-शीतकालीन सत्र के लिए 42 करोड़ अतिरिक्त, PWD का बजट 129 करोड़ पार
-खर्च कटौती के सरकारी निर्देशों की खुली परीक्षा; किसानों पर सूखे का संकट -सरकारी इमारतों की मरम्मत और रंग-रोगन पर करोड़ों खर्च करने की तैयारी
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र में सूखे का संकट गहराने की आशंका है। किसानों के सामने पानी और आजीविका का सवाल खड़ा है। सरकार ने सभी विभागों को अनावश्यक खर्च रोकने के निर्देश दिए हैं। सरकारी कर्मचारियों से एक दिन का वेतन मुख्यमंत्री सहायता निधि में जमा करने की अपील भी की गई है, लेकिन दूसरी ओर नागपुर में होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र की तैयारियों पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ रहा है। लोक निर्माण विभाग (PWD) ने अतिरिक्त कार्यों के लिए 42 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। इससे अधिवेशन की तैयारियों पर विभाग का कुल खर्च 129 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब राज्य सूखे की मार झेल रहा है, तब सरकारी खर्च में कटौती के निर्देशों का पालन आखिर कहां हो रहा है?
87 करोड़ का बजट फिर 129 करोड़ पर कैसे पहुंचा?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, लोक निर्माण विभाग ने अगस्त में शीतकालीन सत्र की तैयारियों के लिए 145 करोड़ रुपये का प्रारंभिक अनुमान तैयार किया था। राज्य में सूखे की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने खर्च कम करने के निर्देश दिए। इसके बाद अधिवेशन की तैयारियों का संशोधित बजट घटाकर 87 करोड़ रुपये कर दिया गया, लेकिन अब अतिरिक्त आवश्यक कार्यों के लिए 42 करोड़ रुपये की मंजूरी दिए जाने से कुल खर्च बढ़कर 129 करोड़ रुपये हो गया है।
सवाल यह है कि जब पहले ही खर्च में कटौती की जा चुकी थी, तो ऐसी कौन-सी नई आवश्यकताएं सामने आईं कि बजट में दोबारा इतनी बड़ी वृद्धि करनी पड़ी? इन अतिरिक्त कार्यों की सूची, उनकी लागत और मंजूरी के आधार को सार्वजनिक करना जरूरी है।
मरम्मत, रंग-रोगन और सड़कों पर करोड़ों
नागपुर में अधिवेशन की तैयारियों के तहत रवि भवन, नाग भवन, विधान भवन सहित विभिन्न सरकारी इमारतों की मरम्मत, रंग-रोगन और आवश्यक सुविधाओं पर खर्च किया जा रहा है। सिविल लाइंस क्षेत्र में सड़कों से जुड़े काम भी किए जा रहे हैं। अधिवेशन के सुचारु संचालन के लिए कुछ काम जरूरी हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में उनकी प्राथमिकता और लागत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या सभी अतिरिक्त काम तत्काल जरूरी हैं? क्या कुछ कार्य अधिवेशन के बाद किए जा सकते हैं? और क्या 42 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च का स्वतंत्र आकलन किया गया है? इन सवालों का जवाब सरकार और लोक निर्माण विभाग को देना चाहिए।
सूखे में मितव्ययिता का संदेश, खर्च में बढ़ोतरी!
एक ओर सरकार विभिन्न विभागों को अनावश्यक खर्च से बचने का निर्देश दे रही है, वहीं दूसरी ओर अधिवेशन की तैयारियों का बजट फिर बढ़ गया है। सरकारी कर्मचारियों से मुख्यमंत्री सहायता निधि में एक दिन का वेतन जमा करने की अपील के बीच यह खर्च वृद्धि सरकारी प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करती है।
मुद्दा अधिवेशन पर खर्च करने का नहीं, बल्कि 42 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मंजूरी के औचित्य का है। यदि ये काम अपरिहार्य हैं, तो उनका विस्तृत विवरण जनता के सामने आना चाहिए। यदि खर्च में कटौती संभव थी, तो उसका लाभ क्यों नहीं लिया गया?
अब निगाहें सरकार और लोक निर्माण विभाग पर हैं। सूखे के संकट के बीच 129 करोड़ रुपये के कुल खर्च और अतिरिक्त मंजूरी का हिसाब सार्वजनिक करना जरूरी है। आखिर सरकारी खजाने से खर्च होने वाली इस बड़ी राशि के लिए जवाबदेही कौन तय करेगा?
