी आर्थिक परेशानियां हैं। जिसे उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर-राजा माना था, वह आखिर लकड़ी का ठूंठ निकला, यह मानने में उन्हें तकलीफ हो रही है। मनमोहन सिंह, जिनका उन्होंने मजाक उड़ाया था, वे साधारण, सज्जन और बेहद बुद्धिमान व्यक्ति थे, यह बात उन्हें भी समझ आ रही होगी।
जब डोनाल्ड ट्रंप मोदी का अपमान करते हैं, उन्हें उंगली के इशारे पर नचाते हैं, तब उन्हें अत्यंत पीड़ा होती होगी। भारत को किससे क्या लेना है, इसकी अनुमति अमेरिका से लेनी पड़ती है? मोदी यह सब सिर झुकाकर सुनते हैं, लेकिन क्यों? एपस्टीन फाइल्स में कांग्रेस के किसी व्यक्ति का नाम नहीं है, लेकिन इस सरकार के करीबी लोगों के नाम हैं, यह कानाफूसी उनके कानों तक भी पहुंचती होगी।
सभाr होशियार और विद्वान लोग एक-एक करके किनारे कर दिए गए और सिर्फ चाटुकार बचे हैं। निष्ठावान लोग केवल दरी ही उठाते हैं, यह वे भी देख रहे हैं। मोदी नहीं तो कौन? यह सवाल हमसे ज्यादा उनके लिए बड़ा है।
मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अन्ना आंदोलन में हम भी शामिल थे और २०१४ में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में हमारा भी वोट था, यह उन्हें पता है इसलिए वे हमें अर्बन नक्सलवादी नहीं कह सकते।
‘लूट रहा है जिगर, पड़ रहा है मगर मुस्कुराना, हाय-हाय ये जालिम जमाना’ उनकी हालत कुछ ऐसी ही हो गई है। बस, उन्हें अकेला छोड़ दीजिए।

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