मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष : बीमार राजस्थान की बीमार पुलिस

विशेष : बीमार राजस्थान की बीमार पुलिस

मनोज वार्ष्णेय

अगर पुलिस अफसर का कहा सही माना जाए और मेडिकल जांच रिपोर्ट को आधार मानें तो देश के १७ हजार पुलिस थानों में कार्यरत पुलिस के जवान काम के बोझ के बाद अब बीमारी के बोझ को भी कंधे पर उठाए हुए जनता की सेवा कर रहे हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर में मार्च २०२६ माह के अंत में पुलिस लाइन में चिकित्सा शिविर लगाकर पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य की जांच हुई। इसमें करीब १,२५० ने अपनी जांच कराई और उसके जो नतीजे थे, उसमें आरंभिक सूचना के आधार पर २० प्रतिशत जवान या तो आंखों से देखने में परेशानी महसूस करते हैं या फिर वह ब्लड प्रेशर तथा मधुमेह के शिकार हो गए हैं। इसके अतिरिक्त थायरायड, प्रोस्टेट, हार्ट, स्टोन जैसी रेगुलर बीमारियों से भी वे परेशान हैं।
इमरजेंसी
खुद पुलिस आयुक्त सचिन मित्तल ने भी कहा था कि इस तरह की जांचें हुई हैं और इनकी फाइनल रिपोर्ट के बाद क्या करना है देखेंगे। इससे खुद समझा जा सकता है कि बीस प्रतिशत जवान बीमारियों से या तो जूझ रहे हैं या फिर वे इस ओर बढ़ रहे हैं कि जब ड्यूटी पर होंगे तो पता नहीं कब उनका ब्लड प्रेशर लो हो जाए या मधुमेह शूट कर जाए? यदि किसी को स्टोन की बीमारी हुई और वह किसी इमरजेंसी सेवा में ड्यूटी पर हुआ तो किसकी इमरजेंसी होगी। यह खुद समझा जा सकता है। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले भी कई बार सड़क पर ड्यूटी करनेवाले जवानों आदि की जब जांच हुई है, तो वे इन बीमारियों से ग्रस्त निकले हैं या फिर ओवरवेट और पुलिस सेवा के परफेक्ट के आधार पर मिसफिट, पर हुआ आज तक कुछ खास नहीं है। हां, एक बात पूरे देश में समान तौर पर लागू होती है कि इन पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। राजस्थान के बहाने पूरे देश की स्थिति समझी जा सकती है। इसे ऐसे समझिए कि राजस्थान पहले देश के बीमारू राज्यों में आता था, पर २०१७-१८ के आस-पास यह इस श्रेणी से मुक्त होकर प्रगतिशील श्रेणी में आ गया। आज यह सौर ऊर्जा, कृषि और पशुपालन, खनिज संपदा तथा पर्यटन के क्षेत्र में देश मे महत्वपूर्ण राज्यों में आता है। इसके विपरीत देखिए, पुलिस की हालत यह है कि जितने प्रतिशत यहां बीमारी की तरफ जाते पुलिसकर्मी मिले हैं, उतने ही प्रतिशत उनके पद खाली हैं और इस पर तुर्रा यह कि पूरे देश में यहीं पर सबसे अधिक पुलिस सेवा में जानेवाले युवाओं के सपनों पर नकल माफिया ने कुठाराघात कर रखा है। अब इसी सूचना के आधार पर पूरे देश का हाल समझा जाए तो साफ होता है कि जिनके कंधे पर हत्या, चोरी, बलात्कार, छेड़खानी, डवैâती, साइबर प्रâॉड, यातायात, लव मैरिज में सुरक्षा, पति-पत्नी के झगड़े में प्रारंभिक जांच, बच्चा चोरी या गुमशुदगी, स्कूलों के बाहर मनचलों से बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी और भी न जाने क्या-क्या है, जिसकी वह नौकरी बचाने के लिए १८० ब्लड प्रेशर-२२० मधुमेह में भी जांच करते हैं तथा अपराधियों को दबोचने के लिए दौड़ लगाते हैं अथवा सुरक्षा करते हैं।
न नई भर्तियां, न बीमारी के दौरान ४५ डिग्री तापमान में चौराहे पर खड़े होने की ड्यूटीr में राहत। उस पर लाइन हाजिर या तबादले पर तबादला।
इलाज कब और कहां?
आखिर वैâसे अपराध रुक पाएं और आम जनता से मित्रवत पेश आया जाए, इन परिस्थितियों में यह समझाने वाला कोई नहीं है? एक जवान या अफसर अगर बीमार या बीमारी की तरफ है तो वह किस तरह से रास्ते में छेड़छाड़ पर शी-बॉक्स पोर्टल की शिकायत पर मदद कर पाएगा? वह वैâसे रात में चोरी करते हुए चोर के पीछे भागकर चोर को पकड़ पाएगा। नतीजा यह हो रहा है थानों में केस पेंडिंग बढ़ते जा रहे हैं। ओवर ड्यूटीr से वे चिड़चिड़े हो रहे हैं और इसी कारण थानों से मुद्दई को भगा देने के मामले रोज बढ़ रहे हैं। भले ही एफआईआर लिखाना अब मेल से भी हो रहा है, पर जो