पं. प्रेम बरेलवी
वोट चोरी के विपक्ष के आरोपों और प्रदर्शनों के बीच एक टीवी चैनल पर दिल्ली की भाजपा नीत सरकार में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया है कि भाजपा वोट चोरी करके ही सत्ता में आई है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक ऐसा काला धब्बा है, जो सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं की करतूतों से पर्दा हटाता है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कोई बयान उनके इस खुलासे के बाद से नहीं आ रहा है। अर्थात् भाजपा नेत्री और दिल्ली की मुख्यमंत्री अब मीडिया से दूर हैं, लेकिन सच तो स्वीकार कर ही लिया गया। कथित आरोप लगते रहे हैं कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव से लेकर हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और दिल्ली के चुनाव इसी तरह जीते हैं। इन आरोपों को नजरअंदाज किया भी जा सकता था, लेकिन चुनाव आयोग की संदेहास्पद गतिविधियां और ऊंटपटांग बयानों से संदेह और गहरा गया है। फरवरी, २०२५ से दिल्ली की सत्ता संभाल रहीं रेखा गुप्ता के बयान से वोट चोरी का संदेह दृढ़ विश्वास में बदल गया है।
यह सब न केवल एक राजनीतिक घोटाले की तरह है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है। क्या यह भाजपा का विकास मॉडल है या फिर लोकतंत्र को कुचलने की साजिश? खुद को राष्ट्रवादी पार्टी बतानेवाली भाजपा ही राष्ट्र में षड्यंत्रकारी नीति पर चलकर लोकतंत्र में खुले बाजार की तरह कभी विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त पिछले दरवाजे से करती है तो कभी चुनावी हेराफेरी के सुबूतों के साथ नंगी होती है। कई पतों पर दर्जनों से लेकर सैकड़ों मतदाताओं का पंजीकरण पाया जाना चुनावी बेईमानी के ऐसे सुबूत हैं, जिन्हें नकारना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। यही वजह है कि भाजपा के बड़े नेता वोट चोरी पर कन्नी काटे हुए हैं, लेकिन दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मुंह से आखिर सच निकल गया। हालांकि, उन्होंने कहा कि ‘जब ७० सालों से वो ईवीएम हैक कर रहे थे तो कुछ नहीं हो रहा था, हमने कर लिया, तो बुरा लग रहा है।’ इससे पहले उन्होंने कहा था कि ‘मोदी वोट चोरी नहीं करते, दिल चोरी करते हैं।’ अर्थात् उनका कहना है कि वैâसी भी सही, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी चोरी तो करते हैं।
सच निकला!
अब यह भाजपा के आंतरिक कलह के चलते हो रहा है या भाजपा नेताओं के मुंह से सच निकल रहा है या फिर सत्ता की खुशी में ही सच निकल गया, लेकिन भाजपा का यह ‘वोट चोरी मॉडल-३.० न केवल २०२४ चुनावों को अवैध बनाता है, बल्कि आनेवाले २०२९ के लोकसभा चुनावों के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। चुनाव आयोग द्वारा बार-बार सफाई देना, सवालों के जवाब न देना, चुनावी रिकॉर्ड न देना और ईवीएम बदलने से लेकर लाखों फर्जी वोटर आईडी बनाने, जीवित मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाने जैसी हरकतों ने करोड़ों मतदाताओं को आशंकित किया है, जिसके चलते लाखों लोग ईवीएम हटाने और चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग लेकर सड़कों पर उतर चुके हैं।
चुनाव आयोग की भूमिका यहां बेहद शर्मनाक और अन्यायपूर्ण है। संविधान के अनुच्छेद-३२४ के तहत केंद्रीय चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया है, लेकिन चुनाव आयोग सिर्फ भाजपा के लिए काम करनेवाली संस्था बन चुका है। फर्जी मतदाताओं पर चुनाव आयोग की चुप्पी और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से लेकर वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तक की तमाम हरकतें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती हैं। चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार राहुल गांधी के आरोपों को तो बेबुनियाद बता रहे हैं, लेकिन खुद के सही होने का सुबूत पेश नहीं कर रहे हैं। यह चुनाव आयोग की ढीठता, साजिश, लापरवाही और भाजपा का मूक समर्थन है, जिसे देश की जागरूक जनता भली-भांति समझ रही है। २०२४ के चुनावों में २.६९ लाख संदेहास्पद मतदाताओं की अनदेखी का आरोप चुनाव आयोग पर लग ही चुका है।
