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सुल्तानपुरिया चटर-पटर (३)

-झंडा लगाने को लेकर आजादी के दिन ही हो गया था बवाल!

विक्रम बृजेंद्र सिंह

सन १९४७ में जब देश आजाद हुआ तब सुल्तानपुर में भी खुशियां तो मनाई गईं लेकिन अंदाज़ बेढब था ! यहां १५ अगस्त को आधी रात में तत्कालीन विक्टोरिया पार्क (मौजूदा नगर पालिका भवन) में कांग्रेसी झंडा बदलकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लगाने को लेकर कांग्रेसी आपस में ही भिड़ गए और जमकर बवाल कर लिया। लाठियां चल गईं। पुलिस आई और दो गुटों में बंटे कांग्रेसियों के एक गुट को उठा ले गई। समझौता कराने के लिये तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को हस्तक्षेप करना पड़ा, लखनऊ से लाल बहादुर शास्त्री भेजे गए। दोनों गुटों में सुलह समझौते के बाद तब जाकर एक सितंबर, ४७ को पुनः स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। हालांकि राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा के बजाय कांग्रेसी चरखे वाला ध्वज अभी भी पालिका ग्राउंड में मौजूद है। इस रोचक घटनाक्रम का जिक्र जिले में फौजदारी के वरिष्ठ वकील रहे स्व.बाबू यदुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव से सन १९९९ में स्व. पंडित रामकिशोर त्रिपाठी ने एक साक्षात्कार के दौरान संवाद में किया था। स्व. पंडित त्रिपाठी जी के शब्दों में हूबहू उक्त घटनाक्रम का संस्मरण निम्न है …

“१५ अगस्त सन सैंतालीस में जब स्वाधीनता मिली, कांग्रेस के जनपद में दो खेमे थे। एक खेमे ने रात को तय किया कि नगरपालिका में जो तिरंगा झंडा कांग्रेस का लगा है, उसे आधी रात १२ बजे उतारकर राष्ट्रीय ध्वज के रूप में बदल दिया ज़ाय। इसका नेतृत्व नाज़िम अली(तत्कालीन प्रभावशाली कांग्रेस नेता)
कर रहे थे। उस वक़्त बाबू गनपत सहाय के पुत्र बाबू कुंवर कृष्ण वर्मा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष थे। उनका कथन यह था कि कांग्रेस का ध्वज बदलने की जरूरत ही नहीं है। बस इसी को लेकर दोनों गुटों में लाठियां चल गईं। पुलिस पहुंची मौके पर।नाज़िम अली को समर्थकों सहित गिरफ्तार कर लिया गया।रंग में भंग हो गया और यहां शोक मना। लोग जेल गए। कांग्रेस की तरफ से १५ अगस्त मनाया तो गया लेकिन आधी पार्टी अलग रही। स्व.लाल बहादुर शास्त्री , उस वक़्त पंत जी (सीएम गोबिंद बल्लभ पंत) के गवर्नमेंट में सेक्रेटरी थे। उन्हें सुल्तानपुर भेजा गया। उन्होने स्थानीय प्रशासन से बात की और जो कैदी कांग्रेसजन जेल में थे, उनकी रिहाई हुई। इसके बाद पहली सितंबर को पुनः स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। नगरपालिका में जो झंडा था वो आजतक कायम है। बाकी तो स्वतंत्रता दिवस हर जगह की तरह नगर में भी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।”

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