मजदूर या नागरिक खाने के लिए तरस रहा है, वह थाने के अतिरिक्त कहां जाए? मेडिकल एडवाइजर बताते हैं कि मधुमेह में अप-डाउन चलता रहता है और अगर इंसुलिन ली जाती है तो स्थिति कब खतरनाक होगी कुछ नहीं कह सकते। यही हाल ब्लड प्रेशर के मरीजों का है। आखिर क्या किया जा सकता है, इस मामले में? इस पर समाजसेवी और पूर्व पुलिस अधिकारी कहते हैं कि जिन भी पुलिसकर्मी की बीमारी डायग्नोस हो, उन्हें फील्ड के स्थान पर थानों में या फिर पुलिस के उन कामों में लगाया जाए जहां पर कम खतरा है या फिर यह संभावना है कि इमरजेंसी में मदद मिल जाएगी। हां, जो जवान सेहतमंद हैं, उन्हें फील्ड में खासकर सीधे जनता से आमने-सामने वाले क्षेत्रों में लगाया जाए तो थोड़ा मामला सही हो सकता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि पूरे देश में पुलिसबल में खासी कमी है और जो बल है भी उसका कम से कम दस प्रतिशत तो वीआईपी ड्यूटी में ही व्यस्त रहते हैं।
यह बात अलग है कि जब से बाउंसर का चलन आया है, तब से पुलिसकर्मी की मांग थोड़ी कम हुई है, पर अभी भी वर्दीधारी पुलिस का साथ रखना एक स्टेट्स बना हुआ है। पुलिस गश्ती दल तथा सायरन लगी त्वरित मददगार गाड़ियां अलग रख दी जाएं, तो भी एक दर्जन से अधिक ऐसे डिजिटल प्लेटफार्म हैं, जहां पर पुलिसकर्मी ही काम करते हैं। ११२ ऐप, किराएदार-नौकर सत्यापन, रोजगार परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए साइबर सेल, संचार साथी, क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क, डिजिटल वारियर तथा ई-मालखाना ऐसे हैं, जिन्हें अब जनता बाखूबी समझती है। पर मुद्दा वही है कि आखिर तनाव के दौर में बीमार पुलिसकर्मी वैâसे अपराध नियंत्रण में पूरी तरह मददगार हो पाएंगे। इस बात का उत्तर लंबे समय से खोजा जा रहा है कि क्या किया जाए, पर पुलिस अफसर अपनी उलझनों से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हैं। वह यह ही नहीं समझ पाते कि बीमार को मालखाने में ड्यूटीr दें या फिर वीआईपी दौरे पर आ रहे किसी नेता की सुरक्षा के लिए गली के मोड़ पर खड़ा करने के लिए अपने मातहतों को कहें? उनकी परेशानी यह भी है कि जो युवा भविष्य में उनके साथ अपराध नियंत्रण में मदद करेगा, वह नकल के आरोप में चयनित होने के बाद पुलिस से छिपता फिर रहा है।
स्मार्ट पुलिस का सनपा!
बुलडोजर से माफिया या अपराधी का घर गिराने के लिए नगर निगम के साथ जाने पर पथराव में जब कोई पुलिसकर्मी घायल होता है, तो भी उसे राहत नहीं मिलती। हां, इतना जरूर होता है कि कुछ दिनों बाद वह फिर से अवैध रूप से ले जाई जा रही नशीली या नकली दवाओं को रोकने के लिए छापा मारने में सहयोग कर रहा होता है और यह भी बात ध्यान रखने की है कि महिला अपराध में महिला पुलिसकर्मी ही कार्रवाई के लिए जाती है, भले ही उसके साथ कितने ही पुलिसकर्मी क्यों न जाएं। बचे थाने या चौकी तो यहां पर जाकर खुद देखा जा सकता है कि बाहर भले ही सुंदर-सुंदर वाक्य लिखे हों, पर सुविधाएं अभी भी अंग्रेजों के जमाने जैसी हैं। विशेषकर, थाने का लॉकअप, पुलिसकर्मियों के आराम का स्थान और पूछताछ के लिए आरक्षित स्थान। बीमारू राज्य की श्रेणी से निकले हुए राजस्थान को अभी एक दशक भी नहीं हुआ है, लेकिन नकल माफिया ने पुलिस विभाग में जांच पर जांच की बीमारी लगा दी है और पूरे देश में यदि नकल या पेपर आउट का इतिहास देखा जाए तो राजस्थान बीमार पुलिसकर्मियों की तरह बीमार ही मिलेगा। ठीक उतने ही प्रतिशत जितना कि यहां पर पुलिसकर्मियों की कमी है या फिर पुलिस नियमों के आधार पर मेडिकली फिट जवानों की। यही कारण है कि सौ मीटर भी थुलथुल पेट से वह भाग नहीं पाते और समय-समय पर उनके लिए स्वास्थ्य जांच शिविर की रिपोर्ट उन्हें और चिंता में डालकर बीमार बना रही है और जनता है कि विदेशों की स्मार्ट पुलिस का भारत में होने का सपना देखकर खुद ही खुश हो रही है।
(लेखक राजस्थान से प्रकाशित नवज्योति के पूर्व साहित्य संपादक हैं)

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