जांच
केंद्रीय चुनाव आयोग के कार्यों की जांच करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को आगे आना चाहिए, अन्यथा यह सर्वोच्च न्यायालय की लोकतंत्र की रक्षा में सबसे बड़ी चूक मानी जाएगी। सवाल यह है कि अगर जांच में चुनावों में हेरा-फेरी के आरोप सही साबित होते हैं तो क्या इस अपराध के लिए चुनाव अधिकारियों, विशेषकर मुख्य चुनाव आयुक्त को सजा दी जा सकती है? इसका सीधा जवाब है कि हां। क्योंकि भारत का संवैधानिक और कानूनी ढांचा बहुत मजबूत है, जो ऐसी साजिशों को कुचल भी सकता है और गड़बड़ी करनेवाले चुनाव आयोग के अधिकारियों को सजा भी दे सकता है। अनुच्छेद-३२ के तहत कोई भी भारतीय नागरिक मौलिक अधिकारों, जैसे अनुच्छेद-१९(१)(ए) के तहत वोट का अधिकार के उल्लंघन पर न्याय की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है। विपक्ष एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन दायर करके २०२४ के लोकसभा चुनावों को रद्द करने और नए सिरे से मतदान करवाने की मांग तक कर सकता है। अनुच्छेद-३२४(१) केंद्रीय चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, लेकिन यदि आयोग विफल साबित होता है तो सर्वोच्च न्यायालय मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर अनुच्छेद-३२४(५) के तहत पुनर्विचार कर सकता है।
फटकार!
२०२३ के ईवीएम हैकिंग आरोप मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई थी। सर्वोच्च न्यायालय के अलावा राष्ट्रपति को भी अनुच्छेद-३५६ के तहत केंद्र शासित प्रदेश (दिल्ली) में राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार है, यदि रेखा गुप्ता शांति भाजपा सरकार अवैध साबित हो। लेकिन इसके लिए एक निष्पक्ष गहन जांच की जरूरत है, जिसका आदेश सर्वोच्च न्यायालय को बिना देरी किए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के बयान को आधार बनाकर देना चाहिए।
कानूनी कार्रवाई के मोर्चे पर विकल्प और भी कड़े हैं। प्रतिनिधित्व अधिनियम-१९५१ की धारा-१२३(२) भ्रष्ट आचरण के तहत चुनावी भ्रष्टाचार को अमान्य घोषित करती है। यदि वोट चोरी साबित होती है तो प्रभावित निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव रद्द हो सकते हैं। प्रतिनिधित्व अधिनियम-१९५१ की धारा-१२५ के तहत वोट चोरी करने पर कम-से-कम छ: महीने तक की जेल की सजा या ज़ुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं।
भारतीय दंड संहिता की धारा-१७१(बी) (अवैध प्रभाव) और धारा-१७१(सी) (झूठी पहचान) सीधे लागू होती हैं, जिसमें एक वर्ष तक की सजा का प्रावधान और जुर्माना या दोनों सजाओं का प्रावधान है। अगर वोट चोरी एक संगठित साजिश साबित हो जाती है तो ऐसा करनेवालों को आईपीसी की धारा-१२०(बी) (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। चुनाव आयोग के अधिकारियों पर भी आईपीसी की धारा-१६६ (सार्वजनिक सेवक द्वारा कर्तव्य लोप) के तहत मुकदमा चलाया सकता है और उनके दोषी पाए जाने पर सजा हो सकती है।
विपक्ष को तुरंत सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके चुनावों में धांधली रोकने के लिए हस्तक्षेप के अलावा संदेहास्पद चुनावों की जांच की मांग करनी चाहिए। इसके अलावा संसद में आवाज उठानी चाहिए, जिससे सरकार को विशेष सत्र बुलाने पर मजबूर होना पड़े और केंद्रीय चुनाव आयोग सुधार विधेयक लाने को उसे विवश किया जा सके, जिससे ईवीएम को १०० प्रतिशत वीवीपैट से मिलान अनिवार्य सुनिश्चित किया जाए।
(लेखक पत्रकार और सम-सामयिक विषयों के विश्लेषक हैं)
