पं. प्रेम बरेलवी
उत्तराखंड के पवित्र धाम केदारनाथ और बदरीनाथ केवल मंदिर ही नहीं हैं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक भावना के केंद्र हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु कठिन यात्रा करके इन धामों तक पहुंचते हैं। कोई अपनी मनोकामना लेकर आता है, कोई दुख लेकर, तो कोई श्रद्धा से अपनी कमाई का हिस्सा दानपात्र में डाल जाता है। लेकिन अब सूचना के अधिकार (आरटीआई) से सामने आए दस्तावेजों ने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन्होंने आस्था और व्यवस्था दोनों को कटघरे में ला खड़ा किया है। आरोप है कि श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने श्रद्धालुओं के चढ़ावे और मंदिर कोष का इस्तेमाल वीआईपी मेहमाननवाजी, राजनीतिक अतिथियों के आवास, भोजन और हेलिकॉप्टर टिकटों पर किया। सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी द्वारा प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर लगाए गए आरोप अब उत्तराखंड की राजनीति और धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ रहे हैं।
आरोप क्या हैं?
आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, बीकेटीसी ने कई राजनीतिक और प्रभावशाली व्यक्तियों के आवास, भोजन और यात्रा पर मंदिर कोष से भुगतान किया। आरोप है कि इन लोगों को ‘अतिथि’ दिखाकर खर्चों को वैध रूप दिया गया। दस्तावेजों के हवाले से जो खर्च सामने आए, उनमें शामिल हैं: वैâबिनेट मंत्री गणेश जोशी की पुत्री नेहा जोशी के दो दिन के आवास और भोजन पर लगभग ६० हजार रुपए खर्च। केदारनाथ विधायक आशा नौटियाल के नाम पर ३७,५०० रुपए। प्रधानमंत्री मोदी के भाई पंकज मोदी के आवास पर २२ हजार रुपए। कथित तौर पर संघ से जुड़े कुछ व्यक्तियों के आवास पर २० हजार रुपए। भाजपा पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के आवास-भोजन पर २४ हजार रुपए और बीकेटीसी अध्यक्ष के निजी सहायक के आवास पर २३ हजार रुपए खर्च किए गए। यही नहीं, आरोप यह भी है कि मंदिर समिति ने हेलिकॉप्टर टिकटों का भुगतान भी मंदिर कोष से किया। बीकेटीसी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के ‘अतिथियों’ के लिए हेली सेवाओं पर लाखों रुपए खर्च किए गए।
सबसे बड़ा सवाल क्या श्रद्धालुओं का पैसा राजनीतिक मेहमाननवाजी में खर्च हो सकता है? यहीं से विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष शुरू होता है। मंदिर समितियां सामान्य सरकारी विभाग नहीं होतीं। इनके पास आने वाला धन श्रद्धालुओं की धार्मिक भावना और विश्वास से जुड़ा होता है। ऐसे में यदि उस धन का उपयोग राजनीतिक संपर्क मजबूत करने, प्रभावशाली लोगों की सुविधा या निजी मेहमाननवाजी में होता है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि नैतिक संकट भी माना जाएगा। एक आम श्रद्धालु जो हजार-दो हजार रुपए चढ़ाता है, वह यह सोचकर दान नहीं देता कि उसका पैसा किसी नेता, अधिकारी या वीआईपी के होटल, भोजन या हेलिकॉप्टर सुविधा पर खर्च होगा।
वीआईपी संस्कृति बनाम आम श्रद्धालु
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब हर यात्रा सीजन में आम श्रद्धालुओं को घंटों लाइन, महंगे होटल, सीमित सुविधाएं और मौसम की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई श्रद्धालु पैदल चढ़ाई करते हैं, खुले आसमान के नीचे रात बिताते हैं और निजी खर्च से यात्रा पूरी करते हैं।
वहीं दूसरी ओर यदि मंदिर समिति के संसाधन राजनीतिक और प्रभावशाली लोगों की विशेष सुविधाओं पर खर्च किए जा रहे हों, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। धार्मिक संस्थाओं में ‘वीआईपी संस्कृति’ का आरोप नया नहीं है, लेकिन केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे राष्ट्रीय आस्था केंद्रों में इस तरह के आरोप बेहद गंभीर माने जाएंगे।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी इससे पहले भी बीकेटीसी में कथित अनियमितताओं के कई मामले उजागर कर चुके हैं। उनके मुताबिक एक उपाध्यक्ष पर अपनी पत्नी को कर्मचारी दिखाकर भुगतान लेने का आरोप लगा, निजी आवास को कार्यालय दिखाकर भत्ते लेने का मामला सामने आया और मंदिर कोष से लाखों रुपए के वितरण को लेकर भी प्रश्न उठे। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं बल्कि संस्थागत जवाबदेही की विफलता का संकेत होगा।
सरकार और बीकेटीसी की चुप्पी सवालों के घेरे में
अब तक इन आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है, लेकिन मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रह गया है।
अब जरूरी सवाल यह है कि क्या मंदिर समिति के पास ऐसे खर्चों की अनुमति देने का नियम है? किन आधारों पर लोगों को ‘विशेष अतिथि’ घोषित किया गया? क्या इन खर्चों का ऑडिट हुआ? क्या मंदिर कोष के उपयोग की सार्वजनिक निगरानी होती है? क्या श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार नहीं कि उनका चढ़ावा कहां खर्च हो रहा है?
आस्था पर चोट का राजनीतिक असर
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक महत्व भी रखती है। ऐसे में मंदिर समिति पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप सीधे सरकार की साख को प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से तब, जब भाजपा स्वयं को सनातन और धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा संरक्षक बताती रही है। विपक्ष को अब सरकार और मंदिर प्रशासन पर हमला बोलने का नया मुद्दा मिल सकता है।
बहरहाल, अब इस मामले पर सिर्फ जांच ही भरोसा लौटा सकती है, क्योंकि इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप आरटीआई दस्तावेजों के आधार पर लगाए गए हैं। इसलिए इनकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच जरूरी हो जाती है। यदि आरोप गलत हैं तो सरकार और बीकेटीसी को दस्तावेजों के साथ सफाई देनी चाहिए और यदि आरोप सही हैं तो यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ धोखा माना जाएगा। केदारनाथ और बदरीनाथ केवल धार्मिकस्थल नहीं, भारतीय संस्कृति और सनातन आस्था की आत्मा हैं। वहां चढ़ाया गया हर रुपया भक्त की भावना का प्रतीक है। इसलिए उस धन का उपयोग पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और मर्यादा के साथ होना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
